जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
About this granth
The Jatakas belong to the Khuddaka Nikaya of the Pali Sutta Pitaka and tell some five hundred and fifty stories of the Buddha's former lives. Each opens with a present-day incident that prompts the Teacher to speak, then gives the 'story of the past' about the Bodhisattva, and ends by identifying who in the story is who now. Together they are a great storehouse of Indian folk tale, art and moral teaching.
The complete Jataka was translated from Pali into Hindi by Bhadant Anand Kausalyayan and published in several volumes by the Hindi Sahitya Sammelan, Prayag. This is the second volume of that translation, beginning with Jataka no. 101, the Parosata Jataka, and arranged in vaggas.
The contents give a one-line summary of each story: a father testing his daughter's loyalty in the Pannika Jataka, an elephant frightened by brittle wood falling in the wind, a hunchback who cures a talkative priest by flicking goat droppings into his mouth, and a castor-tree spirit who accepts a devotee's humble cake of bran. The Kutavanija and Sunakha Jatakas are also here. The 479 pages suit readers of Buddhist literature and of India's story traditions.
१३५. चन्दाभ जातक
चन्दाभ ] ८७
१३५. चन्दाभ जातक
“चन्दाभं...”, यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
सङ्कस्स नगर के द्वार पर स्थविर की प्रश्न-की-व्याख्या के ही बारे में कही—
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने
एकात जगल में मृत्यु को प्राप्त होने के समय शिष्यो के पूछने पर चन्दाभं सुरि-
याभं कहा। वह मरकर आभस्वर लोक में उत्पन्न हुए। तपस्वियो ने ज्येष्ठ-
शिष्य की बात पर विश्वास नहीं किया। बोधिसत्त्व ने आकर आकाश में उप-
स्थित हो यह गाथा कही—
चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय गाधति,
अवितक्केन झानेन होति आभस्सरूपगो ॥
[ जो प्रज्ञा से सूर्याभा तथा चन्द्राभा पर स्थिर होता है। वह वितर्क-
रहित ध्यान से आभस्वर-लोक में उत्पन्न होता है। ]
चन्दाभं का मतलब है श्वेत-कसिण। सुरियाभं का पीत-कसिण।
योघ पञ्ञाय गाधति, जो आदमी इस ससार में इन दोनो कसिणों की प्रज्ञा से
भावना करता है, उन्हें आलम्बन बनाकर उनमें प्रवेश करता है, उनमें प्रतिष्ठित
होता है। अथवा चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय भावति, जहाँ तक सूर्य
तथा चन्द्रमा की आभा फैली है, उस सारे स्थान में परिभाग-कसित¹ को बढाकर
उसी को आलंबन बनाकर ध्यान का अभ्यास करनेवाला दोनों आभाओ की प्रज्ञा
से भावना करता है। इसलिए यह भी ठीक अर्थ है। वितक्केन झानेन होति
¹परिभाग-कसिण=पटिभाग निमित्त (अभिधम्मत्य संगहो ६।१८)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
८८ [ १.१४.१३६
आभस्सरूपगो, वह मनुष्य वैसा अभ्यास करने से द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो
आभस्वर-ब्रह्मलोक को प्राप्त होना ही है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व तपस्वियों को समझाकर तथा ज्येष्ठ शिष्य की प्रशंसा
कर ब्रह्मलोक गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
शिष्य सारिपुत्र थे और महाब्रह्मा तो मै ही था।
१३६. सुवण्णहंस जातक
"यं लद्धं तेन तुट्ठब्ब...", यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
थुल्ल नन्दा भिक्षुणी के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक उपासक ने भिक्षुणी संघ को लहसुन लेने का निमन्त्रण दिया
और अपने खेत वाले को आज्ञा दी कि यदि भिक्षुणियां आएँ तो एक एक भिक्षुणी
को दो तीन गांठ लहसुन दे। उसके बाद से भिक्षुणियां उसके घर भी और खेत
पर भी लहसुन के लिए जाने लगीं।
एक उत्सव के दिन उस (उपासक) के घर में लहसुन समाप्त हो गया।
थुल्लनन्दा भिक्षुणी औरों को साथ ले घर गई और बोली—आयुष्मानो, लहसुन
की आवश्यकता है।
—आर्ये, लहसुन नहीं हैं। लाया हुआ समाप्त हो गया। खेत पर जाएँ।
वह खेत पर गई और बेअन्दाज लहसुन लिवा लाई।
खेत वाला खीझा—यह क्या है कि भिक्षुणियां अन्दाज न कर बे अंदाज
लहसुन ले जाती हैं।
सुवण्णहंस ] ८६
उसे यह कहता सुन जो अप्पेच्छ भिक्षुणियां थी वह असन्तुष्ट हुई और उनमें
सुनकर भिक्षु भी असन्तुष्ट हुए। उन्होंने खीझकर भगवान् से यह बात कही।
भगवान् ने थुल्लनन्दा भिक्षुणी की निन्दा कर कहा—
“भिक्षुओ, लालची (=महेच्छ) आदमी जिस मां ने जन्म दिया है,
उसके लिए भी अप्रिय हो जाता है। वह अप्रसन्न को प्रसन्न नहीं कर सकता।
प्रसन्नो को अधिक प्रसन्न नहीं कर सकता। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर
सकता। प्राप्त वस्तु को सँभाल कर नहीं रख सकता। अप्पेच्छ आदमी
अप्रसन्नो को प्रसन्न कर सकता है। प्रसन्न को अधिक प्रसन्न कर सकता है।
अप्राप्त वस्तु को प्राप्त कर सकता है। प्राप्त वस्तु को बनाए रख सकता है।”
—इस प्रकार भिक्षुओं को उनके योग्य उपदेश दे फिर कहा 'भिक्षुओ, थुल्ल
नन्दा अभी लोभी नहीं है, पहले भी लोभी ही रही है।' इतना कह पूर्व-जन्म
की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उनके बड़े होने पर उनके समान जाति-कुल से
उन्हे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे नन्दा, नन्दवती और नन्दसुन्दरी
तीन लड़कियाँ हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्त्व मर कर स्वर्ण-
हंस होकर पैदा हुए। उन्हें पूर्व-जन्म-स्मृति का ज्ञान भी रहा।
उसने बड़े होने पर सोने के परो से ढके हुए परम सौभाग्यवान् अपने शरीर
को देखकर विचार किया कि मै कहाँ से मरकर यहाँ पैदा हुआ हूँ? उसे मालूम
हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लडकियो
का जीवन-यापन कैसे होता है ? उसे पता लगा कि दूसरो की मजदूरी करके
बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती है। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस१
हैं। इनमें से में एक एक पर उन्हे दू। इस से मेरी भार्या और लड़कियाँ
सुखपूर्वक जीएँगी।” वह यहाँ पहुँच घर के शहतीर के एक सिरे पर बैठ।
———
१कूटे और रगडे जा सकते हैं।
६० [ १४।१३६
ब्राह्मणी और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा—स्वामी, कहाँ
से आए ?
"मैं तुम्हारा पिता हूँ। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूँ। तुम्हें
देखने के लिए आया हूँ। इसके बाद तुम्हे दूसरो की मजदूरी करते हुए कष्ट-
पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नही है। में तुम्हें अपना एक एक पर दिया
करूँगा। उसे बेच-वेच कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना।"
इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार वह बीच बीच में
आकर एक एक पर देता। ब्राह्मणियाँ धनी और सुखी हो गईं।
एक दिन उस ब्राह्मणी ने लडकियो से बुलाकर सलाह की—'अम्म !
