Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 287 of 918

Read in context
Page 287

प्र० ४१ : अ० २५ ] आबकारी विभागों का अध्यक्ष २०३

(१) पाठालोध्रतेजोवत्येलावालुकमधुमधुरसाप्रियङ्गुदारुहरिद्रामरिचपिप्पलीनां च पञ्चकार्षिकः सम्भारयोगो मेदकस्य प्रसन्नायाश्च। मधुकनिर्यूहयुक्ता कटशर्करा वर्णप्रसादनी च।
(२) चोचचित्रकविडङ्गगजपिप्पलीनां च कार्षिकः क्रमुकमधुकमुस्तालोध्राणां द्विकार्षिकश्चासवसम्भारः दशभागश्चैषां बीजबन्धः।
(३) प्रसन्नायोगः श्वेतसुरायाः।
(४) सहकारसुरा रसोत्तरा बीजोत्तरा वा महासुरा सम्भारिकी वा।
(५) तासां मोरटापलाशपत्तूरमेषशृङ्गीकरञ्जक्षीरवृक्षकषायभावितं दग्धकटशर्कराचूर्णं लोध्रचित्रकबिडङ्गपाठामुस्ताकलिङ्गयवदारुहरिद्रन्दीवरशतपुष्पापामार्गसप्तपर्णनिम्बास्फोटकल्कार्धयुक्तमन्तर्नखो मुष्टिःकुम्भीं राजपेयां प्रसादयति। फाणितः पञ्चपलिकश्चात्र रसवृद्धिर्देयः।


( १ ) पाठा, लोध, गजपीपल, इलाइची, इत्र, मुलहटी, दूब, केशर, दारुहल्दी, मिर्च और पीपल, इन सब चीजों का पांच-पांच कर्ष मिला देने से सम्भारयोग तैयार होता है, जो मेदक और प्रसन्ना सुरा में मिलाया जाता है। मुलहटी के काढ़े में रवेदार शक्कर मिलाकर यदि मेदक तथा प्रसन्ना में छोड़ दिया जाय तो उनका रङ्ग निखर आता है।

( २ ) दालचीनी, चीता, बायविडंग और गजपीपल का एक-एक कर्ष, सुपारी, मुलहटी मोथा तथा लोध का दो-दो कर्ष लेकर इन सब को आपस में मिला दिया जाय तो आसव सुरा का मसाला बन जाता है। दालचीनी आदि उक्त वस्तुओं का दसवां भाग बीजबन्ध कहलाता है।

( ३ ) प्रसन्ना नामक सुरा का जो योग बताया गया है वही श्वेतसुरा का भी समझना चाहिए।

( ४ ) सुरा के चार भेद हैं : १. सहकारसुरा ( साधारण शराब में आम का रस या तेल डालकर बनती है ), २. रसोत्तरा ( गुड़ की चाशनी छोड़कर बनाई जाती है ), ३. बीजोत्तरा ( बीजबन्ध द्रव्यों को छोड़कर बनाई जाती है ), इसी को महा-सुरा भी कहते हैं, और ४. संभारिकी ( अधिक मसाले छोड़कर बनाई जाती है )।

( ५ ) इन सभी शराबों की सफाई एवं निखार का तरीका इस प्रकार है : मरोरफली, पलाश, लोहमारक ( पत्तूर औषध ), मेढ़ासिंगी, करञ्जवा तथा क्षीर-वृक्ष ( बरगद, गूलर आदि ) के काढ़े में भावना दिया गया गर्म रवेदार शक्कर का चूरा, उसका आधा लोध, चीता, बायविडङ्ग, पाठा, मोथा कर्लिंगज जौ, दारु-हल्दी, कमल, सौंफ, चिरचिड़ा, सप्तपर्ण, नींव और आखे का फूल, इन सबका पिसा हुआ चूर्ण एकत्र करके यदि उसकी एक मुट्ठी, एक खारी परिमाण शराब में डाल दी जाय तो