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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

चतुर्थ लम्बक ४४५

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चतुर्थ लम्बक ४४५

वह पर्वतीय प्रदेश उस सरोवर के निर्मल जल को पीते हुए सोयों के विश्राम के लिए
रति के निवास-स्थान के समान सुखद हुआ॥१४॥
दूसरे दिन प्रातःकाल विविध प्रकार की उत्कंठाओं के कारण उछलते हुए और उस कन्या
के मार्ग पर दौड़ते हुए मन से तथा उसे देखने की इच्छा से फड़कते हुए दाहिने नेत्र से उसकी प्रतीक्षा
कर रहे थे कि इतने में वह वहाँ आ गई। लहराते अयालवाले सिंह की पीठ पर बैठी उस शुभ्रू को
मैंने देखा जो शरद् के मेघ की गोद में चमकती चञ्चलका की तरह लग रही थी। विस्मय
उत्सुकता और भय से उसे देखते हुए मेरा हृदय जाने क्यों धड़कने लगा ॥१५-१८॥
वह कन्या वहाँ आकर, तालाब में स्नान कर पुष्प चयन करने लगी। और, तत्पश्चात् वह
उस तालाब के तीर पर स्थित शिवजी के मन्दिर में जाकर उनका पूजन करने लगी॥१९॥
पूजा समाप्त होने पर वह मेरा मित्र भील उसके समीप जाकर प्रणामपूर्वक अपना परिचय
देने के पश्चात् स्वागत करती हुई उस कन्या से बोला- ॥११॥
'हे देवि मैं तुम्हारे अनुरूप वर उस मित्र को लाया हूँ। यदि तुम चाहो तो उसे अभी
तुम्हें दिखा दूँ' ॥१११॥
यह सुनकर 'दिखाओ' - उसके ऐसा कहने पर वह भील मेरे पास आया और उसने
मुझे ले जाकर उसे दिखाया ॥११२॥
परिणामस्वरूप वह भी मुझे प्रेम बरसाती हुई तिरछी आँखों से देखकर काम के वशीभूत
होकर भीलराज से बोली - ॥११३॥
यह तुम्हारा मित्र मनुष्य नहीं कोई देवता है, जो मुझे ठगने के लिए आया है; क्योंकि
मनुष्य की ऐसी आकृति नहीं हो सकती है ॥११४॥
यह सुनकर उसे विश्वास दिलाने के लिए मैंने स्वयं ही कहा- 'हे सुन्दरि ! मैं सचमुच
मनुष्य हूँ। तुम्हारे समान सरल मनुष्य से ठगी करने से क्या लाभ है। मैं वलभी के रहनेवाले
महाधन नामक व्यापारी का पुत्र हूँ जो शिवजी की आराधना से उत्पन्न हुआ हूँ ॥११५-११६॥
मेरे पिता ने पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की थी और स्वप्न में शिवजी ने
प्रसन्न होकर आदेश दिया था कि 'तुम वलभी में उठो, तुम्हें एक महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा
यही मेरी उत्पत्ति का रहस्य है और अधिक कहना व्यर्थ है ॥११७-११८४॥

एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य कालेन चात्मजः।
अहमेव समुत्पन्नो वसुदत्त इति श्रुतः ॥११९॥
अयं च प्लवगाधीशः स्वयंवरसुहृन्मया।
देशान्तरगतैन प्राप्तप्राप्तः कृच्छ्रैकबान्धवः ॥१२०॥
एष मे तत्त्वसंक्षेप इत्युक्त्वा विरते मयि।
अभाषताथ कन्या सा लज्जयावनतानना ॥१२१॥
अस्येतेमां च जानेऽद्य स्वप्नेऽर्जितवती हरः।
प्रातः प्राप्स्यसि भर्तारमिति तुष्टः किलादिशत् ॥१२२॥
तस्मात्त्वमद्य मे भर्त्ता भ्रातायं च गवत्सखः।
इति वाक्सुधया सा मामानन्द्य विरताभवत् ॥१२३॥
सम्मन्त्र्याथ तया साकं विवाहाय यथाविधि।
अकार्यं निश्चय गन्तु समिन्धोऽहं निज गृहम् ॥१२४॥
[L13: तत सा सिंहमाहूय वाहनं तं स्वसज्ञया।
अत्रारोहायंपुत्रेति मामभाषत सुन्दरी ॥१२५॥
अथाहुं तेन सुहृदानुयात शबरण तम्।
सिंहमारुह्य दयितामुत्सङ्गे स्वां गृहीतवान् ॥१२६॥
तत प्रस्थितवानस्मि कृतकृत्यो निजं गृहम्।
कान्त्या सह सिंहस्थो मित्रे तस्मिन्पुरःसरे ॥१२७॥
तपीयस्तरनिमिशहरिणानिवृत्तय ।
क्रमेण ते वयं सर्वे सम्प्राप्ता वरुणी पुरीम् ॥१२८॥
तत्र मामागतं दृष्ट्वा सिंहारूढं सवल्लभम्।
साश्चर्यस्तद्द्रुतं गत्वा मम पित्रेऽब्रवीज्जनः ॥१२९॥
सोऽपि प्रत्युद्गतो हर्षादवतीर्णं मृगेन्द्रतः।
पादानतं दृष्ट्वा मामभ्यनन्दत् सविस्मयः ॥१३०॥
अनन्यसदृशीं तां च कृतपादामिवन्दनाम्।
पश्यन्ममोचितां भार्या न माति स्म मुदा क्वचित् ॥१३१॥
प्रवेश्य मन्दिर चास्मान् वृत्तान्त परिपृच्छ्य च।
प्रशंस शबराधीशसौहार्दं सोत्सव व्यधात् ॥१३२॥
ततो मौहूर्तिकापद्यावन्त्येधुर्वंरकन्यका।
सा मया परिणीताऽभून्मिस्तारिम्बन्युना ॥१३३॥