कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
प्र० ३७ : अ० २१ ] शुल्क का अध्यक्ष १८७
(१) वैवाहिकमन्वायनमौपायनिकं यज्ञकृत्यप्रसवनैमित्तिकं देवेज्या-चौलोपनयनगोदानव्रतदक्षिणादिषु क्रियाविशेषेषु भाण्डमुच्छुल्कं गच्छेत् ।
(२) अन्यथावादिनः स्तेयदण्डः ।
(३) कृतशुल्केनाकृतशुल्कं निर्वाहयतो द्वितीयमेकमुद्रया भित्त्वा पण्यपुटमपहरतो वैदेहकस्य तच्च तावच्च दण्डः ।
(४) शुल्कस्थानाद्गोमयपलालं प्रमाणं कृत्वा अपहरत उत्तमः साहसदण्डः ।
(५) शस्त्रवर्मकवचलोहरथरत्नधान्यपशूनामन्यतमानिर्वाह्यं निर्वाहयतो यथावघुषितो दण्डः पण्यनाशश्च ।
(६) तेषामन्यतमस्यानयने बहिरेवोच्छुल्को विक्रयः ।
(७) अन्तपालः सपादपणिकां वर्तनीं गृह्णीयात् पण्यवहनस्य, पणिकामेकमुखरस्य, पशूनामर्धपणिकां, क्षुद्रपशूनां पादिकाम्, असभारस्य माषिकाम् । नष्टापहृतं च प्रतिविदध्यात् ।
( १ ) विवाहसंबंधी, विवाह में प्राप्त, सदावर्त्त या क्षेत्रों के लिये दिया गया दान, यज्ञकर्म एवं जन्मोत्सव के लिए भेजा हुआ देवपूजा, मुंडन, जनेऊ, गोदान और व्रत आदि धार्मिक कार्यों से संबद्ध माल पर चुंगी न ली जानी चाहिए ।
( २ ) किन्तु चुंगी के भय से जो व्यक्ति अपने माल का संबंध उक्त कार्यों से बताये तो उसे चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई व्यापारी चुंगी दिए माल के साथ बिना चुंगी दिए माल को निकाल ले जाय या इसी प्रकार बिना मुहर लगे माल को निकाल ले जाय, अथवा चुंगी दिए माल में बिना चुंगी का माल मिला दे, उस व्यापारी का वह बिना चुङ्गी का माल जब्त कर लिया जाय और उस पर उतना ही दण्ड निर्धारित किया जाय ।
( ४ ) जो व्यापारी चुङ्गी देने के भय से अपने अच्छे माल को घटिया बताकर धोखे से निकाल ले जाने की चेष्टा करे, उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ५ ) शस्त्र, कवच, लोहा, रथ, रत्न, अन्न और पशु आदि किसी भी प्रतिबन्ध लगी वस्तु को लाने-ले जाने वाले व्यापारी को पूर्व निर्धारित दण्ड दिया जाय और उसकी उस वस्तु को जब्त कर लिया जाय ।
( ६ ) इनमें से कोई वस्तु यदि बाहर लायी जाये तो वह बिना चुङ्गी दिये भी नगर-सीमाओं के बाहर बेची जा सकती है ।
( ७ ) सीमा रक्षक अन्तपाल को चाहिए कि वह माल ढोने वाली प्रति गाड़ी से मार्गरक्षा-कर ( वर्त्तनी ) के रूप में १¼ पण कर वसूल करे । घोड़े, खच्चर, गधे आदि एक खुर वाले पशुओं की गाड़ी पर एक पण, बैल आदि पशुओं पर आधा पण, बकरी, भेड़ आदि छोटे पशुओं पर चौथाई पण और कंधे पर भार ढोने वाले व्यक्तियों पर एक माष ( तांबे का सिक्का ) कर लेना चाहिए । यदि किसी व्यापारी की कोई
१८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वैदेश्यं सार्थं कृतसारफल्गुभाण्डविचयनमभिज्ञानं मुद्रां च दत्त्वा प्रेषयेदध्यक्षस्य ।
(२) वैदेहकव्यञ्जनो वा सार्थप्रमाणं राज्ञः प्रेषयेत् । तेन प्रदेशेन राजा शुल्काध्यक्षस्य सार्थप्रमाणमुपदिशेत्सर्वज्ञत्वख्यापनार्थम् । ततः सार्थ-मध्यक्षोऽभिगम्य ब्रूयात्—'इदममुष्यामुष्य च सारभाण्डं च निगूहंतव्यम्, एष राज्ञः प्रभावः' इति ।
(३) निगूहतः फल्गुभाण्डं शुल्काष्टगुणो दण्ड, सारभाण्डं सर्वापहारः ।
(४) राष्ट्रपीडाकरं भाण्डमुच्छिन्द्यादफलं च यत् ।
महोपकारमुच्छुल्कं कुर्याद्बीजं तु दुर्लभम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्काध्यक्षो नाम एकविंशोऽध्यायः,
आदित एकचत्वारिंशः ।
—: ० :—
वस्तु गुम हो गई हो या चोरी गई हो तो अन्तपाल उसका पता लगावे । नष्ट हुई वस्तु मिल जाय तो दे दे, अन्यथा अपने ही पास रख दे ।
(१) अन्तपाल को चाहिए कि वह विदेशी व्यापारियों के माल की भली-भाँति जाँच कर उस पर मुहर लगाये और रमन्ना काटकर उन्हें चुङ्गी के अध्यक्ष ( शुल्का-ध्यक्ष ) के पास भेज दे ।
(२) उन विदेशी व्यापारियों के साथ गुप्त व्यापारी का भेष धारण किये राजा का खुफिया व्यापारियों के सम्बन्ध की सारी सूचनाऐं पहिले ही राजा तक पहुँचा दे । इस सूचना को तथा व्यापारियों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी राजा, शुल्काध्यक्ष के पास भेज दे, जिससे कि राजा की जानकारी पर विश्वास किया जा सके और राजा की बात को विश्वासपूर्वक कहा जा सके । तदनुसार शुल्काध्यक्ष व्यापारियों से कहे 'आप लोगों में से अमुक-अमुक व्यापारी के पास इतना घटिया और इतना बढ़िया माल है, आप लोगों को कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए । देखिये, राजा का इतना प्रभाव है कि उससे कोई बात छिपी नहीं रह सकती है ।'
(३) जो व्यापारी घटिया माल को छिपाने का यत्न करे, उस पर चुङ्गी से आठ गुना जुर्माना और जो बढ़िया माल को छिपाये उसका सारा माल जब्त कर लेना चाहिए ।
(४) राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले विष या फल आदि माल को राजा नष्ट कर दे और यदि प्रजा का उपकार करने वाला तथा कठिनाई से प्राप्त होने वाला धान्य आदि माल हो तो उस पर चुङ्गी न लगाई जाय, जिससे उस माल का अपने देश में अधिक आयात हो ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३८ | # शुल्कव्यवहारः |
|---|---|
| अध्याय २२ |
(१) शुल्कव्यवहारो बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यम्; निष्क्राम्यं, प्रवेश्यं च शुल्कम् ।
(२) प्रवेश्यानां मूल्यपञ्चभागः ।
(३) पुष्पफलशाकमूलकन्दवल्लिक्यबीजशुष्कमत्स्यमांसानां षड्भागं गृह्णीयात् ।
(४) शंखवज्रमणिमुक्ताप्रवालहाराणां तज्जातपुरुषैः कारयेत्, कृत-कर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः ।
