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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

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DevanagariHindipublished479 pages

About this granth

The Jatakas belong to the Khuddaka Nikaya of the Pali Sutta Pitaka and tell some five hundred and fifty stories of the Buddha's former lives. Each opens with a present-day incident that prompts the Teacher to speak, then gives the 'story of the past' about the Bodhisattva, and ends by identifying who in the story is who now. Together they are a great storehouse of Indian folk tale, art and moral teaching.

The complete Jataka was translated from Pali into Hindi by Bhadant Anand Kausalyayan and published in several volumes by the Hindi Sahitya Sammelan, Prayag. This is the second volume of that translation, beginning with Jataka no. 101, the Parosata Jataka, and arranged in vaggas.

The contents give a one-line summary of each story: a father testing his daughter's loyalty in the Pannika Jataka, an elephant frightened by brittle wood falling in the wind, a hunchback who cures a talkative priest by flicking goat droppings into his mouth, and a castor-tree spirit who accepts a devotee's humble cake of bran. The Kutavanija and Sunakha Jatakas are also here. The 479 pages suit readers of Buddhist literature and of India's story traditions.

२३१. उपाहन जातक

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दूसरा परिच्छेद
६. उपाहन वर्ग
२३१. उपाहन जातक
"यथापि फीता " यह शास्ता ने वेळुवन म रहने समय, देवदत्त के
बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—आयुष्मान् ! देवदत्त आचार्य्य
को छोड़, तथागत का विरोधी शत्रु बन विनाश को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' ।
शास्ता न, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त आचार्य्य को त्याग, मेरा विरोधी
बन महाविनाश को प्राप्त हुआ, वह पहले भी हुआ है' कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हथवानों के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर हस्ति शिल्प में पारङ्गत हो गए।
काशी के एक गामडे के माणवक ने आकर उनसे विद्या सीखी। बोधिसत्व
शिल्प सिखाते हुए आचार्य्य-मुट्ठी¹ नहीं रखते। जो जो जानते हैं, वह सब
सिखा देते हैं। उस माणवक ने बोधिसत्व की सारी विद्या सीख चुकने पर

¹विद्या को छिपा कर रखना।

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४०६ [ २.६.२३१
कहा- आचार्य ! अब में राजाओ की सेवा में रहूँगा। बोधिसत्व ने 'तात'
अच्छा' यह महाराजा से कहा-
"महाराज ! मेरा शिष्य आपकी सेवा में रहना चाहता है।"
'अच्छा ! रहे।'
'तो उसका वेतन कह दे।'
'आपका शिष्य आपके बराबर नहीं पा सकता। आपको सौ मिलने पर
उसे पचास मिलेंगे, दो (सौ) मिलने पर एक (सौ) ।"
उसने घर जाकर शिष्य से कहा। शिष्य बोला-
"आचार्य ! मैं आपके बराबर शिल्प जानता हूँ। यदि जितना आप पाते
हैं उतना ही वेतन मिलेगा तो राजा की सेवा में रहूँगा, नहीं तो नहीं रहूँगा।"
बोधिसत्त्व ने यह वृत्तान्त राजा से कहा। राजा बोला- यदि वह
तुम्हारे जितना शिल्प जानता है तो तुम्हारे बराबर शिल्प दिखा सकने पर
उसे तुम्हारे बराबर मिलेगा। बोधिसत्व ने अपने शिष्य से यह बात कही।
उसने कहा 'अच्छा, मैं दिखाऊँगा।' बोधिसत्त्व ने राजा से कहा। राजा
बोला, तो कल शिल्प दिखा। शिष्य ने कहा- दिखाऊँगा, नगर में मुनादी
करा दे। राजा ने मुनादी करा दी कि कल आचार्य और उनका शिष्य हस्ति-
शिल्प दिखाएँगे। जो देखना चाहे वे राजाङ्गण में इकट्ठे होकर देख।
आचार्य ने यह सोच कि मेरा शिष्य उपाय-कुशल नहीं है एक हाथी ले उसे
एक ही रात में 'उलटी बात' सिखाई- चल कहने पर पीछे हटना, पीछे हटो
कहने पर चलना, खड़ा हो कहने पर लेटना, लेट कहने पर खड़ा होना, पकड़
कहने पर रखना तथा रख कहने पर पकड़ना। इस प्रकार सिखा, अगले
दिन वह उस हाथी पर चढ राजदरबार मे पहुँचा। शिष्य भी एक सुन्दर
हाथी पर चढ़ा। जनता इकट्ठी हुई। दोनो ने बराबर शिल्प दिखाया।
बोधिसत्त्व ने अपने हाथी से (हाथी) बदल लिया। वह चल कहने पर पीछे हटा।
पीछे हट कहने पर आगे दौड़ा। खड़ा हो कहने पर लेट गया। लेट कहने
पर खड़ा हुआ। (उसने) पकड़ कहने पर रख दिया। रख कहने पर पकड़ा।
जनता बोली- अरे दुष्ट शिष्य ! तू आचार्य के साथ झगड़ा करता
है। अपनी सामर्थ्य नहीं जानता। समझता है कि मैं आचार्य के बराबर
जानता हूँ। फिर जनता ने उसे ढेले और डण्डो की मार से वहीं मार डाला।

