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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 282 of 918

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Page 282
१९८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

गन्धभैषज्योशीरह्रीबेरपिण्डालुकादीनाम् । यथास्वं भूमिषु च स्थूल्याश्चा-
नूप्याश्चौषधीः स्थापयेत् ।
(१) तुषारपायनमुष्णशोषणं चासप्तरात्रादिति धान्यबीजानां, त्रिरात्रं पंचरात्रं वा कोशीधान्यानां, मधुघृतसूकरवसाभिः शकृद्युक्ताभिः काण्डबीजानां छेदलेपो मधुघृतेन कन्दानाम् । अस्थिबीजानां शकृदालेपः । शाखिनां गर्तदाहो गोऽस्थिशकृद्भिः काले दौहृदं च ।
(२) प्ररूढांश्चाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहिक्षीरेण पाययेत् ।
(३) कार्पास्सारं निर्मोकं सर्पस्य च समाहरेत् ।
न सर्पास्तत्र तिष्ठन्ति धूमो यत्रैष तिष्ठति ॥
(४) सर्वबीजानां तु प्रथमवापे सुवर्णोदकसंप्लुतां पूर्वमुष्टिं वापयेत् अमुं च मन्त्रं ब्रूयात्—
'प्रजापतये काश्यपाय देवाय नमः सदा ।
सीता मे ऋध्यतां देवी बीजेषु च धनेषु च' ॥


लिए कुए के आस-पास की जमीन उपयुक्त है, जई आदि बोने के लिए भील तथा तालाबों के किनारे की गीली जमीन उपयुक्त है, धनिया, जीरा, खस, नेत्रवाला तथा कचालू आदि बोने के लिए ऐसे खेत उपयुक्त हैं जिनके बीच में तालाब बने हों, सूखी और गीली, जमीन में जिन-जिन अनाजों की अधिक उपज हो उनको समझ कर बोना चाहिए ।

( १ ) धान के बीजों की सात दिन तक रात की ओस और दिन की धूप में रखना चाहिए । मूंग, उड़द आदि के बीजों को इसी प्रकार तीन दिन-रात या पांच दिन-रात ओस और धूप में रखना चाहिए, बोए जाने वाले ईख के पोरों की कटी हुई जगहों में शहद, घी या सुअर की चर्बी के साथ गोबर मिला कर लगा देना चाहिए, सूरन, शकरकन्द आदि कन्दफलों के कटे हुए स्थानों पर गोबर-शहद का लेप अथवा घी का लेप लगा देना चाहिए, कपास आदि के बीजों को गोबर आदि से लपेट कर बोना चाहिए, आम, कटहल आदि वृक्षों के बीजों को किसी गढ़े में डाल कर कुछ गर्मी दी जाने के बाद उन्हें गाय की हड्डी और गोबर के साथ मिलाकर रखा जाना चाहिए, निष्कर्ष यह कि इन सब प्रकार के बीजों का यथाविधि संस्कार करके फिर इनको खेत में बोना चाहिए ।

( २ ) बीज बोने के बाद जब उनमें अंकुर निकल जांय तब उनमें छोटी मछलियों की खाद छुड़वा देनी चाहिए और उन्हें सेहुड़ के दूध से सींचना चाहिए ।

( ३ ) साँप की केंचुली और बिनौलों को एक साथ मिलाकर जला दिया जाय, जहां तक उसका धुआं फैलेगा वहां तक कोई भी सांप नहीं ठहर सकता ।

( ४ ) बोने से पहिले हरेक बीज को सुवर्ण से स्पर्श हुए जल में भिगोना चाहिए और तब बोते समय बीज की पहिली मुट्ठी भरकर यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ;