जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 427 of 479
Read in context४१० [ २६.२३२
बोधिसत्त्व भी सेठ की लडकी को घर लाने की इच्छा से बडी बारात
के साथ बाराणसी जाते हुए उसी रास्ते पर हो लिए। वे दोनो सारी रात
रास्ता चलते रहे। रात भर सर्दी खाने के कारण अरुणोदय होने पर कुबडे के
शरीर का वायु कुपित हो गया। बडी पीडा होने लगी। वह रास्ते से हट,
पीडा से बेहोश होने के कारण वीणा के दण्डे की तरह मुडकर पड रहा। सेठ
की लडकी भी उसके चरणो म बैठ रही। बोधिसत्त्व ने सेठ की लडकी को
कुबडे के चरणो में बैठे देख, पहचान कर, पास आ, सेठ की लडकी से वार्तालाप
करते हुए पहली गाथा कही—
एकचिन्तितोय अयमत्थो बालो अपरिनायको,
नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि ॥
[ यह (कुबडे के साथ भागने की बात) एक देशी चिन्ता है। (कुबडा)
मूर्ख है, जाने में असमर्थ है। कुबडे बौने के साथ आपका जाना उचित नही।]
एकचिन्तितोव अयमत्थो, अम्म ! यह जो तू सोचकर इस कुबडे के साथ
निकल भागी यह बात तेरी अकेली को ही सोची होगी। बालो अपरिनायको
यह कुबडा मूर्ख है, दुर्बुद्धि होने से बढा होने पर भी बाल ही है। दूसरा पकड
कर ले जाने वाला न होने पर जाने मे असमर्थ होने से अपरिनायक। नहि
खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि, इस कुबडे के साथ, वामनरूप होने से
बौने के साथ, तुम्हें जो महान् कुल मे उत्पन्न हुई हो, सुन्दर हो, दर्शनीय हो जाना
योग्य नहीं।
उसकी इस बात को सुनकर सेठ की लडकी ने दूसरी गाथा कही—
पुरिसूत्तम मञ्ञमाना अह खुज्जमकामयि,
सोय सकुदितो सेति छिन्नतन्ति यथा घुणा ॥
[ मैने कुबडे को पुरुषो म वृषभ समझ कर उसकी इच्छा की। यह तार
टूटी वीणा की तरह सुकदा हुआ पडा है।]