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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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विचार का धरातल अधिक व्यापक हो गया था, तब सगोत्र विवाह निषिद्ध ठहराये जाने लगे थे, जैसा कि आज भी प्रचलित है ( डाँगे, पृ० १०७ )।

हिन्दुओं की विवाह-व्यवस्था के सम्बन्ध में इतिहासकारों के विचार बहुत ही उलझे हुए रहे हैं। हिन्दुओं में बहु-पतित्व या बहु-पत्नीत्व का आधार पशुओं की यौन-प्रवृत्ति को मानने वाले कुछ पूँजीवादी बुद्धिजीवी विद्वानों का कहना है कि आरंभ में पुरुष-नारी के बीच यौन-सम्बन्ध का आधार प्राकृतिक था; किन्तु इधर नयी खोजों के द्वारा यह स्पष्ट हो गया है कि आरम्भ में भी पुरुष-नारी का यौन-सम्बन्ध समाज द्वारा ही नियन्त्रित होता था; उनके सम्बन्धों की नैतिकता या आचार-विचार का नियंत्रण न तो ईश्वर के हाथ में था और न प्रकृति के हाथों में ही।

व्यावहारिक दृष्टि से और शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दुओं में विवाह की जो प्रणाली आज प्रचलित है, अपने प्रकृत रूप में वह ऐसी ही नहीं थी। महाभारत ( आदिपर्व, १२२ ) में लिखा है कि कलियुग के चारों विवाह और परिवार का स्वरूप सर्वथा नया था, जो कि कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक नया सामाजिक प्रयोग था और वह प्राकृतिक नहीं था। महाभारत ( शा० प० २०६, ४२-४४ ) में युगों के अनुसार यौन-सम्बन्धों के चार रूप बताये गये हैं, जिनके नाम हैं : संकल्प, संस्पर्श, मैथुन और द्वंद्व।

डाँगे जी ने अपनी पुस्तक ( पृ० १११ ) में इन चार प्रकार के यौन-सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए कहा है "सङ्कल्प यौन-सम्बन्ध वे होते थे जिनमें कोई बंधन नहीं था। यह सम्बन्ध किन्हीं दो व्यक्तियों में हो सकता था, जो इसकी कामना या इच्छा करते थे। इस कामना पर कोई भी समाजिक या व्यक्तिगत रोक नहीं थी। संस्पर्श वह यौन-संबंध था जिसमें अपने अत्यन्त निकट संबंधियों के साथ यौन-संबंध स्थापित करने पर रोक लगा दी गयी थी और एक गोत्र में विवाह करने का निषेध कर दिया गया था। उस समय भिन्न-भिन्न गोत्र आपस में यह संबंध स्थापित करते थे। प्राकृतिक वैवाहिक संबंध की अन्तिम अवस्था मैथुन है। यहां से यूथ-विवाह का अंत हो जाता है। जब तक पति-पत्नी की इच्छा रहती थी, तब तक वे एक कुटुम्ब में बँधे रहते थे और दूसरे नर-नारियों से यौन-संबंध नहीं स्थापित करते थे। द्वन्द्व यौन-संबंध का वह रूप है जो कलियुग में प्रचलित है और जिसके अनुसार एक पति और एक पत्नी का जोड़ा होता है। यौन-संबंध के इस रूप के अनुसार नारी, पुरुष की दासी होती है; और वह ( पुरुष ) व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार और