कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context२०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
राजचकोरमत्तकोकिलमयूरशुकमदनशारिका विहारपक्षिणो मङ्गल्याश्चा-
ऽन्येऽपि प्राणिनः पक्षिम्शृगा हिंसाबाधेभ्यो रक्ष्याः । रक्षातिक्रमे पूर्वः साहस-
दण्डः ।(१) मृगपशूनामनस्थि मांसं सद्योहतं विक्रीणीरन् । अस्थिमतः प्रति-
पातं दद्युः । तुलाहीने हीनाष्टगुणम् ।(२) वत्सो वृषो धेनुश्चैषामवध्याः । घ्नतः पञ्चाशतको दण्डः ।
क्लिष्टघातं घातयतश्च ।(३) परिसूनमशिरःपादास्थि विगन्धं स्वयम्मृतं च न विक्रीणीरन् ।
अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।(४) दुष्टाः पशुमृगव्याला मत्स्याश्चाभयचारिणः ।
अन्यत्र गुप्तित्स्थानेभ्यो वधबन्धमवाप्नुयुः ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूनाध्यक्षो नाम षड्विंशोऽध्यायः,
आदितोः षट्चत्वारिंशः ।— : ० : —
भृङ्गराज, चकोर, मत्तकोकिल, मोर, तोता, मदन मैना और बुलबुल, तीतर, बटेर तथा मुर्गा आदि क्रीडायोग्य पक्षियों की रक्षा करनी चाहिए । इनको कोई मारे, पकड़े तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( १ ) मृग और पशुओं का हड्डी-रहित ताजा मांस बाजार में बेचना चाहिए । मांस यदि हड्डी सहित हो तो हड्डी के वजन का अधिक मांस दिया जाना चाहिए । यदि मांस तौलने में कपट किया जाय तो तौलने वाले से आठ गुना मांस दण्डरूप में वसूल करना चाहिए, जिसमें आठवां हिस्सा खरीदार का और बाकी सात हिस्से सूनाध्यक्ष के हैं ।
( २ ) पशुओं में मृग, बछड़ा, सांड़ और गाय, इन्हें कभी न मारना चाहिए । जो व्यक्ति उनमें से किसी एक को भी मारे वह पचास पण का दण्डभागी है । दूसरे पशुओं को यातना देकर मारने वाले व्यक्तियों पर भी पचास पण जुर्माना करना चाहिए ।
( ३ ) कसाईखाने से बाहर मारे हुए जानवरों का मांस, शिर, पैर तथा हड्डी-रहित मांस, बदबू वाला मांस, रोग आदि के कारण स्वयं मरे हुए जानवर का मांस बाजारों में न बेचा जाय । जो इस नियम का उल्लंघन करता हुआ पकड़ा जाय उस पर बारह पण जुर्माना कर दिया जाय ।
( ४ ) राज-रक्षित जङ्गलों के हमलावर जानवर, नीलगाय, पशु, मृग और मछली आदि वनचर-जलचर प्राणी यदि सुरक्षित जङ्गलों से बाहर चले जाँय तो उनको मारा या पकड़ा जा सकता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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