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उपाहन ] ४०७
बोधिसत्त्व ने हाथी से उतर राजा के पास जाकर कहा—महाराज !
विद्या अपने को गुणी बनाने के लिए सीखी जाती है। लेकिन किसी किसी
के लिए शिल्प विनाश का कारण होता है जैसे ठीक से न बनाया हुआ जूता ।
इतना कह यह दो गाथाएँ कहीं—
यथापि कीता पुरिसस्सुपाहना
सुखस्स अत्थाय दुखं उदव्वहे;
घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता
तस्सेव पादे पुरिसस्स खादरे ॥
एवमेव यो दुक्कुलीनो अनरियो
तम्हारविज्जञ्च सुतञ्च मादिय;
तमेव सो तस्स सुतेन खादति
अनरियो वुच्चति पानदूपमो ॥
[ जिस प्रकार सुख के लिए खरीदे गए जूते गर्मी से तप्त होकर तथा पाद-
तल से पीडित होकर उसी आदमी के पैर को काट खाते हैं, उसी प्रकार जो
नीचकुल या अनार्य्य होता है वह जिस (आचार्य्य) से विद्या तथा श्रुत ग्रहण
करता है उसी को वह अपने ज्ञान (श्रुत) से खाता है। अनार्य्य आदमी खराब
जूते के समान समझा जाता है।]
उदव्वहे, कष्ट दे। घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता घाम से अभितप्त
और पैर के तलुवे से पीडित । तस्सेव जिसने वह खराब जूते सुख की आशा
से खरीद कर पाँव में डाले उसीके । खादरे जखम करते हैं या पाँव
खाते हैं।
दुक्कुलीनो खराब जाति का, कुलहीन पुत्र । अनरियो लज्जा-भय रहित
असत्पुरुष। तम्हाफविज्जञ्च सुतञ्च मादिय उस उसको सिखाता है इसलिए
तमावो की जगह तम्हावो। मतलब है उस उसको हुनर का अभ्यास कराता
है, उसमें लगाता है । आचार्य्य ही इसका अर्थ है, इसलिए तम्हारा।
गाथा-बन्धन को सरल करने के लिए ह्रस्व किया गया है। विज्जं, अठारह
विद्याओ म से कोई । सुतं जो कुछ श्रुतशास्त्र । आदिय, लेकर। तमेव सो

अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ

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४०८ [ २.६-२३२
तस्स सुतेन खादति अपने ही आपको वह अर्थात् जो दुष्टकुल का अनार्य्य
आचार्य्य से विद्या और ज्ञान ग्रहण करता है वह वहाँ ज्ञान से खाता है अर्थात्
उसके पास से श्रुतज्ञान से वह अपने को ही नष्ट करता है।
अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ
ज्ञान से अपने को खाता है' ही अर्थ है। अनरियो वुच्चति पानदूपमो अनार्य्य
(आदमी) खराब जूते जैसा कहा जाता है। जिस प्रकार खराब जूते आदमी
को खाते है, उसी प्रकार यह ज्ञान से खाता है तो अपने आप अपने को ही
खाता है। अथवा जूते से जख्मी पानदू । जूते से पीड़ित, जूते से खाए
गए पैर से मतलब है। इसलिए अपने आपको जो ज्ञान से हानि पहुँचाता है,
वह उस ज्ञान से खाया जाने के कारण अनार्य्य कहलाता है। पानदूपमो का
यही अर्थ है कि जूते से पीड़ित पाँव की तरह।
राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को महान् सम्पत्ति दी।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिष्य
देवदत्त था। आचार्य्य तो मै ही था।
२३२. वीणथूण जातक
एकचिन्तितोय अयमत्यो . .यह शास्ता ने जेतवन में विचरते समय
एक कुमारी के बारे में कही।
¹ पुरानी सिंहल अट्ठकथा।

