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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 274 of 918

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Page 274

१९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) वस्त्रचतुष्पदद्विपदसूत्रकार्पासगन्धभैषज्यकाष्ठवेणुवल्कचर्ममृद्भा-
ण्डानां धान्यस्नेहक्षारलवणमद्यपक्वान्नादीनां च विंशतिभागः पञ्चविंशति-
भागो वा ।
(२) द्वारादेयं शुल्कपञ्चभागः आनुग्राहिकं वा यथादेशोपकारं स्था-
पयेत् ।
(३) जातिभूमिषु च पण्यानामविक्रयः ।
(४) खनिभ्यो धातुपण्यादाने षट्छतमत्ययः ।
(५) पुष्पफलवाटेभ्यः पुष्पफलादाने चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ।
(६) षण्डेभ्यः शाकमूलकन्दादाने पादोनं द्विपञ्चाशतपणः ।
(७) क्षेत्रेभ्यः सर्वसस्यादाने त्रिपञ्चाशतपणः, पणोऽध्यर्धपणश्च सीतातत्ययः ।


गया द्रव्य, शराब, हाथदाँत, मृगचर्म, रेशमी तागे, बिछौना, ओढ़ना, अन्य रेशमी वस्त्र और बकरी तथा भेड़ की ऊन के बने कपड़ों आदि पर उनके मूल्य का पन्द्रहवां हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।

(१) मामूली सूती कपड़ों, चौपायों, दुपायों, सूत, कपास, दवाई, लकड़ी, बाँस, छाल, बैल आदि का चमड़ा, मिट्टी के बर्तन, अनाज, घी, तेल, खारा नमक, शराब और पके हुए अनाजों पर उनकी कीमत का बीसवां या पच्चीसवां भाग चुङ्गी लेनी चाहिए ।

(२) द्वारपाल को चाहिए कि वह, नगर के प्रधान द्वार से प्रविष्ट होने वाली वस्तुओं पर, उनके नियत कर का पांचवां हिस्सा टैक्स वसूल करे । हर प्रकार का कर इस ढंग से नियत करना चाहिए, जिससे देश का उपकार हो ।

(३) जिन प्रदेशों में जो चीजें पैदा होती हैं वहीं उनको बेचना नहीं चाहिए ।

(४) खानों से तैयार किया हुआ कच्चा माल खरीदने-बेचने वालों को ६०० पण दण्ड देना चाहिए ।

(५) फूल-फल के बगीचों में ही फूल-फल खरीदने-बेचने वालों को ५४ पण दण्ड देना चाहिए ।

(६) साक-भाजी के खेतों में ही साक, भाजी, तथा कन्द-मूल खरीदने-बेचने वालों को ५२ ३/४ पण दण्ड देना चाहिए ।

(७) इसी प्रकार अनाज के खेतों में ही अनाज खरीदने वालों को ५३ पण दण्ड देना चाहिए और अनाज को खेत से ही खरीदने-बेचने वालों को क्रमशः एक पण तथा डेढ़ पण दण्ड देना चाहिए ।