जानवरो के दिल का पता नही। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए।
इसलिए उसके इस बार आने पर हम उसके सभी पर उखाड लें।'
उन्होने अस्वीकार किया। वे बोली—इस प्रकार हमारे पिता को कष्ट
होगा।
ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-राजहंस के आने
पर कहा—स्वामी आएँ।
जब उसने देखा कि यह उसके पास आ गया है, तो दोनो हाथो से पकड़कर
उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्त्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती
लिए जाने के कारण बगले के पर सदृश हो गए।
अब बोधिसत्त्व पक्ष पसारकर उड़ न सके। उसने उन्हें मटके में रखकर
पाला। उनके जो नए पर निकले वह श्वेत ही निकले। पक्ष निकलने पर
वह उड़कर अपने स्थान पर चले गए, और फिर वहाँ नही गए।
शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात सुनाकर कहा—भिक्षुओ, थुल्लनन्दा अभी
लालची नही रही है। पहले भी लालची रही है। लालच के ही कारण स्वर्ण
से हाथ धोया। अब अपने लालच के कारण लहसुन से भी हाथ धोएगी।
इसके बाद अब लहसुन खाना न मिलेगा। जैसे थुल्लनन्दा को वैसे ही उसके
कारण दूसरी भिक्षुणियों को भी। इस लिए बहुत मिलने पर भी अपना
। जानना चाहिए। थोडा मिलने पर जितना मिले उसी से सन्तोष
ना चाहिए। अधिक की इच्छा नही करनी चाहिए।
इतना कह यह गाथा कही—
बब्बु ] ६१
य लद्ध तेन तुट्ठव्व अतिलोभो हि पापको,
हंसराज गहेत्वान सुवण्णा परिहायथ ॥
[ जो मिले उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ करना पाप है।
हंसराज को पकड़कर स्वर्ण से हाथ धोया । ]
तुट्ठव्वं का मतलब है संतोष करना चाहिए।
इतना कह शास्ता ने अनेक प्रकार से निन्दा कर नियम बना दिया कि
जो भिक्षुणी लहसुन खाए उसे पाचित्तिय (-दोष) लगे ।¹
फिर जातक का मेल बैठाया। उस समय की ब्राह्मणी यह थुल्लनन्दा
हुई। तीन लड़कियाँ इस समय की तीन बहनें। स्वर्ण-राजहंस तो मैं ही था।
१३७. बब्बु जातक
“प्रत्येको लभते बब्बु...”, शास्ता ने इसे जेतवन में विहार करते समय
काणमाता के शिक्षा-पद² के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में अपनी कानी लड़की के कारण काण माता कहलाने वाली
एक श्रोतापन्न आर्य-श्राविका थी। उसने अपनी कानी लड़की को एक गामड़े
¹ भिक्खुणी-पातिमोक्ख ।
² पाचित्तिय के भोजन-वर्ग का चौथा शिक्षापद ।
६२ [ १.१४.१३७
में समान जाति के किसी आदमी को दिया। काणा किसी काम से माँ के घर
आई।
कुछ दिन बीतने पर उसके स्वामी ने दूत भेजा—मैं चाहता हूँ कि काणा
आये। काणा चली आवे।
काणा ने दूत की बात सुन, माँ से पूछा—माँ ! जाती हूँ।
काण-माता ने सोचा कि इतने दिन रहकर खाली हाथ कैसे जाएगी, इस
लिए पुए पकाने लगी।
उस समय एक पिण्डपातिक¹ भिक्षु उसके घर आया। उपासिका ने उसे
बिठाकर पात्रभर पुए दिलवाए। उसने निकल दूसरे (भिक्षु) से कहा। उसे भी
वैसे दिलवाए। उसने भी निकलकर दूसरे से कहा। उसे भी वैसे ही।
इस प्रकार चार जनों को पुए दिलवाए। सब तैयार पुए समाप्त हो गए।
काणा का जाना नहीं हुआ।
उसके स्वामी ने दूसरा दूत भेजा और दूसरे के बाद तीसरा भेजा। तीसरे
दूत के हाथ उसने कहला भेजा कि यदि काणा नहीं आएगी तो में दूसरी भार्या
ले आऊँगा। तीनों बार उसी तरह जाना न हो सका। काणा का स्वामी दूसरी
स्त्री ले आया। काणा ने जब यह सुना तो रोने लगी।
शास्ता को पता लगा तो पहन कर पात्र-चीवर ले काण-माता के घर जा
बिछे आसन पर बैठकर पूछा—
“यह क्यो रोती है ?”
“इस कारण से ।”
शास्ता ने धर्मकथा कह काण-माता को दिलासा दिया। फिर उठकर
विहार को गए।
उन चार भिक्षुओं को तीन बार तैयार पुए ले आकर काणा के गमन में
बाधक होने की बात भिक्षुसंघ में प्रकट हो गई।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! चार
¹जो भिक्षु केवल भिक्षा से ही निर्वाह करता है, निमन्त्रण आदि ग्रहण
नहीं करता।
दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—
भिक्षु तीन बार काण-माता के यहाँ तैयार किए सब पुए खा गए। इससे काणा
र जाना रुक गया। स्वामी ने लडकी को छोड दिया। अब इससे महा-
पासिका के मन को बहुत दुख हुआ है।
शास्ता ने आकर पूछा—“भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?”