क. वर्तमान कथा

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थीणपूण ] ४०६
क. वर्तमान कथा
वह श्रावस्ती के एक सेठ की लड़की थी। उसने अपने घर में वृषभराज
का सत्कार होते देख दाई से पूछा- माँ, यह कौन है जिसका इस प्रकार सत्कार
होता है ?
"बेटी, यह वृषभराज है।"
एक दिन उस लड़की ने प्रासाद पर खड़े होकर गली में एक कुबड़े को
देखा। उसने सोचा-बैलों में जो ज्येष्ठ होता है उसकी पीठ पर एक ककुध
होता है, मनुष्यों में जो बड़ा हो उसकी पीठ पर भी होना चाहिए। यह मनुष्यों
में वृषभ-राज होगा। मुझे इसकी चरणसेविका बनना चाहिए। उसने दासी
को भेजकर उसे कहलवाया कि सेठ की लड़की तेरे साथ जाना चाहती है।
तू अमुक स्थान पर जाकर ठहर। वह कीमती चीजें ले, भेष बदल, महल से
उतर उसके साथ भाग गई। आगे चलकर यह बात नगर में और भिक्षुसङ्घ
में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बात चलाई-आयुष्मानो ! अमुक
सेठ-लड़की कुबड़े के साथ भाग गई।
शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, न केवल अभी
यह कुबड़े को चाहती है, इसने पहले भी कुबड़े की ही इच्छा की है। इतना कह
पूर्व जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व
ने एक निगम-ग्राम में सेठ के कुल में पैदा हो, गृहस्थी बसाते हुए, पुत्र-पुत्री के
साथ बढ़ते हुए अपने पुत्र के लिए वाराणसी-सेठ की लड़की पक्की कर दिन का
निश्चय किया। सेठ की लड़की ने अपने घर पर वृषभ का सत्कार-सम्मान
होते देख दाई से पूछा- यह कौन है ? उसने कहा- यह वृषभ है। तब
सेठ की लड़की ने गली में जाते हुए एक कुबड़े को देखकर समझा कि यह पुरुषों
में वृषभ होगा। उसने कीमती सामान लिया और उसके साथ भाग गई।

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४१० [ २६.२३२

बोधिसत्त्व भी सेठ की लडकी को घर लाने की इच्छा से बडी बारात
के साथ बाराणसी जाते हुए उसी रास्ते पर हो लिए। वे दोनो सारी रात
रास्ता चलते रहे। रात भर सर्दी खाने के कारण अरुणोदय होने पर कुबडे के
शरीर का वायु कुपित हो गया। बडी पीडा होने लगी। वह रास्ते से हट,
पीडा से बेहोश होने के कारण वीणा के दण्डे की तरह मुडकर पड रहा। सेठ
की लडकी भी उसके चरणो म बैठ रही। बोधिसत्त्व ने सेठ की लडकी को
कुबडे के चरणो में बैठे देख, पहचान कर, पास आ, सेठ की लडकी से वार्तालाप
करते हुए पहली गाथा कही—

एकचिन्तितोय अयमत्थो बालो अपरिनायको,
नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि ॥

[ यह (कुबडे के साथ भागने की बात) एक देशी चिन्ता है। (कुबडा)
मूर्ख है, जाने में असमर्थ है। कुबडे बौने के साथ आपका जाना उचित नही।]

एकचिन्तितोव अयमत्थो, अम्म ! यह जो तू सोचकर इस कुबडे के साथ
निकल भागी यह बात तेरी अकेली को ही सोची होगी। बालो अपरिनायको
यह कुबडा मूर्ख है, दुर्बुद्धि होने से बढा होने पर भी बाल ही है। दूसरा पकड
कर ले जाने वाला न होने पर जाने मे असमर्थ होने से अपरिनायक। नहि
खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि, इस कुबडे के साथ, वामनरूप होने से
बौने के साथ, तुम्हें जो महान् कुल मे उत्पन्न हुई हो, सुन्दर हो, दर्शनीय हो जाना
योग्य नहीं।

उसकी इस बात को सुनकर सेठ की लडकी ने दूसरी गाथा कही—

पुरिसूत्तम मञ्ञमाना अह खुज्जमकामयि,
सोय सकुदितो सेति छिन्नतन्ति यथा घुणा ॥

[ मैने कुबडे को पुरुषो म वृषभ समझ कर उसकी इच्छा की। यह तार
टूटी वीणा की तरह सुकदा हुआ पडा है।]

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[विकण्णक ] ४११
आर्ये ! मैने एक साड को देखकर सोचा कि बैलों म जो ज्येष्ठ होता
हैं उसकी पीठ पर एक ककुध होता है। इसकी पीठ पर भी यह है। इसलिए
यह पुरुष म वृषभ होगा। इस प्रकार मैने इस कुबडे को पुरुष-वृषभ मान
कर इसकी इच्छा की। यह तो जैसे, तार टूटा तूमडी सहित वीणा-दण्ड हो
वैसे मुडा हुआ पडा है।
बोधिसत्त्व यह जान कि यह अज्ञान के ही कारण घर से निकल पडी,
उसे नहला, अलङ्कृत कर, रथ पर चढ़ा कर ल गय।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय यही
सेठ की लडकी थी। बाराणसी-सेठ तो मैं ही था।
२३३. विकण्णक जातक
"कामं मंहि इच्छसि तेन गच्छ " यह शास्ता ने जेतवन म विहार
करते समय एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
वह धर्मसभा म लाया गया। शास्ता ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच
उत्कण्ठित है ? 'सचमुच' कहने पर पूछा—किस कारण से उत्कण्ठित है ?
बोला—कामुकता के कारण। शास्ता ने उसे कहा—भिक्षु, कामुकता तीखे
शल्य की तरह है। एक बार हृदय में प्रविष्ट होने पर तीर लगे मगरमच्छ
की तरह मार ही डालती है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

