कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ४० |
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| अध्याय २४ |
सीताध्यक्षः
(१) सीताध्यक्षः कृषितन्त्रशुल्बवृक्षायुर्वेदज्ञस्तज्जसखो वा सर्वधान्य-पुष्पफलशाककन्दमूलवाल्लिक्यक्षौमकार्पासबीजानि यथाकालं गृह्णीयात् ।
(२) बहुहलपरिकृष्टायां स्वभूमौ दासकर्मकरदण्डप्रतिकर्तृभिर्वापयेत् ।
(३) कषणयन्त्रोपकरणबलीवर्दैश्चैषामसङ्गं कारयेत् । कारुभिश्च कर्मारकुट्टाकमेदकरज्जुवर्तकसर्पग्राहादिभिश्च ।
(४) तेषां कर्मफलविनिपाते तत्फलहानं दण्डः ।
(५) षोडशद्रोणं जांगलानां वर्षप्रमाणमध्यर्धमानूपानाम् । देशवापा-नाम् । अर्धत्रयोदशाश्मकानां, त्रयोविंशतिरवन्तीनाम्, अमितमपरान्तानाम्, हैमन्त्यानां च कुल्यावापानां च कालतः ।
कृषि विभाग का अध्यक्ष
(१) कृषि-विभाग के अध्यक्ष (सीताध्यक्ष) को यह आवश्यक है कि वह कृषिशास्त्र, शुल्बशास्त्र (पैमाइश) और वृक्ष-विज्ञान की पूरी जानकारी हासिल करें, अथवा इन सभी विद्याओं के विशेषज्ञों को अपना सहायक बनाकर यथासमय अन्न, फूल, फल, शाक, कंद, मूल, सन, जूट और कपास आदि के बीजों का संग्रह करे ।
(२) उन संग्रह किए हुए बीजों को वह क्रीतदासों, नौकरों और सपरिश्रम सजायाफ्ता कैदियों के द्वारा ऐसी भूमि में बुवाये, जो कई बार जोती गई हो ।
(३) खेत जोतने-बोने के साधन हल-बैल आदि से उनका कोई स्थायी सम्बन्ध न रखा जाय । इसी प्रकार कारीगरों, बढ़इयों, खाई खोदने वालों, रस्सी बटने वालों और संपेरों से उन कर्मचारियों का कोई स्थायी संसर्ग न होने दिया जाय ।
(४) यदि इन कारीगरों तथा बढ़ई आदि कर्मचारियों से खेती आदि में कोई नुकसान हो तो उसकी हानि उन्हीं से पूरी की जाय ।
(५) वर्षा-जल को मापने के लिए बनाये हुए एक हाथ मुँह वाले कुण्ड में यदि सोलह द्रोण पानी भर जाय तो समझना चाहिये कि रेतीली जमीन फसल बोने के योग्य हो गई है । इसी प्रकार जल बरसने वाले प्रदेशों के लिए चौबीस द्रोण पानी, दक्षिणी प्रदेशों के लिए साढ़े तेरह द्रोण पानी, मालव प्रदेश के लिए तेइस द्रोण पानी, पश्चिमी प्रदेशों के लिए अधिक-से-अधिक और हिमालय प्रदेशों तथा नहरी प्रांतों के लिए समय-समय का पानी, फसल बोने के लिए उचित है ।