(५) क्षौमदुकूलक्रिमितानकङ्कटहरितालमनःशिलाहिङ्गुलुक्लोहवर्ण- धातूनां चन्दनागुरुकटुककिण्वावराणां सुरादन्ताजिनक्षौमदुकूलनिकरास्त- रणप्रावरणक्रिमिजातानामजैलकस्य च दशभागः, पञ्चदशभागो वा ।
करवसूली के नियम
( १ ) शुल्कव्यवहार ( उपयुक्त कर-वसूली ) के तीन प्रकार हैं : १. बाह्य ( अपने राज्य में उत्पन्न वस्तुओं की चुङ्गी ), २. आभ्यन्तर ( राजमहल तथा राज-धानी के भीतर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की चुङ्गी ) और ३. आतिथ्य ( विदेश से आने वाले माल की चुङ्गी )। इनके दो भाग हैं : १. निष्क्राम्य और २. प्रवेश्य । बाहर जाने वाले माल पर लगाई गई चुङ्गी को निष्क्राम्य और बाहर से आने वाले माल पर लगाई चुङ्गी को प्रवेश्य कहते हैं ।
( २ ) आयात माल पर सामान्यतः उसकी लागत का पाँचवाँ हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।
( ३ ) फूल, फल, साग, गाजर, मूल, शकरकन्द, धान्य, सूखी मछली और मांस, इन वस्तुओं पर उनकी लागत का छठा हिस्सा चुङ्गी लेनी चाहिए ।
( ४ ) शंख, हीरा, मणि, मुक्ता, प्रबाल और हार, इन मूल्यवान् वस्तुओं की चुङ्गी उनके विशेषज्ञों, पारखियों अथवा विशिष्ट रूप से नियत समय के लिए नियत वेतन पर नियुक्त व्यक्तियों द्वारा निर्धारित करनी चाहिए ।
( ५ ) मोटे तथा महीन रेशमी कपड़ों, कीमखाब, सूती कवच, हरताल, मैन-सिल, हिङ्गुल, लोहा, गेरू, चन्दन, अगर पीपल, ( कटुक ), मादक बीजों से निकाला
१९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वस्त्रचतुष्पदद्विपदसूत्रकार्पासगन्धभैषज्यकाष्ठवेणुवल्कचर्ममृद्भा-
ण्डानां धान्यस्नेहक्षारलवणमद्यपक्वान्नादीनां च विंशतिभागः पञ्चविंशति-
भागो वा ।
(२) द्वारादेयं शुल्कपञ्चभागः आनुग्राहिकं वा यथादेशोपकारं स्था-
पयेत् ।
(३) जातिभूमिषु च पण्यानामविक्रयः ।
(४) खनिभ्यो धातुपण्यादाने षट्छतमत्ययः ।
(५) पुष्पफलवाटेभ्यः पुष्पफलादाने चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ।
(६) षण्डेभ्यः शाकमूलकन्दादाने पादोनं द्विपञ्चाशतपणः ।
(७) क्षेत्रेभ्यः सर्वसस्यादाने त्रिपञ्चाशतपणः, पणोऽध्यर्धपणश्च सीतातत्ययः ।
गया द्रव्य, शराब, हाथदाँत, मृगचर्म, रेशमी तागे, बिछौना, ओढ़ना, अन्य रेशमी वस्त्र और बकरी तथा भेड़ की ऊन के बने कपड़ों आदि पर उनके मूल्य का पन्द्रहवां हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।
(१) मामूली सूती कपड़ों, चौपायों, दुपायों, सूत, कपास, दवाई, लकड़ी, बाँस, छाल, बैल आदि का चमड़ा, मिट्टी के बर्तन, अनाज, घी, तेल, खारा नमक, शराब और पके हुए अनाजों पर उनकी कीमत का बीसवां या पच्चीसवां भाग चुङ्गी लेनी चाहिए ।
(२) द्वारपाल को चाहिए कि वह, नगर के प्रधान द्वार से प्रविष्ट होने वाली वस्तुओं पर, उनके नियत कर का पांचवां हिस्सा टैक्स वसूल करे । हर प्रकार का कर इस ढंग से नियत करना चाहिए, जिससे देश का उपकार हो ।
(३) जिन प्रदेशों में जो चीजें पैदा होती हैं वहीं उनको बेचना नहीं चाहिए ।
(४) खानों से तैयार किया हुआ कच्चा माल खरीदने-बेचने वालों को ६०० पण दण्ड देना चाहिए ।
(५) फूल-फल के बगीचों में ही फूल-फल खरीदने-बेचने वालों को ५४ पण दण्ड देना चाहिए ।
(६) साक-भाजी के खेतों में ही साक, भाजी, तथा कन्द-मूल खरीदने-बेचने वालों को ५२ ३/४ पण दण्ड देना चाहिए ।
(७) इसी प्रकार अनाज के खेतों में ही अनाज खरीदने वालों को ५३ पण दण्ड देना चाहिए और अनाज को खेत से ही खरीदने-बेचने वालों को क्रमशः एक पण तथा डेढ़ पण दण्ड देना चाहिए ।
प्र० ३८ : अ० २२ ] कर वसूली के नियम १९१
(१) अतो नवपुराणानां देशजातिचरित्रतः ।
पण्यानां स्थापयेच्छुल्कमत्ययं चापकारतः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्कव्यवहारो नाम द्वाविंशोऽध्यायः,
आदितो द्विचत्वारिंशः ।
—: ० :—
( १ ) इसलिए राजा को चाहिए कि वह देश, जाति तथा आचार के अनुसार नये एवं पुराने हर पदार्थों पर कर की व्यवस्था करे, और उनमें जहाँ से नुकसान की सम्भावना हो, उसके लिए उचित दण्ड की व्यवस्था भी करे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शुल्कव्यवहार नामक बाइसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
प्रकरण ३९
अध्याय २३
सूत्राध्यक्षः
(१) सूत्राध्यक्षः सूत्रवर्मवस्त्ररज्जुव्यवहारं तज्जातपुरुषैः कारयेत् ।
(२) ऊर्णावल्ककार्पासतूलशणक्षौमाणि च विधवाव्यङ्गाकन्याप्रव्रजितादण्डाप्रतिकारिणीभी रूपाजीवामातृकाभिर्वृद्धराजदासीभिर्व्युपरतोपस्थानदेवदासीभिश्च कर्तयेत् ।
(३) श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । बह्वल्पतां च । सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात् ।
(४) तिथिषु प्रतिपादनमानैश्च कर्म कारयितव्याः । सूत्रह्रासे वेतनह्रासो द्रव्यसारात् ।
(५) कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारुभिश्च कर्म कारयेत्, प्रतिसंसर्गं च गच्छेत् ।
सूत-व्यवसाय का अध्यक्ष
( १ ) सूत-व्यवसाय के अध्यक्ष ( सूत्राध्यक्ष ) को चाहिए कि वह सूत, कवच, कपड़ा और रस्सी आदि के कातने, बुनने तथा बटने वाले निपुण कारीगरों से उनके इन कार्यों की जानकारी प्राप्त करे ।
( २ ) ऊन, बल्क, कपास, सेंमल, सन और जूट आदि को कतवाने के लिए विधवाओं, अङ्गहीन स्त्रियों, कन्याओं, सन्यासिनों, सजायाफ्ता स्त्रियों, वेश्याओं की खालाओं, बूढी दासियों और मन्दिर की दासियों को नियुक्त करना चाहिए ।