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विक्कण्णक ] ४१३
भोजन के कारण मच्छो का पीछा करता हुआ लोभवश मारा गया है।]
काम निश्चय से। यहि इच्छसि तेन गच्छ जहां चाहे वहाँ जा। मम्मम्हि
मर्म स्थान मे। विक्कण्णकेन उल्टी नोक वाले शल्य से। हतोसि भत्तेन
स्वादसितेन लोलो च मच्छे अनुबन्धमानो तू नगाडा बजाकर भात दिए जाते
समय लोभी बन खाने के लिए मच्छो का पीछा करता हुआ उस स्वादिष्ट
भोजन द्वारा मारा गया। जाने की जगह भी तू जीवित नही रहेगा।
यह अपने वासस्थान पर पहुँच कर मर गया। शास्ता ने यह बात कह,
अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही—
एवम्पि लोकाभिस ओपतन्तो
विहञ्ञती चित्तवसानुवत्ती;
सो हञ्जति ञातिसखानमज्झे
मच्छानुगो सोरिव सुसुमारो ॥
[इस प्रकार लौकिक लाभ के पीछे भागता हुआ, अपने चित्त के वशीभूत
आदमी मारा जाता है। वह रिश्तेदारो और दोस्तो के बीच वैसे ही मारा जाता
है जैसे मच्छो का पीछा करने वाला मगरमच्छ।]
लोकाभिस पांच विषय। उन्हें ससार इष्ट, कान्त तथा सुन्दर समझ
ग्रहण करता है, इसलिए लोकाभिस कहलाते है। ओपतन्तो उन लौकिक
चीजो के पीछे भागता हुआ राग के वशीभूत आदमी विहञ्जति कष्ट पाता
है। सो हञ्जति इस प्रकार का वह आदमी रिश्तेदारो तथा मित्रो के बीच
म भी सो तीर से बिंधे मच्छानुगो सुसुमारो विय पाँच विषयो को सुन्दर मानकर
हञ्जति कष्ट पाता है, महाविनाश को प्राप्त होता है।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित
कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो के प्रकाशन के अन्त म उत्कण्ठित भिक्षु
स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय वाराणसी राजा मै ही था।

२३४. असिताभू जातक

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४१४ [ २.६.२३४
२३४. असिताभू जातक
“त्वमेवदानिमकर ” यह शास्ता ने जेतवन मे बिहार करते समय एक
कुमारी के बारे म कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में दोनों प्रधान शिष्यो की सेवा करने वाले एक कुल मे एक
कुमारी थी—सुन्दर, सौभाग्यशाली। वह बडी होने पर अपनी बराबर की
जाति के कुल में गई। उसका स्वामी उसे कुछ न समझ किसी दूसरी जगह
ही आसक्त रहता। वह उसके अनादर का कुछ ख्याल न कर, दोनो श्रावको
को निमन्त्रित कर, महादान दे धर्मोपदेश सुनती हुई स्रोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित
हुई। उसके बाद से वह मार्ग-सुख तथा फल-सुख का आनन्द लेती हुई सोचने
लगी कि स्वामी भी मुझे नही चाहता और गृहस्थी से भी मुझे प्रयोजन नही।
में प्रव्रजित होऊँगी। वह मातापिता को कह, प्रव्रजित हो अर्हत्त्व को प्राप्त
हुई। उसकी यह करनी भिक्षुओ को ज्ञात हो गई।
एक दिनं भिक्षुओं ने धर्मसभा म बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक
कुल की लड़की सद्धर्म की खोज करने वाली है। उसने यह जान कि स्वामी
उसे नही चहता है, प्रधान शिष्यो का धर्मोपदेश सुन, स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हो, फिर मातापिता की आज्ञा ले, प्रव्रजित हो अर्हत्व प्राप्त किया। ऐसी
है वह सद्धर्म की खोज करने वाली लडकी। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ,
बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—
.भिक्षुओ, यह कुलकुमारी केवल अभी सद्धर्म की खोज करने वाली रही है.
यह पहले भी सद्धर्म की खोज करने वाली ही रही है। इतना कह पूर्व-जन्म
की कथा कही—

