कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९७
(१) यथर्तुवशेन वा बीजवापाः ।
(२) वापातिरिक्तमर्धसीतिकाः कुर्युः । स्ववीर्योपजीविनो वा चतुर्थ-पञ्चभागिकाः । यथेष्टमनवसितभागं दद्युरन्यत्र कृच्छ्रेभ्यः ।
(३) स्वसेतुभ्यो हस्तप्रावर्तितममुदकभागं पंचमं दद्युः । स्कन्दप्रावर्तितं चतुर्थम् । स्रोतोयन्त्रप्रावर्तितं च तृतीयम् ।
(४) चतुर्थं नदीसरस्तटाककूपोद्घाटम् ।
(५) कर्मोदकप्रमाणेण कैदारं हैमनं ग्रैष्मिकं वा सस्यं स्थापयेत् ।
(६) शाल्यादि ज्येष्ठम् । षण्डो मध्यमः । इक्षुः प्रत्यवरः । इक्षवो हि बह्वाबाधा व्ययग्राहिणश्च ।
(७) फेनाघातो वल्लीफलानाम्, परीवाहान्ताः पिप्पलीमुद्वीकेक्षूणाम्, कूपपर्यन्ताः शाकमूलानाम्, हरिणिपर्यन्ता हरितकानाम्, पाल्यो लवानां
कुल्थी, जो, गेहूँ, मटर, अलसी और सरसों आदि अन्नों को वर्षा के अन्त में बोना चाहिए ।
( १ ) अथवा इन सभी अन्नों को ऋतु के अनुसार, जैसा उचित हो बोना चाहिए।
( २ ) जो खेत बोये न गये हों, उन्हें सीताध्यक्ष आधी कटाई पर दूसरे किसानों को बोने के लिए दे दे । अथवा जो लोग शारीरिक श्रम पर ही जीवित हैं, उनको यह जमीन दे दी जाय और उस जमीन की पैदावार का चौथा या पाचवां भाग उन्हें दिया जाय या स्वामी की इच्छानुसार ही उनको दिया जाय, किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि उन्हें उस प्रदत्त भाग को स्वीकार करने में कोई कष्ट न हो ।
( ३ ) अपने धन और बाहुबल से बनाये गए तालाबों से यदि सिंचाई की जाय तो उस उपज का पांचवां हिस्सा राजा को देना चाहिए । अपने कन्धों पर जल लाकर यदि वह खेतों की सिंचाई करता है तो उसे चौथाई हिस्सा राजा को देना चाहिए । यदि वह नहर या नालियां बना कर खेतों को सींचता है तो उसे पैदावार का तीसरा ही हिस्सा देना चाहिए ।
( ४ ) अपने धन और श्रम से यदि नदी, झील और कुओं पर रहट लगाकर खेत की सिंचाई की जाय तो पैदावार का चौथा भाग राजा को देना चाहिए ।
( ५ ) ऋतु के अनुसार तथा पानी की सुविधा देखकर ही खेतों में बीज बोना चाहिए ।
( ६ ) धान, गेहूँ आदि की फसल उत्तम मानी गई है । कँदली आदि की फसल मध्यम कोटि की है । ईख की फसल ओछी मानी गई है, क्योंकि इसके बोने में बड़ा श्रम करना पड़ता है और अनेक बाधाओं से उसकी रक्षा करनी पड़ती है ।
( ७ ) नदी के कछारों एवं किनारों की जमीन का पेठा, कद्दू, ककड़ी तथा तरबूज आदि बोने के लिए उपयुक्त है, पीपल और ईख आदि बोने के लिए वह जमीन उपयुक्त है, जहाँ पर नदी का जल एक बार घूम गया हो, साग-भाजी बोने के