अमुक बातचीत।”
भिक्षुओ, उन चार भिक्षुओ ने काण-माता का खाकर केवल अब ही उसे
दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पत्थर-
कट कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अपने शिल्प में पारङ्गत हो गए।
काशी देश के एक कस्बे में एक बडा धनवान् सेठ था। उसका गढा हुआ
खजाना ही चालीस करोड़ का सोना था।
उसकी स्त्री मरी तो वह धन के स्नेह से चुहिया होकर पैदा हुई और उस
खजाने पर रहने लगी। इस प्रकार वह कुल नष्ट हो गया। यज्ञ उजड गया।
वह गाँव भी ध्वस्त हो नामशेष रह गया।
उन दिनो वोधिसत्त्व जहाँ पहले गाँव था उसी जगह के पत्थर उखाडकर
उन्हे तराशते थे। उस चुहिया ने अपने आसपास बोधिसत्त्व को बार बार आते-
जाते देखा तो उसके मन में स्नेह पैदा हो गया। उसने सोचा मेरा बहुत सा
धन निष्प्रयोजन नष्ट हुआ जाता है। मै और यह इकट्ठे मिलकर इस धन को
खाएँगे। एक दिन वह मुँह में एक कार्षापण पकड हुए बोधिसत्त्व के पास पहुँची।
बोधिसत्त्व ने प्रिय वाणी का प्रयोग करते हुए पूछा—
“अम्म ! कार्षापण लेकर क्यो आई है ?”
“तात ! इसे लेकर स्वय भी खाएँ और मेरे लिए भी मास लाएँ।”
बोधिसत्त्व ने ‘अच्छा’ कह स्वीकार कर कार्षापण ले घर जाकर एक मासे
का मास खरीदकर उसे लाकर दिया। उसने उसे ले अपने निवासस्थान पर जा
जी भरकर खाया।
उसके बाद से वह इसी तरह प्रतिदिन बोधिसत्त्व को कार्षापण देती।
वह भी उससे मास ला देता।
९४ [ १.१४.१३७
एक दिन उस चुहिया को बिल्ले ने पकड़ लिया । वह बोली—स्वामी !
मुझे न मारें।"
"क्यो ? मुझे भूख लगी है ! मै मास खाना चाहता हूँ । मैं बिना मारे
नही रह सकता ।"
"क्या केवल एक दिन एक ही बार मास खाना चाहते है, अथवा नित्य
प्रति ?"
"मिले तो नित्य खाना चाहूँगा ।"
"यदि ऐसा है, तो मुझे छोड़ दें । मै नित्य प्रति मांस दिया करूँगी ।"
"अच्छा तो ध्यान रखना" कह बिल्ले ने उसे छोड़ दिया ।
उसके बाद से उसके लिए जो मास आता उसके वह दो हिस्से करके एक
बिल्ले को देती एक स्वयं खाती ।
फिर एक दिन उसे एक दूसरे बिल्ले ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह
मनाकर अपने आप को छुड़ाया । उसके बाद से तीन हिस्से करके खाने लगी ।
फिर एक और ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने को छुड़ाया
उसके बाद से चार हिस्से करके खाने लगी । फिर एक ने पकड़ लिया । उसे भी
उसी तरह समझाकर अपने को छुड़ाया । उसके बाद से पाँच हिस्से करके
खाने लगी ।
केवल पाँचवाँ हिस्सा मिलने से यह चुहिया आहार की कमी से म्लान तथा
कृश हो गई । उसका मांस और रक्त कम पड़ गया । बोधिसत्त्व ने उसे देखकर
पूछा—"अम्म ! म्लान क्यो पड़ गई है ?"