( ३ ) सूत की एकसारता, मोटाई और मध्यमता की अच्छी तरह जाँच करने के बाद उक्त-महिलाओं की मजदूरी नियत करनी चाहिए । कम-ज्यादा सूत कातने वाली स्त्रियों को उनके कार्य के अनुसार वेतन देना चाहिए । सूत का वजन अथवा लम्बाई को जानकर पुरस्कार रूप में उन्हें तेल, आँवला और उबटन देना चाहिए, जिससे वे प्रसन्न होकर अधिक कार्य करें ।
( ४ ) त्यौहारों और छुट्टी के दिनों में उन्हें भोजन, दान या संमान देकर उनसे कार्य करवाना चाहिए । निर्धारित मात्रा से सूत कम काता जाय तो, सूत के मूल्य के अनुसार उनका वेतन काटना चाहिए ।
( ५ ) नियत कार्य-काल और निश्चित वेतन के अनुसार ही कारीगरों को नियुक्त
प्र० ३६ : अ० २३ ] सूत व्यवसाय का अध्यक्ष १९३
(१) क्षौमदुकूलकृमितानराङ्कवकार्पाससूत्रवानकर्मान्तांश्च प्रयुञ्जानो गन्धमाल्यदानै रन्यैश्चौपग्राहिकै राराधयेत् । वस्त्रास्तरणप्रावरणविकल्पानुत्थापयेत् ।
(२) कंकटकर्मान्तांश्च तज्जातकारुशिल्पिभिः कारयेत् ।
(३) याश्चानिष्कासिन्यः प्रोषितविधवा व्यङ्गाः कन्यका वाऽऽत्मानं बिभृयुस्ताः स्वदासीभिरनुसार्य सोपग्रहं कर्म कारयितव्याः ।
(४) स्वयमागच्छन्तीनां वा सूत्रशालां प्रत्यूषसि भाण्डवेतनविनिमयं कारयेत् । सूत्रपरीक्षार्थमात्रः प्रदापः ।
(५) स्त्रिया मुखसन्दर्शनेऽन्यकार्यसम्भाषायां वा पूर्वः साहसदण्डः । वेतनकालातिपातने मध्यमः, अकृतकर्मवेतनप्रदाने च ।
(६) गृहीत्वा वेतनं कर्माकुर्वत्याः अङ्गुष्ठसन्दंशं दापयेत् । भक्षितापहृतावस्कन्दितानां च । वेतनेषु च कर्मकराणामपराधतो दण्डः ।
किया जाना चाहिए और उनसे सम्पर्क बनाये रखना चाहिए, जिससे कि कार्य में किसी प्रकार का कपट न होने पावे ।
( १ ) अध्यक्ष को चाहिए मोटे-महीन रेशमी कपड़े, चीनी रेशम, रंकु मृग की ऊन ( रांकव ) और कपास का सूत कातने-बुनने वाले कारीगरों को इत्र, फुलेल तथा अन्य पारितोषिक देकर सदा प्रसन्न चित्त रखे । उनसे वह ओढ़ने, बिछाने एवं पहनने के डिजाइनदार वस्त्र बनवाये ।
( २ ) निपुण कारीगरों से मोटे महीन सूत के कवच बनवाने चाहिए ।
( ३ ) जो स्त्रियाँ परदानसीन हों, जिनके पति परदेश गए हों, विधवा हों, जो लूली-लंगड़ी हों, जिनका विवाह न हुआ हो, जो आत्म निर्भर रहना चाहती हों, ऐसी स्त्रियों के सम्बन्ध में अध्यक्ष को चाहिए कि वह दासियों द्वारा सूत भेज कर उनसे कतवाये और उनके साथ अच्छा व्यवहार करे ।
( ४ ) घर पर काते हुए सूत को लेकर जो स्त्रियाँ स्वयं या दासियों को साथ लेकर प्रातः काल ही पुतलीघर ( सूत्रशाला ) में उपस्थित हों, उन्हें यथोचित मजदूरी दी जानी चाहिए । सूत्रशाला में अधिक सबेरा होने के कारण यदि कुछ अन्धेरा हो तो वहाँ उतना ही प्रकाश किया जाय, जिससे सूत अच्छी तरह देखा जा सके ।
( ५ ) स्त्री का मुख देखने या कार्य के अलावा इधर-उधर की बात करने वाले परीक्षक को प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । उन्हें उचित समय पर वेतन या मजदूरी न दी जाय तो मध्यम साहस दण्ड और कार्य न करने पर भी यदि वेतन दिया जाय तब भी मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए ।
( ६ ) जो स्त्री वेतन लेकर भी कार्य न करे उसका अंगूठा कटवा देना चाहिए ।
१३ कौ०
१९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) रज्जुवर्त्तकैश्चर्मकारैश्च स्वयं संसृज्येत। भाण्डानि च वरत्रादीनि वर्तयेत्।
(२) सूत्रवल्कमयी रज्जूर्वरत्रा वैत्रवैणवीः।
सांनाह्या बन्धनीयाश्च यानयुग्यस्य कारयेत्॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूत्राध्यक्षो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः,
आदितस्त्रयश्चत्वारिंशः।
—: ० :—
यही दण्ड उसको भी देना चाहिए, जो माल को चुराये, खो दे अथवा लेकर भाग जाय। प्रत्येक कर्मचारी को उसके अपराध के अनुसार शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए।
(१) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह रस्सी वटकर जीविकोपार्जन करने वाले तथा चमड़े का कार्य करने वाले कारीगरों से सम्पर्क बनाये रखे। उनसे वह गाय आदि बाँधने के लिए रस्सी तथा हर तरह का चमड़े आदि का सामान बनवाता रहे।
(२) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह सूत, सन आदि की रस्सियां और कवच बनाने तथा घोड़ा बांधने के उपयोगी बेत एवं बाँस की रस्सियां बनवाये।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सूत्राध्यक्ष नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
| प्रकरण ४० |
|---|
| अध्याय २४ |
सीताध्यक्षः
(१) सीताध्यक्षः कृषितन्त्रशुल्बवृक्षायुर्वेदज्ञस्तज्जसखो वा सर्वधान्य-पुष्पफलशाककन्दमूलवाल्लिक्यक्षौमकार्पासबीजानि यथाकालं गृह्णीयात् ।
(२) बहुहलपरिकृष्टायां स्वभूमौ दासकर्मकरदण्डप्रतिकर्तृभिर्वापयेत् ।
(३) कषणयन्त्रोपकरणबलीवर्दैश्चैषामसङ्गं कारयेत् । कारुभिश्च कर्मारकुट्टाकमेदकरज्जुवर्तकसर्पग्राहादिभिश्च ।
(४) तेषां कर्मफलविनिपाते तत्फलहानं दण्डः ।
(५) षोडशद्रोणं जांगलानां वर्षप्रमाणमध्यर्धमानूपानाम् । देशवापा-नाम् । अर्धत्रयोदशाश्मकानां, त्रयोविंशतिरवन्तीनाम्, अमितमपरान्तानाम्, हैमन्त्यानां च कुल्यावापानां च कालतः ।
कृषि विभाग का अध्यक्ष
(१) कृषि-विभाग के अध्यक्ष (सीताध्यक्ष) को यह आवश्यक है कि वह कृषिशास्त्र, शुल्बशास्त्र (पैमाइश) और वृक्ष-विज्ञान की पूरी जानकारी हासिल करें, अथवा इन सभी विद्याओं के विशेषज्ञों को अपना सहायक बनाकर यथासमय अन्न, फूल, फल, शाक, कंद, मूल, सन, जूट और कपास आदि के बीजों का संग्रह करे ।