ख. अतीत कथा

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असिताभू ] ४१५
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ऋषियो के क्रम से प्रव्रजित हो अभिञ्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय
प्रदेश मे रहने लगे। उस समय वाराणसी नरेश ने यह देख कि उसके पुत्र
ब्रह्मदत्त कुमार के साथ बहुत लोग है उससे आशङ्का होने के कारण उसे राष्ट्र
से बाहर करवा दिया। वह असिताभू नामक अपनी देवी को साथ ले, हिमालय
म प्रविष्ट हो मछली, मास, फलमूल खाता हुआ पर्णशाला मे रहने लगा।
एक किन्नरी को देख, उसके प्रति आसक्त हो उसने सोचा कि इसे अपनी भार्या
बनाऊँगा और असिताभू का ख्याल न कर उसके पीछे पीछे गया। उसने
उसे किन्नरी के पीछे जाता देख सोचा यह मुझे छोड किन्नरी के पीछे जाता
है, मुझे इससे क्या ? उसने उसके प्रति विरक्त हो बोधिसत्त्व के पास जा,
प्रणाम कर, अपने योग्य कसिम पूछ, कसिम की भावना कर अभिञ्ञा और
समापत्तियाँ प्राप्त कीं। फिर बोधिसत्त्व को प्रणाम कर आकर स्वयं पर्ण-
शाला-द्वार पर खडी हुई। ब्रह्मदत्त भी किन्नरी का पीछा करता हुआ घूमता
रहा। उसे उसके जाने का मार्ग तक न दिखाई दिया। यह निराश होकर
पर्णशाला के सामने आया। असिताभू ने उसे आते देख आकाश मे उठ, मणि
वर्ण के गगनतल मे खडी हो 'आर्यपुत्र ! तेरे कारण मुझे यह ध्यान सुख प्राप्त
हुआ' कह पहली गाथा कही—
त्वमेवदानिमकर य कामो व्यगमा तथि,
सो य अप्पटिसन्धिको खरा छिन्नव रेचक ॥
[ यह जो तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, यह अब तून ही किया है। आरी
से कटे हाथीदाँत की तरह यह अब जुड नही सकती । ]
त्वमेवदानिमकर आर्यपुत्र ! मुझे छोड किन्नरी का पीछा करते हुए
तूने ही यह किया है। य कामो व्यगमा तपि जो मेरी तेरे प्रति आसक्ति जाती
रही, विष्कम्भन-प्रहाण द्वारा प्रहीण हो गई, जिसके प्रहीण होने से मुझ यह
विशेष अवस्था प्राप्त हुई। सोय अप्पटिसन्धिको_वह आसक्ति अब बिना
जुड सकने वाली हो गई, फिर जोडी नही जा सकती। खरा छिन्नव रेचक

Page 432Permalink

४१६ [ २.६२३४
रार कहते हैं आरी को और रेरुव कहते हैं हाथीदांत को। जैसे आरी से कटा
हुआ हाथीदांत फिर जुड़ नहीं सकता, फिर पहले की तरह से नहीं मिलता।
इसी प्रकार मेरा तेरे साथ फिर चित्त का संयोग नहीं हो सकता।
———
यह कह उसने देखते हुए ही ऊपर उठकर दूसरी जगह चली गई। उसने
उसके जाने पर रोते हुए दूसरी गाथा कही—
अतिच्छदा अतिलोभेन अतिलोभमदेन च,
एव हायति अत्थम्हा अहंव असिताभुया ॥
[ जहाँ तहाँ इच्छा करने से, अति लोभ से तथा अति लोभमद से आदमी
उसी प्रकार अपने लाभ को गँवा देता है जैसे मैंने असिताभू को।]
———
अतिच्छदा अतिलोभेन अतिच्छा कहते हैं जहाँ तहाँ पैदा होने वाली असीम
तृष्णा को। अतिलोभ कहते हैं सीमा लाँघने वाले लोभ को। अतिलोभमदेन
च पुनः मद पैदा होने से अतिलोभ मद हो गया। भावार्थ यह है कि जहाँ तहाँ
इच्छा करने वाला आदमी अतिलोभ से तथा अतिलोभमद से अहं व असिताभुया
जैसे मैं असिताभू राजकन्या से जुदा हो गया वैसे वह अपने लाभ को गँवा
देता है।

२३५. वच्छनख जातक

Page 433Permalink

वच्छनख ] ४१७
२३५. वच्छनख जातक
“सुखा घरा वच्छनख .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
रोजमल्ल के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
यह आयुष्मन् आनन्द का गृहस्थी-काल का मित्र था। उसने एक दिन
स्थविर के पास आने के लिए सन्देश भेजा। स्थविर शास्ता से आज्ञा लेकर
गए। उसने स्थविर को नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खिला, एक ओर बैठ,
स्थविर के साथ कुशल क्षेम बतियाते हुए स्थविर को गृहस्थ-भोगो तथा पाँच
विषयो का निमन्त्रण दिया। वह बोला—भन्ते आनन्द ! मेरे घर मे बहुत सी
जडचेतन सम्पत्ति है। इसे बीच मे से आधी बाँटकर तुम्हे देता हूँ। आएँ दोनो
घर में रहें।
स्थविर ने उसे कामभोगो के दुष्परिणाम कहे और आसन से उठकर विहार
चले गए। शास्ता ने पूछा—आनन्द ! तूने रोज को देखा ?
“हाँ, भन्ते ।”
“उसे क्या कहा ?”
“भन्ते ! मुझे रोज गृहस्थ होने का निमन्त्रण देता था।
मैने उसे गृहस्थ जीवन के तथा विषयो के दोष बताए।”
शास्ता ने कहा—आनन्द ! रोजमल्ल केवल अभी प्रव्रजितो को गृहस्थ
होने का निमन्त्रण नही देता। इसने पहले भी निमन्त्रण दिया है। उसके
प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
२७