"इस कारण से ।"
चुहिया बोली—अरे दुष्ट बिलार ! क्या मैं तेरी नौकर हूँ कि मांस लाकर
दूँ । अपने पुत्रों का मांस खा ।
बिल्ला नहीं जानता था कि चुहिया स्फटिक गुहा के अन्दर है । उसने क्रोध
से सहसा आक्रमण किया कि चुहिया को पकडूंगा । उसका हृदय स्फटिक गुहा
से टकराया और उसी समय चूर चूर हो गया । आंखें निकल आईं सी हो गईं ।
वह वही मरकर एक छिपे हुए स्थान पर गिरा । इस प्रकार दूसरे चार जने भी
मृत्यु को प्राप्त हुए ।
उसके बाद से चुहिया निर्भय हो गई । वह बोधिसत्त्व को प्रतिदिन दो
तीन कार्षापण देती । इस प्रकार उसने सारा धन बोधिसत्त्व को ही दे दिया ।
वे दोनो जीवन भर मित्र-भाव से रह यथाकर्म (परलोक) सिधारे ।
शास्ता ने यह पूर्वजन्म की कथा कह सम्यक् सम्बुद्ध हुए रहने पर यह गाथा
कही—
यत्थेषो लभते बब्बु दुतियो तत्थ जायति,
ततियो च चतुत्थो च इदं ते बब्बुका बिलं ॥
[ जहाँ एक बिल्ले को (मांस) मिलता है दूसरा वही जाता है । तीसरा
भी वही जाता है और चौथा भी वही । हे बिल्ले ! यह तेरा बिल¹ है । ]
यत्थ जिस जगह । बब्बु, बिल्ला । दुतियो तत्थ जायति, जहां एक को
चुहिया अथवा मास मिलता है, दूसरा बिल्ला भी वही जाता है । वैसे ही ततियो
च चतुत्थो च, इस प्रकार वहाँ चार बिल्ले हुए । वे दिन प्रति दिन मास खाते
हुए । ते बब्बुका इदं स्फटिक का बना हुआ बिल पेट में गड़ाकर सभी मर गए ।
इस प्रकार शास्ता ने धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया ।
उस समय के चारो बिल्ले चार भिक्षु हुए । चुहिया काण-माता हुई ।
पत्थर तराशनेवाला जौहरी तो मैं ही था ।
¹ प्रतीत होता है कि यह गाथा चुहिया द्वारा कही गई थी । इस में
'बिल' शब्द का अर्थ 'हिस्सा' होना चाहिए । जातककार ने यह गाथा
बुद्ध-भाषित बनाई है; और बिल का जो अर्थ किया है वह मेल नहीं खाता ।
१३८. गोध जातक
६६ [ १.१४.१३८
१३८. गोध जातक
“किं ते जटाहि दुम्मेध...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ढोंगी के बारे में कही।
वर्तमान-कथा जैसी कथा पहले आई है,१ वैसी ही है।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए।
उस समय पाँच-अभिञ्ज्ञा प्राप्त (एक) उग्र तपस्वी एक गाँव के समीप
जंगल में पर्ण-कुटी में रहता था। ग्रामवासी तपस्वी की अच्छी तरह सेवा करते
थे। बोधिसत्त्व उसके चङ्क्रमण करने की जगह के पास एक बिल में रहते थे।
प्रतिदिन दो तीन बार तपस्वी के पास आकर धर्म तथा अर्थपूर्ण बातें सुन तपस्वी
को प्रणाम कर अपने निवासस्थान को लौट जाते। आगे चलकर तपस्वी ग्राम-
वासियों को पूछकर वहाँ से चला गया। उस शीलव्रतसम्पन्न तपस्वी के चले
जाने पर एक दूसरा कुटिल तपस्वी आकर उसी आश्रम में रहने लगा। बोधि-
सत्त्व उसे भी पहले ही तपस्वी की तरह सदाचारी समझ उसके पास गए।
एक दिन ग्रीष्मऋतु में अकाल वर्षा बरसने पर बिलों में से मक्खियाँ
निकलीं। उन्हें खाने के लिए गोह घूमने लगीं। ग्रामवासियों ने बाहर निकल
बहुत सी गोहें पकड़ चिकनी भोजन सामग्री के साथ खट्टा-मीठा गोह-मांस
तैयारकर उस तपस्वी को दिया।
१भीमसेन जातक (८०)
गोध ] ६७
तपस्वी ने गोह का मांस खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । उसने पूछा
—यह मांस बड़ा मीठा है। किसका मांस है ? जब उसे पता लगा कि किसका
मांस है, तो वह सोचने लगा कि मेरे पास बड़ी गोह आती है । उसे मारकर
उसका मांस खाऊँगा । उसने पकाने के बरतन और उनके साथ घी, नमक
आदि मँगवा कर एक ओर रख लिए। स्वयं मुद्गर ले काषाय वस्त्र से ढँक