(२) उन संग्रह किए हुए बीजों को वह क्रीतदासों, नौकरों और सपरिश्रम सजायाफ्ता कैदियों के द्वारा ऐसी भूमि में बुवाये, जो कई बार जोती गई हो ।
(३) खेत जोतने-बोने के साधन हल-बैल आदि से उनका कोई स्थायी सम्बन्ध न रखा जाय । इसी प्रकार कारीगरों, बढ़इयों, खाई खोदने वालों, रस्सी बटने वालों और संपेरों से उन कर्मचारियों का कोई स्थायी संसर्ग न होने दिया जाय ।
(४) यदि इन कारीगरों तथा बढ़ई आदि कर्मचारियों से खेती आदि में कोई नुकसान हो तो उसकी हानि उन्हीं से पूरी की जाय ।
(५) वर्षा-जल को मापने के लिए बनाये हुए एक हाथ मुँह वाले कुण्ड में यदि सोलह द्रोण पानी भर जाय तो समझना चाहिये कि रेतीली जमीन फसल बोने के योग्य हो गई है । इसी प्रकार जल बरसने वाले प्रदेशों के लिए चौबीस द्रोण पानी, दक्षिणी प्रदेशों के लिए साढ़े तेरह द्रोण पानी, मालव प्रदेश के लिए तेइस द्रोण पानी, पश्चिमी प्रदेशों के लिए अधिक-से-अधिक और हिमालय प्रदेशों तथा नहरी प्रांतों के लिए समय-समय का पानी, फसल बोने के लिए उचित है ।
१९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वर्षत्रिभागः पूर्वपश्चिममासयोः, द्वौ त्रिभागौ मध्यमयोः सुषमारूपम् ।
(२) तस्योपलब्धिर्बृहस्पतेः स्थानगमनगर्भाधानेभ्यः शुक्रोदयास्तमयचारेभ्यः सूर्यस्य प्रकृतिवैकृताच्च ।
(३) सूर्याद्बीजसिद्धिः । बृहस्पतेः सस्यानां स्तम्बकारिता । शुक्राद्वृष्टिरिति ।
(४) त्रयः साप्ताहिका मेघा अशीतिः कणशीकराः ।
षष्टिरातपमेघानामेषा वृष्टिः समाहिता ॥
(५) वातमातपयोगं च विभजन् यत्र वर्षति ।
त्रीन् कर्षकांश्च जनयंस्तत्र सस्यागमो ध्रुवः ॥
(६) ततः प्रभूतोदकमल्पोदकं वा सस्यं वापयेत् ।
(७) शालिव्रीहिकोद्रवतिलप्रियङ्गुदारकवरकाः पूर्ववापाः । मुद्गमाषशैम्ब्या मध्यवापाः । कुसुम्भमसूरकुलत्थयवगोधूमकलायातसीसर्षपाः पश्चाद्वापाः ।
( १ ) वारिश के अनुपात से यदि एक हिस्सा श्रावण-कार्तिक में और दो हिस्सा भाद्रपद-आश्विन में पानी बरसे तो वह वर्ष फसल के लिए लाभदायी समझना चाहिए।
( २ ) अच्छे वर्ष के आसार इन बातों पर निर्भर हैं : जब बृहस्पति मेष राशि से वृष राशि पर संक्रमण करें, जब गर्भाधान अर्थात् मार्गशीर्ष आदि छह महीनों में कोहरा, वर्षा, बादल आदि देखे जांय, जब शुक्र ग्रह की उदयास्त गति आषाढ की पंचमी आदि नौ तिथियों में संचारित हो, और जब सूर्य के चारों ओर मंगल दिखाई दे, ये सभी अच्छी वर्षा के लक्षण है ।
( ३ ) यदि सूर्य के चारों ओर मंडल पड़ा हो तो अनाज के अच्छे दाने का अनुमान करना चाहिए । यदि बृहस्पति वृष राशि का हो तो अच्छी फसल का अनुमान करना चाहिए । यदि शुक्र की उदयास्त गति कारण हो तो अच्छी वृष्टि का अनुमान करना चाहिए ।
( ४ ) लगातार सात दिन में तीन बार वर्षा उत्तम है, सारी वर्षार्ऋतु में अस्सी बार बूंदों की वर्षा भी उत्तम है, यदि साठ बार धूप खिल कर फिर बार-बार वर्षा होती रहे तो वह वर्षा अति उत्तम मानी गई है ।
( ५ ) बीच-बीच में हवा के चलने और धूप के खिलने का अन्तर छोड़कर यदि वर्षा हो ओर तीन-तीन दिन हल चलाने का अवसर देकर यदि वर्षा हो तो उत्तम फसल होने का अनुमान करना चाहिए ।
( ६ ) वर्षा के अनुपात से ही बीज बोना चाहिए ।
( ७ ) साठी या धान ( शालि ), गेहूँ-जौ-ज्वार ( ब्रीहि ), कोदो, तिल, कांगनी ( प्रियंगु ) और लोभिया आदि को वर्षा शुरू होने के पहिले ही बो देना चाहिए । मूंग, उड़द और छीमी आदि को वर्षा के मध्य में बोना चाहिए । कुसुंबी, मसूर,
प्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९७
(१) यथर्तुवशेन वा बीजवापाः ।
(२) वापातिरिक्तमर्धसीतिकाः कुर्युः । स्ववीर्योपजीविनो वा चतुर्थ-पञ्चभागिकाः । यथेष्टमनवसितभागं दद्युरन्यत्र कृच्छ्रेभ्यः ।
(३) स्वसेतुभ्यो हस्तप्रावर्तितममुदकभागं पंचमं दद्युः । स्कन्दप्रावर्तितं चतुर्थम् । स्रोतोयन्त्रप्रावर्तितं च तृतीयम् ।
(४) चतुर्थं नदीसरस्तटाककूपोद्घाटम् ।
(५) कर्मोदकप्रमाणेण कैदारं हैमनं ग्रैष्मिकं वा सस्यं स्थापयेत् ।
(६) शाल्यादि ज्येष्ठम् । षण्डो मध्यमः । इक्षुः प्रत्यवरः । इक्षवो हि बह्वाबाधा व्ययग्राहिणश्च ।
(७) फेनाघातो वल्लीफलानाम्, परीवाहान्ताः पिप्पलीमुद्वीकेक्षूणाम्, कूपपर्यन्ताः शाकमूलानाम्, हरिणिपर्यन्ता हरितकानाम्, पाल्यो लवानां
कुल्थी, जो, गेहूँ, मटर, अलसी और सरसों आदि अन्नों को वर्षा के अन्त में बोना चाहिए ।
( १ ) अथवा इन सभी अन्नों को ऋतु के अनुसार, जैसा उचित हो बोना चाहिए।
( २ ) जो खेत बोये न गये हों, उन्हें सीताध्यक्ष आधी कटाई पर दूसरे किसानों को बोने के लिए दे दे । अथवा जो लोग शारीरिक श्रम पर ही जीवित हैं, उनको यह जमीन दे दी जाय और उस जमीन की पैदावार का चौथा या पाचवां भाग उन्हें दिया जाय या स्वामी की इच्छानुसार ही उनको दिया जाय, किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि उन्हें उस प्रदत्त भाग को स्वीकार करने में कोई कष्ट न हो ।
( ३ ) अपने धन और बाहुबल से बनाये गए तालाबों से यदि सिंचाई की जाय तो उस उपज का पांचवां हिस्सा राजा को देना चाहिए । अपने कन्धों पर जल लाकर यदि वह खेतों की सिंचाई करता है तो उसे चौथाई हिस्सा राजा को देना चाहिए । यदि वह नहर या नालियां बना कर खेतों को सींचता है तो उसे पैदावार का तीसरा ही हिस्सा देना चाहिए ।
( ४ ) अपने धन और श्रम से यदि नदी, झील और कुओं पर रहट लगाकर खेत की सिंचाई की जाय तो पैदावार का चौथा भाग राजा को देना चाहिए ।
