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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक निगम-ग्राम में किसी ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो
के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो हिमालय में रहने लगे। वहाँ चिरकाल तक
रहकर नमक-खटाई खाने के लिए वाराणसी पहुँच, राजा के बाग में रह,
अगले दिन वाराणसी मे प्रवेश किया। वाराणसी का सेठ उनकी चालढाल
से प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें घर ले जाकर भोजन खिलाया। फिर उद्यान में
रहने का वचन ले सेवा करते हुए उद्यान में बसाया। उनमें परस्पर स्नेह पैदा
हो गया ।
बोधिसत्त्व के प्रति प्रेम और विश्वास होने के कारण वाराणसी-सेठ एक
दिन इस प्रकार सोचने लगा—प्रव्रजित रहना दुष्कर है। मैं अपने मित्र
वच्छनख परिव्राजक को गृहस्थ बना सारा धन बीच में से आधा आधा बाँट
कर उसे दे दूँ। दोनो मिलकर रहें। उसने एक दिन भोजन के अनन्तर उसके
साथ मधुर बातचीत करते हुए कहा—'भन्ते वच्छनख ! प्रव्रजित रहना दु ख
है। गृहस्थ रहने में सुख है। आएं दोनो मिलकर विषयो का भोग करते हुए
रहें।' यह कह पहली गाथा कही—
सुखा घरा वच्छनख सहिरञ्जा सभोजना,
यत्थ भुत्वा च पीत्वा च सयेय्याय अनुस्सुको ॥
[ वच्छनख ! सोने और खाद्य पदार्थों से भरपूर घर सुख-कर हैं, जहाँ
खा पीकर आदमी निश्चिन्त सोता है।]
सहिरञ्जा सात रत्नो से युक्त। सभोजना बहुत खाद्य भोज्य पदार्थों
से युक्त। यत्थ भुत्वा च पीत्वा च जिन सोने और भोजनो से युक्त घरो में
नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खाकर और नाना प्रकार के पान पीकर ।
सयेय्याय अनुस्सुको जिन (घरो) में अलंकृत शयनासनो पर निश्चित होकर
सोएगा, उससे घर बहुत ही सुखकर हैं।