कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पंचम लम्बक ५२५
[Page Header]
पंचम लम्बक ५२५
मैं बहुत पहले अपने देश से यहाँ आ गया था। अब तुम यहीं रहो। शीघ्र ही द्वीपान्तरों
से आनेवाले व्यापारी बनियों के कानों-कान तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा॥६७-६८॥
ऐसा कहकर अपने कुल का पता लगाकर विष्णुदत्त ने उस समय के योग्य उपचारों से
शक्तिदेव की सेवा की॥६९॥
शक्तिदेव भी उसे पाकर मार्ग के दुःसह कष्टों को भूल गया। विदेश में अपने बन्धु
जन का मिलना मरुभूमि में अमृत के झरने के समान सुखद होता है॥७०॥
उसने अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि को भी समीप आया हुआ समझा। किसी कार्य
के प्रसंग के बीच में आनेवाला क्षेम कार्य की समृद्धि का सूचक होता है॥७१॥
तब रात्रि में शय्या पर लेटे हुए, अपनी कार्य-सिद्धि की चिन्ता में जागते हुए शक्तिदेव
के पास सोया हुआ विष्णुदत्त उसकी कार्य-सिद्धि का समर्थन करता हुआ इस प्रकार की कथा
उसको सुनाने लगा—॥७२-७३॥
अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा
पुराने समय में यमुना नदी के तट पर एक विशाल गाँव में गोविन्दस्वामी नाम का एक
श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था॥७४॥
उस गुणी ब्राह्मण के उसी के समान दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम अशोकदत्त
और छोटे का नाम विजयदत्त था॥७५॥
उसके वहाँ रहते हुए दैवयोग से उस ग्राम में भीषण अकाल पड़ गया। तब गोविन्द
स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—अकाल के कारण यह देश नष्ट हो रहा है। अतः मैं अपने
सामने अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों की दुर्दशा नहीं देख सकता॥७६-७७॥
इसलिए हमारे घर में जितना अन्न है उसे 'किसे कितना देना है'—यह निश्चय करके
मित्रों और बन्धुओं को दे डालो। तब यहाँ से किसी दूसरे देश को चलें॥७८॥
यहाँ से चलकर कुटुम्ब के साथ वाराणशी नगरी को चलें। इस प्रकार अपनी पत्नी से
परामर्श करके उसने अपने घर का सारा अन्न बाँट दिया॥७९॥
तदनन्तर, अपनी स्त्री बालक और सेवक के साथ उस देश से चल पड़ा। उच्चकोटि
के व्यक्ति अपने व्यक्तियों का कष्ट नहीं देखना चाहते॥८०॥
गच्छंश्च मार्गे जटिलं भस्मपाण्डुं कपालिनम्।
सार्धचन्द्रमिवेशानं महाव्रतिनमक्षत॥८१॥
उपेत्य ज्ञानिनं तं च नत्वा स्नेहेन पुत्रयोः।
शुभाशुभं स पप्रच्छ सोऽप्य योगी जगाद तम्॥८२॥
पुत्रौ त भाविकल्याणौ किं स्वनेन कनीयसा।
ब्रह्मन्विजयदत्तेन वियोगस्ते भविष्यति॥८३॥
ततोऽन्याशोकदत्तस्य द्वितीयस्य प्रभावतः।
एतेन सह युष्माकं भूयो भावी समागमः॥८४॥
इत्युक्तस्तेन गोविन्दस्वामी स ज्ञानिना सदा।
मुमुचुः साद्भुताश्चान्तस्तमामन्त्र्य ततो ययौ॥८५॥
प्राप्य वाराणस्रीं तां च तद्वाह्ये चण्डिकागृहे।
न्नि तत्प्रातिषेन्नाम देवीपूजादिकर्मणा॥८६॥
भाया च तत्रैव बहिः सकुडुम्बस्तरास्तलम्।
समावसद कार्पटिकः सोऽन्यदेशागतैः सह॥८७॥
रात्रौ च तत्र सुप्तेषु सर्वेष्वधिगताध्वसु।
श्रान्तेष्वास्तीर्णपर्णादिपान्थशय्यानिपातिषु ॥८८॥
तदीयस्य विबुद्धस्य तस्याकस्मात्कनीयसः।
सूनोर्विजयदत्तस्य महान् शीतज्वरोऽजनि॥८९॥
स तमं सहसा भावि बन्धुविश्लेषहेतुना।
भयेनेव ज्वरेणाभूदूर्ध्वरोमा सबाष्पयुः॥९०॥
शीतातंश्च प्रबोध्यैव पितरं स्वमवाच तम्।
बाधत तात तीव्रो मामिह शीतज्वरोऽधुना॥९१॥
तन्मे समिधमानीय शीतघ्नं ज्वलयानलम्।
नान्यथा मम शास्तिः स्यान्नयय न च यामिनीम्॥९२॥
तच्छ्रुत्वा तं स गोविन्दस्वामी तद्वेदनाकुलः।
तावत्कुतोऽधुना वह्निर्वत्सेति च समन्यथात्॥९३॥
नन्वयं निकटे तात पश्यत्यग्निर्ज्वलन्नितः।
भूमिष्ठेऽत्रव तद्गत्वा किं नाङ्गं तापयाम्यहम्॥९४॥
तस्मात् सकम्पं हस्ते मां गृहीत्वा प्रापय द्रुतम्।
इत्युक्तस्तेन पुत्रेण पुनर्विप्रोऽपि सोऽब्रवीत्॥९५॥