( ५ ) ऋतु के अनुसार तथा पानी की सुविधा देखकर ही खेतों में बीज बोना चाहिए ।
( ६ ) धान, गेहूँ आदि की फसल उत्तम मानी गई है । कँदली आदि की फसल मध्यम कोटि की है । ईख की फसल ओछी मानी गई है, क्योंकि इसके बोने में बड़ा श्रम करना पड़ता है और अनेक बाधाओं से उसकी रक्षा करनी पड़ती है ।
( ७ ) नदी के कछारों एवं किनारों की जमीन का पेठा, कद्दू, ककड़ी तथा तरबूज आदि बोने के लिए उपयुक्त है, पीपल और ईख आदि बोने के लिए वह जमीन उपयुक्त है, जहाँ पर नदी का जल एक बार घूम गया हो, साग-भाजी बोने के
| १९८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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गन्धभैषज्योशीरह्रीबेरपिण्डालुकादीनाम् । यथास्वं भूमिषु च स्थूल्याश्चा-
नूप्याश्चौषधीः स्थापयेत् ।
(१) तुषारपायनमुष्णशोषणं चासप्तरात्रादिति धान्यबीजानां, त्रिरात्रं पंचरात्रं वा कोशीधान्यानां, मधुघृतसूकरवसाभिः शकृद्युक्ताभिः काण्डबीजानां छेदलेपो मधुघृतेन कन्दानाम् । अस्थिबीजानां शकृदालेपः । शाखिनां गर्तदाहो गोऽस्थिशकृद्भिः काले दौहृदं च ।
(२) प्ररूढांश्चाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहिक्षीरेण पाययेत् ।
(३) कार्पास्सारं निर्मोकं सर्पस्य च समाहरेत् ।
न सर्पास्तत्र तिष्ठन्ति धूमो यत्रैष तिष्ठति ॥
(४) सर्वबीजानां तु प्रथमवापे सुवर्णोदकसंप्लुतां पूर्वमुष्टिं वापयेत् अमुं च मन्त्रं ब्रूयात्—
'प्रजापतये काश्यपाय देवाय नमः सदा ।
सीता मे ऋध्यतां देवी बीजेषु च धनेषु च' ॥
लिए कुए के आस-पास की जमीन उपयुक्त है, जई आदि बोने के लिए भील तथा तालाबों के किनारे की गीली जमीन उपयुक्त है, धनिया, जीरा, खस, नेत्रवाला तथा कचालू आदि बोने के लिए ऐसे खेत उपयुक्त हैं जिनके बीच में तालाब बने हों, सूखी और गीली, जमीन में जिन-जिन अनाजों की अधिक उपज हो उनको समझ कर बोना चाहिए ।
( १ ) धान के बीजों की सात दिन तक रात की ओस और दिन की धूप में रखना चाहिए । मूंग, उड़द आदि के बीजों को इसी प्रकार तीन दिन-रात या पांच दिन-रात ओस और धूप में रखना चाहिए, बोए जाने वाले ईख के पोरों की कटी हुई जगहों में शहद, घी या सुअर की चर्बी के साथ गोबर मिला कर लगा देना चाहिए, सूरन, शकरकन्द आदि कन्दफलों के कटे हुए स्थानों पर गोबर-शहद का लेप अथवा घी का लेप लगा देना चाहिए, कपास आदि के बीजों को गोबर आदि से लपेट कर बोना चाहिए, आम, कटहल आदि वृक्षों के बीजों को किसी गढ़े में डाल कर कुछ गर्मी दी जाने के बाद उन्हें गाय की हड्डी और गोबर के साथ मिलाकर रखा जाना चाहिए, निष्कर्ष यह कि इन सब प्रकार के बीजों का यथाविधि संस्कार करके फिर इनको खेत में बोना चाहिए ।
( २ ) बीज बोने के बाद जब उनमें अंकुर निकल जांय तब उनमें छोटी मछलियों की खाद छुड़वा देनी चाहिए और उन्हें सेहुड़ के दूध से सींचना चाहिए ।
( ३ ) साँप की केंचुली और बिनौलों को एक साथ मिलाकर जला दिया जाय, जहां तक उसका धुआं फैलेगा वहां तक कोई भी सांप नहीं ठहर सकता ।
( ४ ) बोने से पहिले हरेक बीज को सुवर्ण से स्पर्श हुए जल में भिगोना चाहिए और तब बोते समय बीज की पहिली मुट्ठी भरकर यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ;
प्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९९
(१) षण्डवाटगोपालकदासकर्मकरेभ्यो यथापुरुषपरिवापं भक्तं कुर्यात् । सपादपणिकं मासं दद्यात् । कर्मानुरूपं कारुभ्यो भक्तवेतनम् ।
(२) प्रशीर्णं पुष्पफलं देवकार्यार्थं व्रीहियवमाग्रयणार्थं श्रोत्रियास्तपस्विनश्चाहरेयुः । राशीमूलमुच्छवृत्तयः ।
(३) यथाकालं च सस्यादि जातं जातं प्रवेशयेत् ।
न क्षेत्रे स्थापयेत् किञ्चित् पलालमपि पण्डितः ॥
(४) प्रकराणां समुच्छ्रायान् वलभीर्वा तथाविधाः ।
न संहतानि कुर्वीत न तुच्छानि शिरांसि च ॥
(५) खलस्य प्रकरान् कुर्यान्मण्डलान्ते समाश्रितान् ।
अनग्निकाः सोदकाश्च खले स्युः परिकर्मिणः ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सीताध्यक्षो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः,
आदितश्चतुश्चत्वारिंशः ।
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'प्रजापति, सूर्यपुत्र और मेघ, तुम्हारी सदैव हम वन्दना करते हैं, हे धरती माता, हमारे बीजों और अनाजों में सदा वृद्धि होती रहे'।
( १ ) खेतों की रखवाली करने वाले ग्वाले, दास और नौकर आदि प्रत्येक को उनकी मेहनत के अनुसार भोजन-वस्त्र आदि दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें प्रतिमास सवा पण नियत वेतन मिलना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे कारीगरों को भी उनके परिश्रम के अनुसार भोजन, वस्त्र और वेतन आदि दिया जाना चाहिए।
( २ ) पेड़ों से अपने आप गिरे हुए फल-फूलों को देवकार्य के लिए, तथा गेहूँ जौ आदि अन्नों को इष्ट देवता को भोग लगाने के लिए श्रोत्रिय और तपस्वी लोग उठा लें। खलिहान उठ जाने पर जो अन्न के दाने पड़े रह जांय उन्हें सीता बीनकर गुजर करने वाले लोग उठा लें।
( ३ ) ठीक समय पर तैयार हुई फसल को सुरक्षित स्थान में रखवा देना चाहिए, पुआल और भूसा आदि असार वस्तुओं को भी उठाकर ले जाना चाहिए।
( ४ ) अनाज रखने का स्थान ( प्रकर ) कुछ ऊँची जगह में बनवाना चाहिए, उसी प्रकार के मजबूत तथा घिरे हुए अन्नागारों को बनवाना चाहिए, उनके ऊपरी हिस्से न तो आपस में मिले हुए हों और न वे खाली हों।