ख. अतीत कथा

Page 434Permalink

४१८ [ २.६.२३५
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक निगम-ग्राम में किसी ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो
के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो हिमालय में रहने लगे। वहाँ चिरकाल तक
रहकर नमक-खटाई खाने के लिए वाराणसी पहुँच, राजा के बाग में रह,
अगले दिन वाराणसी मे प्रवेश किया। वाराणसी का सेठ उनकी चालढाल
से प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें घर ले जाकर भोजन खिलाया। फिर उद्यान में
रहने का वचन ले सेवा करते हुए उद्यान में बसाया। उनमें परस्पर स्नेह पैदा
हो गया ।
बोधिसत्त्व के प्रति प्रेम और विश्वास होने के कारण वाराणसी-सेठ एक
दिन इस प्रकार सोचने लगा—प्रव्रजित रहना दुष्कर है। मैं अपने मित्र
वच्छनख परिव्राजक को गृहस्थ बना सारा धन बीच में से आधा आधा बाँट
कर उसे दे दूँ। दोनो मिलकर रहें। उसने एक दिन भोजन के अनन्तर उसके
साथ मधुर बातचीत करते हुए कहा—'भन्ते वच्छनख ! प्रव्रजित रहना दु ख
है। गृहस्थ रहने में सुख है। आएं दोनो मिलकर विषयो का भोग करते हुए
रहें।' यह कह पहली गाथा कही—
सुखा घरा वच्छनख सहिरञ्जा सभोजना,
यत्थ भुत्वा च पीत्वा च सयेय्याय अनुस्सुको ॥
[ वच्छनख ! सोने और खाद्य पदार्थों से भरपूर घर सुख-कर हैं, जहाँ
खा पीकर आदमी निश्चिन्त सोता है।]
सहिरञ्जा सात रत्नो से युक्त। सभोजना बहुत खाद्य भोज्य पदार्थों
से युक्त। यत्थ भुत्वा च पीत्वा च जिन सोने और भोजनो से युक्त घरो में
नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खाकर और नाना प्रकार के पान पीकर ।
सयेय्याय अनुस्सुको जिन (घरो) में अलंकृत शयनासनो पर निश्चित होकर
सोएगा, उससे घर बहुत ही सुखकर हैं।

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वच्छनख ] ४१६
उसकी बात सुन बोधिसत्त्व ने कहा—सेठ ! तू अज्ञान के कारण काम-
भोगों में आसक्त होकर गृहस्थी का गुण और प्रव्रज्या का अवगुण कह रहा
है। अब तू सुन, मैं गृहस्थी के दोष बताता हूँ। यह कह दूसरी गाथा कही—
घरा नानीहमानस्स घरा नाभणतो मुसा,
घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो;
एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति ॥
[ (नित्य) मेहनत न करने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। झूठ न बोलने
वाले की गृहस्थी नहीं चलती। दूसरा को न ठगते हुए की गृहस्थी नहीं
चलती। दण्डत्यागी की गृहस्थी नहीं चलती। इस प्रकार की छिद्रों से पूर्ण,
मुश्किल से चलने वाली गृहस्थी को कौन करता है।]
घरा नानीहमानस्स नित्य कृषि गोरक्षा आदि करने में परिश्रम न करने
वाले की गृहस्थी नहीं (चलती)। गृहस्थी स्थिर नहीं होती। घरा नाभणतो
मुसा खेत, वस्तु, हिरण्य, स्वर्ण आदि के लिए झूठ न बोलने वाले की भी गृहस्थी
नहीं। घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो जिसने दण्ड नहीं लिया, जिसने
दण्ड ग्रहण नहीं किया, जिसने दण्ड रख दिया वैसे दूसरा को न ठगने वाले
की भी गृहस्थी नहीं। जो दण्डधारी होकर दूसरों के दासों तथा नौकर चाकर
आदि को उस उस अपराध के लिए अपराध के अनुसार वध करना, बाँधना,
(अङ्ग-) छेद करना, ताडना आदि करता है उसीकी गृहस्थी ठहरती है।
एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति सो अब इस प्रकार डाग आदि के न
करने पर अनेक हानियां होने के कारण छिद्रपूर्ण, करने पर नित्य ही करना
पड़ने के कारण कठिन, मुश्किल से निभने वाली, नित्य करने पर भी दुरभि-
सम्भव तथा मुश्किल से पूरा पडने वाले घर को मैं चिन्ता-रहित होकर
करूँगा ? (ऐसा बोलकर) गृहस्थी को कौन करे ?
इस प्रकार बोधिसत्त्व गृहस्थी के दोष कह उद्यान ही चले गए। शास्ता
ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय बाराणसी-सेठ रोजमल्ल था। वच्छनख परिव्राजक तो मैं
ही था।

