कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ७७१
षष्ठ लम्बक ७७१
उस दिव्य मनुष्य के छत्र और ध्वजा से चिह्नित तथा निष्पंक कोमल चरणकमल थे।
सो जाने पर छिपी हुई विद्या के कारण उसका बदला हुआ रूप समाप्त हो गया और वह
स्पष्टतया अपने वास्तविक रूप में दीख रहा था॥१७८॥
इस स्थिति को देखकर परम सन्तुष्ट योगेश्वर न जो कुछ देखा उसे मन्त्री यौगन्धरायण
को बताते हुए उसने कहा—॥१७९॥
हे स्वामी ! मैं कुछ भी नहीं जानता तुम नीति की माँखा से सब कुछ जानते हो।
तुम्हारे ही उपाय से यह दुःसाध्य कार्य भी सिद्ध हो गया ॥१८०॥
बिना सूर्य के आकाश क्या है और बिना जल के सरोवर क्या है ? बिना मन्त्री के राज्य
क्या है और बिना सत्य के वचन क्या है ? ॥१८१॥
इस प्रकार कहते हुए योगेश्वर का विदा करके यौगन्धरायण प्रातःकाल ही वत्सराज से
मिलने गया ॥१८२॥
उसके पास जाकर वार्तालाप के प्रसंग में अवसर पाकर राजा से कलिंगसेना-सम्बन्धी
कार्य के लिए सम्मति पूछता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण कहने लगा ॥१८३॥
वह कलिंगसेना स्वैरिणी (स्वतन्त्र स्त्री) है। यह आपके हाथों से स्पर्श करने योग्य
नहीं है। अपनी इच्छा से यह प्रसेनजित् राजा को देखने आई थी किन्तु उसे वृद्ध देखकर
रूप के लोभ से तुम्हारे पास आ गयी। यह दूसरे पुरुष का संग भी अपनी इच्छा से
करती है॥१८४-१८५॥
यौगन्धरायण से ऐसा सुनकर, 'एक अच्छे कुल की कन्या ऐसा कैसे कर सकती है और
मेरे रनिवास में पर-पुरुष को घुसने की शक्ति कैसे हुई ? ॥१८६॥
राजा के इस प्रकार प्रश्न करने पर बुद्धिमान् यौगन्धरायण कहने लगा—'महाराज !
आज ही रात में आपको सब प्रत्यक्ष दिखा दूँगा' ॥१८७॥
जिस विद्याधर आदि देवता उसे चाहते हैं, तो मनुष्यों की क्या ही कथा है। और, राजन् !
दिव्य व्यक्तियों की गति को कौन रोक सकता है ? ॥१८८॥
अतः आइए और प्रत्यक्ष देखिए। ऐसा कहते हुए मन्त्री के साथ राजा ने रात्रि के समय
कलिंगसेना के रनिवास में जाने की इच्छा प्रकट की॥१८९॥
'पद्मावती के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री का विवाह राजा से नहीं होगा यह जो मैंने
तुमसे प्रतिज्ञा की थी उसे आज मैंने पूर्ण कर दिया' ॥१९०॥
यौगन्धरायण ने रानी वासवदत्ता के पास जाकर ऐसा कहा और कलिंगसेना का सारा
वृत्तान्त उसे विस्तारपूर्वक सुना दिया ॥१९१॥
प्रणाम करती हुई वासवदत्ता ने भी 'तुम्हारी शिक्षा के अनुसार कार्य करने का
यह परिणाम है'—ऐसा कहकर मन्त्री का अभिनन्दन किया ॥१९२॥
ततो निशीथे संसुप्ते जने वत्सेश्वरो ययौ।
गृहं कलिङ्गसेनायाः स च यौगन्धरायणः ॥१९३॥
अदृष्टश्च प्रविष्टोऽत्र तस्या निद्राजुषोऽन्तिके।
सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपस्थं ददर्श सः ॥१९४॥
हन्तुमिच्छति यावच्च स स साहसिको नृपः।
तावत्स विद्यया विद्याधरोऽभूत्प्रतिबोधितः ॥१९५॥
प्रबुद्धश्च स निर्गत्य झगित्युदपतन्नभः।
क्षणात्कलिङ्गसेनाऽपि सा प्रबुद्धाभवत्ततः ॥१९६॥
शून्यं शयनमालोक्य जगाद च कथं हि माम्।
पूर्वं प्रबुध्य वत्सेशः सुप्तां मुक्त्वाव गच्छति ॥१९७॥
तदाकर्ण्य स वत्सेशमाह यौगन्धरायणः।
एषा विश्वसितानेन शृणु त्वद्रूपधारिणा ॥१९८॥
सैष योगबलाज्ज्ञात्वा साक्षात्ते दर्शितो मया।
किं तु दिव्यप्रभावत्वादसौ हन्तुं न शक्यते ॥१९९॥
इत्युक्त्वा स च राजा च सह तामुपजग्मतुः।
कलिङ्गसेना साप्यात्तौ दृष्ट्वा तस्थौ कृतादरा ॥२००॥
अद्युनेव क्व गत्वा त्वं राजन् प्राप्तः समन्त्रिकः।
इति ब्रुवाणामवदत्तां स यौगन्धरायणः ॥२०१॥
कलिङ्गसेने ! केनापि मायावत्सेशरूपिणी।
संमोह्य परिणीतासि न त्वं मत्स्वामिनाधुना ॥२०२॥
तच्छ्रुत्वा सातिसम्भ्रान्ता विद्धेव हृदि पत्रिणा।
कलिङ्गसेना नरपं जगादोदश्रुलोचना ॥२०३॥
गान्धर्वविधिनाहं ते परिणीतापि विस्मृता।
किं स्विद्राजन् यथापूर्वं दुष्पन्तस्य शकुन्तला ॥२०४॥
इत्युक्तः स तया राजा तामुवाचामलाननः।
सत्यं न परिणीतासि मयाद्यैवागतो ह्यहम् ॥२०५॥
इत्युक्तवन्तं नरपं मन्त्री यौगन्धरायणः।
एहीत्युक्त्वा ततः स्वैरमनैषीद्राजमन्दिरम् ॥२०६॥