( ५ ) कटे हुए अनाज को रखने की जगह ( खलिहान ) और दाँई लेने की जगह ( मण्डल ) दोनों आस-पास होने चाहिए। खलिहान में काम करने वाले व्यक्ति अपने पास आग न रखें किन्तु उनके पास जल का प्रबन्ध अवश्य होना चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौबीसवां अध्याय समाप्त।
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प्रकरण ४१ | सुराध्यक्षः
अध्याय २५ |
(१) सुराध्यक्षः सुराकिण्वव्यवहारान् दुर्गे जनपदे स्कन्धावारे वा तज्जातसुराकिण्वव्यवहारिभिः कारयेदेकमुखमनेकमुखं वा, विक्रयक्रयवशेन वा। षट्छतमत्ययमन्यत्र कर्तृक्रेतृविक्रेतॄणां स्थापयेत् । ग्रामादनिर्णयनम-सम्पातं च सुरायाः, प्रमादभयात् कर्मसु निर्दिष्टानां मर्यादातिक्कमभया-दार्याणाम् । उत्साहभयाच्च तीक्ष्णानाम् ।
(२) लक्षितमल्पं वा चतुर्भागमर्धकुडुवं कुडुबमर्धप्रस्थं प्रस्थं वेति ज्ञातशौचा निर्हरेयुः ।
(३) पानागारेषु वा पिबेयुरसञ्चारिणः ।
(४) निक्षेपोपनिधिप्रयोगापहृतादीनामनिष्टोपगतानां च द्रव्याणां ज्ञानार्थमस्वामिकं कुप्यं हिरण्यं चोपलभ्य निक्षेप्तारमन्यत्र व्यपदेशेन ग्राहयेत् । अतिव्ययकर्तारमनायतिव्ययं च ।
आबकारी विभाग का अध्यक्ष
(१) आबकारी विभाग के अध्यक्ष (सुराध्यक्ष) को चाहिए कि वह दुर्ग, जनपद, अथवा छावनी आदि में सुरा के व्यापार का प्रबन्ध, शराब के बनाने वाले तथा बेचने वाले निपुण व्यक्तियों के द्वारा करवाये, शराब का ठेका एक बड़े व्यापारी को दिया जाय या अनेक छोटे-छोटे व्यापारियों को, अथवा क्रय-विक्रय की जैसी व्यवस्था उचित जँचे, तदनुसार ही उसकी विक्री का प्रबन्ध किया जाय । ठेक़ों के अलावा अन्यत्र शराब बनाने, बेचने और खरीदने वालों पर ६०० पण जुर्माना किया जाय । शराब तथा शराबी को गाँव से बाहर, एक घर से दूसरे घर, अथवा भीड़ में न जाने दिया जाय, क्योंकि ऐसा करने से एक तो राजकीय कर्मचारी कार्यों की हानि करने लगेंगे, दूसरे में आर्य लोग अपनी मर्यादा को भंग कर सकते हैं, और तीसरे में तेज मिजाज सैनिक हथियारों का भी प्रयोग कर सकते हैं ।
(२) सुविदित आचार-व्यवहार वाले लोग चौथाई कुडव, आधा कुडव, एक कुडव, आधा प्रस्थ या एक प्रस्थ मुहरबन्द शराब साथ भी ले जा सकते हैं ।
(३) जिन लोगों को शराब साथ ले जाने की आज्ञा न हो वे मदिरालय में ही बैठकर शराब पीयें ।
(४) यदि कोई व्यक्ति धरोहर, गिरवी, चोरी-डाका आदि का धन और सोना-चांदी आदि वस्तुओं को शराबखाने में गिरवी रख कर शराब पीये तो उसको वहाँ
प्र० ४१ : अ० २५ ] आबकारी विभाग का अध्यक्ष २०१
(१) न चानर्घेण कालिकां वा सुरां दद्यादन्यत्र दुष्टसुरायाः । तामन्यत्र विक्रापयेत् । दासकर्मकरेभ्यो वा वेतनं दद्यात् । वाहनप्रतिपानं सूकरपोषणं वा दद्यात् ।
(२) पानागाराण्यनेककक्ष्याणि विभक्तशयनासनवन्ति पानोद्देशानि गन्धमाल्योदकवन्ति ऋतुसुखानि कारयेत् ।
(३) तत्रस्थाः प्रकृत्यौत्पत्तिकौ व्ययौ गूढा विद्युरागन्तूंश्च ।
(४) क्रेतॄणां मत्तसप्तानामलङ्काराच्छादनहिरण्यानि च विद्युः । तन्नाशे वणिजस्तच्च तावच्च दण्डं दद्युः ।
(५) वणिजस्तु संवृतेषु कक्ष्याविभागेषु स्वदासीभिः पेशलरूपाभिरागन्तूनां वास्तव्यानां च आर्यरूपाणां मत्तसुप्तानां भावं विद्युः ।
(६) मेदकप्रसन्नासवारिष्टमैरेयमधूनाम् ।
से बाहर कर किसी दूसरे बहाने से नगराध्यक्ष के हवाले करा देना चाहिए । इसी प्रकार जो व्यक्ति आमदनी से अधिक या बिना आमदनी के ही फजूल खर्च करे उसे भी गिरफ्तार करा देना चाहिए ।
( १ ) थोड़ी कीमत पर, उधार या व्याज सहित अदा होने के मूल्य पर बढ़िया शराब न बेचनी चाहिए, बल्कि ऐसे खरीदारों को घटिया शराब देनी चाहिए । घटिया शराब को बढ़िया शराब की दुकान से न बेचना चाहिए । घटिया शराब या तो दास जैसे छोटे कर्मचारियों को वेतन के रूप में दे देनी चाहिए, अथवा बैल-ऊंट की सवारी हांकने वालों तथा सूअर का पालन-पोषण करने वालों को दे देनी चाहिए ।
( २ ) शराबखानों में अनेक ड्योढ़ियां होनी चाहिए, लेटने तथा बैठने के लिए अलग-अलग कमरे होने चाहिए, शराब पीने के लिए अलग स्थान होने चाहिए, उनमें सुगन्धित द्रव्यों एवं पानी आदि का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए, ये सभी स्थान ऐसे बने हों, जो मौसम में सुखद हों ।
( ३ ) सरकारी गुप्तचर को चाहिए कि वह प्रतिदिन शराब की खपत तथा खर्च का हिसाब रखे और यह भी निगरानी रखे कि बाहर से कौन-कौन व्यक्ति वहाँ आते हैं ।
( ४ ) शराब के नशे में बेहोश हो जाने वाले लोगों के जेवर, वस्त्र और नकदी का भी गुप्तचर ध्यान रखे । यदि बेहोश हालत में शराबियों की कोई चीज चोरी हो जाय तो उसको ठेकेदार ही अदा करे, वरन्, वह उतनी ही लागत का जुर्माना राजा को भी अदा करे ।
( ५ ) ठेकेदार को चाहिये कि वह चतुर एवं सुन्दरी दासियों के द्वारा, अलग-अलग कमरों में बेहोश उन बाहर से आये या नगर के रहने वाले, ऊपर से आर्य लगने वाले, शराबियों के भीतरी भावों का पता लगाये ।
( ६ ) शराब कई प्रकार की होती है : १. मेदक, २. प्रसन्ना ३. आसव ४. अरिष्ट ५. मैरेय और ६. मधु ।
२०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) उदकद्रोणं तण्डुलानामर्धाढकं त्रयः प्रस्थाः किण्वस्येति मेदकयोगः ।
(२) द्वादशाढकं पिष्टस्य पञ्च प्रस्थाः किण्वस्य पुत्रकत्वक्फलयुक्तो वा जातिसम्भारः प्रसन्नायोगः ।
(३) कपित्थतुला फाणितं पञ्चतौलिकं प्रस्थो मधुन इत्यासवयोगः । पादाधिको ज्येष्ठः पादहीनः कनिष्ठः ।
(४) चिकित्सकप्रमाणाः प्रत्येकशो विकाराणामरिष्टाः ।