२३६. बक जातक

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४२० [ २६.२३६
२३६. बक जातक
“भद्दको वतयं पक्खी..” ” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते हुए एक
ढोगी के बारे मे कही।
उसे लाए जाने पर शास्ता ने देखकर कहा-भिक्षुओ, यह न केवल
अभी ढोगी है, यह पहले भी ढोगी रहा है। और पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
हिमालय प्रदेश के एक तालाब मे बडे परिवार सहित मच्छ होकर रहते थे।
मच्छो को खाने की इच्छा से एक बगुला तालाब के पास सिर गिरा कर तथा
पंखो को पसार कर मछलियो की प्रमादावस्था को धीरे धीरे देखता हुआ
खडा था। उसी समय मच्छो के समूह से घिरे हुए बोधिसत्त्व शिकार पकडते
पकडते वहाँ पहुँचे। मच्छो के गण ने उस बगुले को देख पहली गाया कही-
भद्दको वतय पक्खी द्विजो कुमुदसन्निभो,
वूपसन्तेहि पक्खेहि मन्द ऽमन्दोव झायति ॥
[ कुमुद सदृश यह पक्षी बहुत अच्छा है। शान्त परो से यह शनै. शनै
ध्यान करता है।]
मन्दमन्दोव झायति असक्त की तरह से, कुछ न जानता हुआ सा अकेला
ही ध्यान करता है।
उसे देख बोधिसत्त्व ने दूसरी गाया कही-

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साकेत ] ४२१
नास्स सीलं विजानाय अनञ्ञाय पसंसय,
अम्हे द्विजो न पालेति तेन पक्खी न फन्दति ॥
[इसके स्वभाव को नहीं जानते। बिना जाने प्रशंसा करते हो। यह
पक्षी हमारी रक्षा नहीं करता। इसीलिए पर नहीं फड़फड़ाता।]
अनञ्ञाय—न जानकर। अम्हे द्विजो न पालेति यह पक्षी हमारी
रक्षा नहीं करता, हमें नहीं सँभालता। यह सोचता है कि मैं इनमें से किसे
खाऊँगा। तेन पक्खी न फन्दति इसीसे पक्षी न फड़फड़ाता है, न चलता है।
ऐसा कहने पर मच्छों के समूह ने पानी में क्षोभ पैदा करके बगुले को
भगा दिया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बगुला
(यह) ढोंगी था। मच्छराज तो मैं ही था।
२३७. साकेत जातक
"को नु खो भगवा हेतु . '" यह शास्ता ने साकेत के समीप विहार
करते समय साकेत ब्राह्मण के बारे म कही।
अतीत कथा और वर्तमान कथा भी एकक निपात (पहले परिच्छेद)
की पूर्वोक्त साकेत जातक¹ में आ ही चुकी है। हाँ, तथागत के विहार जाने पर
भिक्षुओं ने पूछा—भन्ते ! यह स्नेह कैसे स्थापित हो जाता है ? यह पूछते
हुए उन्होंने पहली गाथा कही—
¹साकेत जातक (१.७ ६८)

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४२२ [ २.६.२३७
को नु खो भगवा हेतु एकच्चं इध पुग्गले,
अतीव हृदयं निब्बाति चित्तञ्चापि पसीदति ॥
[ भगवान् ! इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी के प्रति हृदय
अति ठण्डा हो जाता है और चित्त प्रसन्न हो जाता है । ]
अर्थ—इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी को देखते ही हृदय
अति ठण्डा हो जाता है, सुगन्धित शीतल जल के हजारो घड़ो से सींचे हुए
की तरह शीतल हो जाता है; किसी के प्रति नही होता ? किसी को देखते ही
चित्त प्रसन्न हो जाता है, कोमल पड जाता है, प्रेम से जुड जाता है, किसीसे
नही जुडता ?
शास्ता ने उन्हें प्रेम का कारण बताते हुए दूसरी गाथा कही—
पुब्बेव सन्निवासेन पच्चुप्पन्नहितेन वा,
एव तं जायते पेमं उप्पलंव यथोदके ॥
[ पूर्व जन्म के सम्बन्ध से वा इस जन्म के उपकार से प्रेम पैदा होता है
जैसे जल में कमल । ]
भिक्षुओ, प्रेम इन दो कारणो से ही पैदा होता है। पूर्व जन्म में चाहे
माता, चाहे पिता, चाहे पुत्री, चाहे पुत्र, चाहे भाई, चाहे बहिन, चाहे पति, चाहे
भार्या, चाहे सहायक, चाहे मित्र होकर जो कोई जिस किसी के साथ एक
स्थान मे रहता है उससे इस पुब्बेव सन्निवासेन वा दूसरे जन्म में भी वह स्नेह
नही छूटता । इस जन्म मे किए गए पच्चुप्पन्नहितेन वा एवं तं जायते पेमं ।
इन दो कारणो से प्रेम पैदा होता है। जैसे क्या ? उप्पलंव यथोदके 'व' का
ह्रस्व कर दिया। समुच्चय अर्थ मे ही इस का प्रयोग है। इसलिए उत्पल
तथा जल मे पैदा होने वाले शेष जितने भी पुष्प है ये दो ही कारणो से पैदा
होते हैं—जल से और गारे से। उसी प्रकार इन दो ही कारणो से प्रेम पैदा
होता है।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के