(५) मेषशृङ्गीत्वक्क्वाथाभिषुतो गुलप्रतीवापः पिप्पलीमरिचसम्भारस्त्रिफलायुक्तो वा मैरेयः । गुलयुक्तानां वा सर्वेषां त्रिफलासम्भारः ।
(६) मृद्वीकारसो मधु । तस्य स्वदेशे व्याख्यानं कापिशायनं हारहूरकमिति ।
(७) माषकलनीद्रोणमामं सिद्धं वा त्रिभागाधिकतण्डुलं मोरटादीनां कार्षिकभागयुक्तं किण्वाबन्धः ।
( १ ) एक द्रोण जल, आधा आढक चावल और तीन प्रस्थ सुराबीज (किण्व), इनके मेल से जो शराब बनाई जाती है उसका नाम मेदक है ।
( २ ) बारह आढक चावल की पिट्ठी, पाँच प्रस्थ सुराबीज ( किण्व ) अथवा उसकी जगह पुत्रक ( वृक्ष ) की छाल तथा फलों सहित जाति-संभार मिलाकर प्रसन्ना शराब तैयार की जाती है ।
( ३ ) सौ पल कैंथफल का सार, पाँच सौ पल राब और एक प्रस्थ शहद को एक साथ मिलाकर आसव शराब बनाई जाती है । उक्त वस्तुओं के योग को यदि सवापण कर दिया जाय तो उत्तम आसव और पौना कर दिया जाय तो घटिया आसव कहा जाता है ।
( ४ ) प्रत्येक रोग का अरिष्ट उसी प्रकार तैयार किया जाना चाहिए, जैसा कि रोग के अनुसार वैद्य बतलाये ।
( ५ ) मेढासिंगी की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें गुड़, पीपल और मिर्च का चूर्ण या पीपल, मिर्च की जगह त्रिफला का चूर्ण मिलाया जाय तो मैरेय शराब तैयार हो जाती है । गुड़ वाली सभी शराबों में त्रिफला का चूर्ण मिलाना आवश्यक है ।
( ६ ) दाख या अंगूर के रस से जो शराब बनाई जाती है उसी का नाम मधु है । अपने देश में उसके दो नाम है : कापिशायन और हारहूरक ।
( ७ ) एक द्रोण उड़द का कल्क, उसका तीसरा भाग ( १ ⅓ ) चावल और एक-एक कर्ष मोरटा आदि वस्तुएँ एक साथ मिलाकर किण्व सुरा बनती है, उसी को मद्यबीज या सुराबीज भी कहते हैं ।
प्र० ४१ : अ० २५ ] आबकारी विभागों का अध्यक्ष २०३
(१) पाठालोध्रतेजोवत्येलावालुकमधुमधुरसाप्रियङ्गुदारुहरिद्रामरिचपिप्पलीनां च पञ्चकार्षिकः सम्भारयोगो मेदकस्य प्रसन्नायाश्च। मधुकनिर्यूहयुक्ता कटशर्करा वर्णप्रसादनी च।
(२) चोचचित्रकविडङ्गगजपिप्पलीनां च कार्षिकः क्रमुकमधुकमुस्तालोध्राणां द्विकार्षिकश्चासवसम्भारः दशभागश्चैषां बीजबन्धः।
(३) प्रसन्नायोगः श्वेतसुरायाः।
(४) सहकारसुरा रसोत्तरा बीजोत्तरा वा महासुरा सम्भारिकी वा।
(५) तासां मोरटापलाशपत्तूरमेषशृङ्गीकरञ्जक्षीरवृक्षकषायभावितं दग्धकटशर्कराचूर्णं लोध्रचित्रकबिडङ्गपाठामुस्ताकलिङ्गयवदारुहरिद्रन्दीवरशतपुष्पापामार्गसप्तपर्णनिम्बास्फोटकल्कार्धयुक्तमन्तर्नखो मुष्टिःकुम्भीं राजपेयां प्रसादयति। फाणितः पञ्चपलिकश्चात्र रसवृद्धिर्देयः।
( १ ) पाठा, लोध, गजपीपल, इलाइची, इत्र, मुलहटी, दूब, केशर, दारुहल्दी, मिर्च और पीपल, इन सब चीजों का पांच-पांच कर्ष मिला देने से सम्भारयोग तैयार होता है, जो मेदक और प्रसन्ना सुरा में मिलाया जाता है। मुलहटी के काढ़े में रवेदार शक्कर मिलाकर यदि मेदक तथा प्रसन्ना में छोड़ दिया जाय तो उनका रङ्ग निखर आता है।
( २ ) दालचीनी, चीता, बायविडंग और गजपीपल का एक-एक कर्ष, सुपारी, मुलहटी मोथा तथा लोध का दो-दो कर्ष लेकर इन सब को आपस में मिला दिया जाय तो आसव सुरा का मसाला बन जाता है। दालचीनी आदि उक्त वस्तुओं का दसवां भाग बीजबन्ध कहलाता है।
( ३ ) प्रसन्ना नामक सुरा का जो योग बताया गया है वही श्वेतसुरा का भी समझना चाहिए।
( ४ ) सुरा के चार भेद हैं : १. सहकारसुरा ( साधारण शराब में आम का रस या तेल डालकर बनती है ), २. रसोत्तरा ( गुड़ की चाशनी छोड़कर बनाई जाती है ), ३. बीजोत्तरा ( बीजबन्ध द्रव्यों को छोड़कर बनाई जाती है ), इसी को महा-सुरा भी कहते हैं, और ४. संभारिकी ( अधिक मसाले छोड़कर बनाई जाती है )।
( ५ ) इन सभी शराबों की सफाई एवं निखार का तरीका इस प्रकार है : मरोरफली, पलाश, लोहमारक ( पत्तूर औषध ), मेढ़ासिंगी, करञ्जवा तथा क्षीर-वृक्ष ( बरगद, गूलर आदि ) के काढ़े में भावना दिया गया गर्म रवेदार शक्कर का चूरा, उसका आधा लोध, चीता, बायविडङ्ग, पाठा, मोथा कर्लिंगज जौ, दारु-हल्दी, कमल, सौंफ, चिरचिड़ा, सप्तपर्ण, नींव और आखे का फूल, इन सबका पिसा हुआ चूर्ण एकत्र करके यदि उसकी एक मुट्ठी, एक खारी परिमाण शराब में डाल दी जाय तो
२०४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) कुटुम्बिनः कृत्येषु श्वेतसुरामौषधार्थं वारिष्टमन्यद्वा कतुं लभेरन् ।
(२) उत्सवसमाजयात्रासु चतुरहः सौरिको देयः । तेष्वननुज्ञातानां प्रवहणान्तं दैवसिकमत्ययं गृह्णीयात् ।
(३) सुराकिण्वविचयं स्त्रियो बालाश्च कुर्युः ।
(४) अराजपण्याः पञ्चकं शतं शुल्कं दद्युः । सुरकामेदकारिष्टमधु-फलाम्लशीधूनां च ।
(५) अह्नश्च विक्रयं व्याजीं ज्ञात्वा मानहिरण्ययोः ।
तथा वैधरणं कुर्यादुचितं चानुवर्तयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सुराध्यक्षो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चचत्वारिंशः ।
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शराब का रंग इतना निखर उठता है कि वह राजाओं तक को मोहित कर लेती है । स्वाद बढ़ाने के लिये उसमें पांच पल राब अधिक मिला देनी चाहिए ।
( १ ) नगर तथा जनपद के निवासी विवाह आदि उत्सवों में श्वेतसुरा और दवाई के लिए आसव अथवा मेदक आदि सुरा अपने घर में बना सकते हैं ।
( २ ) उत्सवों में, मित्र-बन्धुओं के समाज में और तीर्थयात्रा के अवसर पर, सुरा के अध्यक्ष को चार दिन तक सुरा पीने की इजाजत दे देनी चाहिए । यदि इन उत्सवों में कोई भी व्यक्ति बिना आज्ञा प्राप्त किये शराब पिये पकड़ा जाय तो उत्सव समाप्त होने पर उसको यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) सुरा को बनाने एवं उसका मसाला तैयार करने के लिये स्त्रियों और बालकों को नियुक्त करना चाहिए ।
( ४ ) बिना राजाज्ञा के जो व्यक्ति उत्सवों के अवसर पर शराब बेचें वे साधारण शराब, मेदक, अरिष्ट, मधु, ताड़ी और रसोत्तरा आदि सुराओं का पांच प्रतिशत शुल्क अदा करें ।
( ५ ) इस शुल्क अदायगी के अतिरिक्त सुराध्यक्ष दैनिक बिक्री और तोल-माप की उचित जानकारी प्राप्त कर नाप-तौल पर सोलहवाँ हिस्सा और नकद आमदनी पर बीसवां हिस्सा टैक्स वसूल करे, किन्तु उनके साथ सदा ही उचित व्यवहार बर्ताव बनाये रखे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सुराध्यक्ष नामक पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ४२ | सूनाध्यक्षः |
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| अध्याय २६ |
(१) सूनाध्यक्षः प्रदिष्टभयानामभयवनवासिनां च मृगपशुपक्षि-मत्स्यानां बन्धवधहिंसायामुत्तमं दण्डं कारयेत् । कुटुम्बिनामभयवनपरि-ग्रहेषु मध्यमम् ।
(२) अप्रवृत्तवधानां मत्स्यपक्षिणां बन्धवधहिंसायां पादोनसप्तविंशति-पणमत्ययं कुर्यात्, मृगपशूनां द्विगुणम् ।
(३) प्रवृत्तहिंसानामपरिगृहीतानां षड्भागं गृह्णीयात् । मत्स्यपक्षिणां दशभागं वाधिकं, मृगपशूनां शुल्कं वाधिकम् ।
(४) पक्षिमृगाणां जीवत्षड्भागमभयवनेषु प्रमुञ्चेत् ।
(५) सामुद्रहस्त्यश्वपुरुषवृषभगर्धभाकृतयो मत्स्याः सारसा नादेयास्त-टाककुल्योद्भूवा वा, क्रौञ्चोत्क्रोशकदात्यूहहंसचक्रवाकजीवञ्जीवकभृङ्ग-
वधस्थान का अध्यक्ष
( १ ) सरकारी जंगलों या ऋषियों के आश्रमों में रहनेवाले ऐसे मृग, गेंडा, भैंसा, मोर तथा मछलियां, जिनको मारने-पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है, कोई भी व्यक्ति उनको मारे, पकड़े या क्षति पहुँचाये तो सून ( वधस्थान ) का अध्यक्ष उसे उत्तम साहस दण्ड दिलवाये । कोई राजपरिवार के व्यक्ति इस आज्ञा का उल्लंघन करें तो उन्हें मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए ।
( २ ) पक्षी और मछली जैसे अहिंसक प्राणियों को पकड़ने, प्रहार करने या मारनेवाले व्यक्ति को पौने सत्ताईस पण का दण्ड दिया जाय । जो व्यक्ति मृग और पशुओं का वध करे उसको दुगुना ( साढ़े तिरपन पण ) दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जो हिंसक जानवर हों, जिनका कोई मालिक न हो, जो सरकारी जंगलों या ऋषि-आश्रमों के न हों, उनका जो शिकार करे उससे सूनाध्यक्ष छठा हिस्सा सरकारी टैक्स के रूप में ले ले । इसी प्रकार मछली तथा पक्षियों का दसवां हिस्सा या उससे कुछ अधिक और मृग आदि, पशुओं का भी दशवां हिस्सा या उससे कुछ अधिक राजभाग ले लेना चाहिए ।
( ४ ) अरक्षित जङ्गलों से पकड़े हुए पक्षी और मृग आदि का छठा भाग लेकर उन्हें सरकारी जङ्गलों में छोड़ देना चाहिए ।
( ५ ) समुद्र में पैदा होने वाले; हाथी, घोड़े, पुरुष, बैल, गधा आदि की आकृति वाले, मत्स्य, सारस आदि जलचर प्राणी; तालाबों, झीलों, नदियों एवं नहरों में पैदा होने वाली मछलियाँ, क्रोंच, टिटहरी, जलकौवा, हंस, चक्रवाक, जीवंजीवक,
२०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
राजचकोरमत्तकोकिलमयूरशुकमदनशारिका विहारपक्षिणो मङ्गल्याश्चा-
ऽन्येऽपि प्राणिनः पक्षिम्शृगा हिंसाबाधेभ्यो रक्ष्याः । रक्षातिक्रमे पूर्वः साहस-
दण्डः ।(१) मृगपशूनामनस्थि मांसं सद्योहतं विक्रीणीरन् । अस्थिमतः प्रति-
पातं दद्युः । तुलाहीने हीनाष्टगुणम् ।(२) वत्सो वृषो धेनुश्चैषामवध्याः । घ्नतः पञ्चाशतको दण्डः ।
क्लिष्टघातं घातयतश्च ।(३) परिसूनमशिरःपादास्थि विगन्धं स्वयम्मृतं च न विक्रीणीरन् ।
अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।(४) दुष्टाः पशुमृगव्याला मत्स्याश्चाभयचारिणः ।
अन्यत्र गुप्तित्स्थानेभ्यो वधबन्धमवाप्नुयुः ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूनाध्यक्षो नाम षड्विंशोऽध्यायः,
आदितोः षट्चत्वारिंशः ।— : ० : —
भृङ्गराज, चकोर, मत्तकोकिल, मोर, तोता, मदन मैना और बुलबुल, तीतर, बटेर तथा मुर्गा आदि क्रीडायोग्य पक्षियों की रक्षा करनी चाहिए । इनको कोई मारे, पकड़े तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( १ ) मृग और पशुओं का हड्डी-रहित ताजा मांस बाजार में बेचना चाहिए । मांस यदि हड्डी सहित हो तो हड्डी के वजन का अधिक मांस दिया जाना चाहिए । यदि मांस तौलने में कपट किया जाय तो तौलने वाले से आठ गुना मांस दण्डरूप में वसूल करना चाहिए, जिसमें आठवां हिस्सा खरीदार का और बाकी सात हिस्से सूनाध्यक्ष के हैं ।
( २ ) पशुओं में मृग, बछड़ा, सांड़ और गाय, इन्हें कभी न मारना चाहिए । जो व्यक्ति उनमें से किसी एक को भी मारे वह पचास पण का दण्डभागी है । दूसरे पशुओं को यातना देकर मारने वाले व्यक्तियों पर भी पचास पण जुर्माना करना चाहिए ।
( ३ ) कसाईखाने से बाहर मारे हुए जानवरों का मांस, शिर, पैर तथा हड्डी-रहित मांस, बदबू वाला मांस, रोग आदि के कारण स्वयं मरे हुए जानवर का मांस बाजारों में न बेचा जाय । जो इस नियम का उल्लंघन करता हुआ पकड़ा जाय उस पर बारह पण जुर्माना कर दिया जाय ।
( ४ ) राज-रक्षित जङ्गलों के हमलावर जानवर, नीलगाय, पशु, मृग और मछली आदि वनचर-जलचर प्राणी यदि सुरक्षित जङ्गलों से बाहर चले जाँय तो उनको मारा या पकड़ा जा सकता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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