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। एकपद ] ४२३
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के
ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जन थे। पुत्र तो मैं ही था।
२३८. एकपद जातक
"इङ्ग एकपदं तात . " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक कौटुम्बिक के बारे में कही।
क. वर्तमान-कथा
यह कौटुम्बिक श्रावस्ती निवासी था। एक दिन गोद में बैठे हुए पुत्र
ने अर्थ का द्वार नामक प्रश्न पूछा। उसने सोचा यह प्रश्न बुद्ध का ही विषय
है। इसका उत्तर अन्य कोई नहीं दे सकेगा। वह पुत्र को लेकर जेतवन गया
और शास्ता को प्रणाम करके कहा—भन्ते ! इस बालक ने गोद में बैठे बैठे
अर्थ का द्वार प्रश्न पूछा है। मैं उसको नहीं जानता था। इसलिए यहाँ आया हूँ।
भन्ते ! इस प्रश्न को कहें।
शास्ता ने कहा—"उपासक ! यह बालक केवल अभी अर्थ की खोज
करने वाला नहीं है। इसने पहले भी अर्थ-खोजी होकर पण्डितों से यह प्रश्न
पूछा है। पुराने पण्डितों ने इसे यह कहा भी है। किन्तु जन्मान्तर की बात
होने से अब इसे उसका ध्यान नहीं।" इतना कह उसके प्रार्थना करने पर
पूर्व जन्म की बात कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने सेठ के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का स्थान

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४२४ [ २.६ २३८
ग्रहण किया। उसके पुत्र ने जब वह बच्चा ही था गोदी में बैठे बैठे पूछा—
तात ! मुझे अनेक़ार्थ वाला एक कारण, एक बात कहें। यह पूछते हुए उसने
यह गाथा कही—
इङ्घ एकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं,
किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि येनत्थे साधयामसे ॥
[तात ! अनेक अर्थपदो से युक्त कोई एक सङ्ग्राहक पद कहें, जिससे
अर्थ की प्राप्ति हो।]
इङ्घ याचना के या प्रेरणा के अर्थ में निपात है। एकपदं एक पद वा
एक बात से युक्त पद। अनेकत्थपदनिस्सितं अनेक अर्थों वा बातो से युक्त।
किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि कोई एक बहुत से पदो का सङ्ग्राहक पद कहें। अथवा
यही पाठ है। येनत्थे साधयामसे जिस अनेक़ार्थ युक्त एक पद से ही हम अपनी
वृद्धि सिद्ध करे, वह हमे कहें—यही पूछता है।
उसके पिता ने कहते हुए दूसरी गाथा कही—
दक्खेय्येकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं,
तञ्च सीलेन संयुत्तं खन्तिया उपपादितं;
अलं मित्ते सुखापेतुं अमितानं दुखाय च ॥
[तात ! दक्षता अनेक अर्थपदो से युक्त एक पद है। वह शील और
क्षमा के सहित हो तो मित्रो को सुख तथा शत्रुओं को दुख देने के लिए पर्याप्त
है।]
दक्खेय्येकपदं दक्षता एक पद है। दक्षता कहते हैं लाभ उत्पन्न करने
वाले, हुशियार कुशल आदमी का ज्ञानपूर्ण प्रयत्न (=वीर्य्य)। अनेकत्थपद
निस्सितं इस प्रकार कहा गया वीर्य्य अनेक अर्थ पदो से युक्त। किससे ?
शीलादि से। इसलिए तञ्च सीलेन संयुत्तं आदि कहा। उसका अर्थ है कि
वह वीर्य्य आचारशील तथा सहनशक्ति से युक्त। मित्ते सुखापेतुं अमितानञ्च
दुखाय अलं, समर्थ है। कौन है जो लाभ उत्पन्न करने वाले, ज्ञानपूर्ण कुशल

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक

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हरितमात ] ४२५
वीर्य से युक्त हो, आचार-शील तथा क्षमा से युक्त हो और मित्रो को सुख
देने तथा शत्रुओं को दुख देने में समर्थ न हो ?
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पुत्र के प्रश्न का उत्तर दिया। वह भी पिता के
कथनानुसार अपनी उन्नति कर यथाकर्म परलोक गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त मे पिता पुत्र सोतापत्ति फल मे
प्रतिष्ठित हुए। उस समय पुत्र यही था। बाराणसी सेठ तो मैं ही था।
२३६. हरितमात जातक
“आसिविस मम सन्त ” यह शास्ता ने वेळुवन म रहते समय
अजातशत्रु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
कोशलराज के पिता महाकोशल ने राजा बिम्बिसार को अपनी लडकी देने
के समय लडकी का स्नान-मूल्य काशीगांव दिया। अजातशत्रु द्वारा पिता मार
दिए जाने से वह राजा के प्रति स्नेह होने के कारण शीघ्र ही मर गई। माता
के मर जाने पर भी अजातशत्रु उस गांव का उपभोग करता ही था। कोशलराज
उससे लडता था कि मैं पिता की हत्या करने वाले चोर को अपने कुल का गांव
न दूंगा। कभी मामा विजयी होता, कभी भानजा। जब अजातशत्रु जीतता
तब रथ पर ध्वजा बँधवा बडी शान के साथ नगर मे प्रवेश करता। जब
पराजित होता तब दुखी मन से चुपचाप बिना किसी को खबर किए प्रवेश
करता।