पर्ण-कुटी के सामने शान्त-चित्त की तरह बैठ बोधिसत्त्व की प्रतीक्षा करने
लगा।
बोधिसत्त्व शाम को तपस्वी के पास जाने के लिए निकले। समीप पहुँचते
ही उसकी इन्द्रियों में विकार देखकर सोचने लगे—यह तपस्वी उस तरह नहीं
बैठा है जैसे और दिनों बैठा रहता था। आज यह मेरी ओर द्रूषित दृष्टि
से देख रहा है। इसकी परीक्षा करूँगा । वे जिधर से तपस्वी की देह को छूकर
हवा आ रही थी उधर खड़े हुए । गोह के मांस की गन्ध आई । उसे सूंघकर
बोधिसत्त्व ने सोचा—इस कुटिल तपस्वी ने आज गोह मांस खाया होगा ।
इसी से यह रस-तृष्णा में आसक्त हो गया । आज मेरे समीप पहुँचने पर मुझे
मुद्गर से मार मांस पकाकर खाना चाहता होगा । वह उसके पास न जा
वापिस लौटकर घूमने लगे ।
तपस्वी ने बोधिसत्त्व को न आता देख समझा कि यह जान गया होगा कि
मैं इसे मारना चाहता हूँ । इसी से नहीं आता है । न आने पर भी यह कहाँ
बचकर जाएगा । उसने मुद्गर निकाल फेंककर मारा । वह उसकी पूँछ के
सिरे में ही लगा ।
बोधिसत्त्व जल्दी से बिल में प्रविष्ट हो दूसरे छेद से सीस निकालकर बोले
—'कुटिल जटिल ! मैं तुझे सदाचारी समझ कर तेरे पास आया । लेकिन
अब मैंने तेरा कुटिल स्वभाव जान लिया । तेरे जैसे महाचोर को इस प्रव्रजित
भेष से क्या ?'' इस प्रकार उसकी निन्दा करते हुए यह गाथा कही—
किं ते जटाहि दुम्मेध किं ते अजिन साटिया,
अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१
१ धम्मपद (२६।२२)
७
३८ [ १.१४ १३६
[हे दुर्बुद्धि ! जटाओ से तुझे क्या (लाभ) ? और मृगचर्म के पहनने
से क्या ? अन्दर से तो तू मैला है, बाहर से धोता है।]
किं ते जटाहि दुम्मेध, भो, दुर्बुद्धि ! मूर्ख ! यह जटाएँ प्रव्रजित को
धारण करनी चाहिएँ। प्रव्रज्या गुण से तू रहित है। तुझे इन जटाओ से क्या
लाभ ? किं ते प्रजिन साटिया, मृग-चर्म के अनुकूल सयम का अभाव है, तब
इस मृग-चर्म से क्या ? अब्भन्तर ते गहन—तेरा भीतर राग, द्वेष तथा
मोह से मलिन है, ढका हुआ है। बाहिर परिमज्जसि, सो तू अभ्यन्तर को
मैला ही रख स्नान आदि से तथा (श्रमण-) चिह्न धारण करके बाहर को साफ
करता है। तू वैसा ही है जैसे वाञ्जी से भरा हुआ तूम्बा हो, विष से भरा घडा
हो, साँप से भरी हुई वाँवी हो अथवा गूढ़ से भरा हुआ चित्रित घडा हो। तुझ
चोर के यहाँ रहन से क्या ? शीघ्र भाग । यदि नही जाएगा तो ग्रामवासियो
को कहकर तेरा निग्रह करवाऊँगा।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उस कुटिल तपस्वी को धमकाकर बिल में चले गए।
कुटिल तपस्वी भी वहाँ से चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय कुटिल
तपस्वी यह ढोंगी था। पहला शीलवान् तपस्वी सारिपुत्र था। गोधपण्डित
तो मैं ही था।
१३६. उभतोभट्ठ जातक
"अवस्सो भित्तो पटो नष्टो . ." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते
समय देवदत्त के बारे म कही।
वह पीडा से पगला हो हाथ से आंखो को दबाए हुए पानी से बाहर निकल
कांपता हुआ कपडे खोजने लगा।
उसकी भार्या ने भी सोचा कि मे झगडा करके ऐसा कर दूं कि कोई कुछ
आशा न रक्खे। उसने एक कान में ताड का पत्ता पहना, एक आंख में हांडी का
काजल लगाया और गोद में कुत्ता ले पडोसी के घर गई। उसकी एक पडोसन
बोली—"तूने एक ही कान में ताड का पत्ता डाला है, एक ही आंख में कज्जल
लगाया है और गोद में कुत्ते को ऐसे लेकर जैसे यह तेरा प्यारा पुत्र हो एक
घर से दूसरे घर घूम रही है। क्या तू पगली हो गई है ?"
"मै पगली नही हूँ ? तू मुझे व्यर्थ ही गाली देती है, मजाक करती है। अब
में मुखिया¹ के पास जाकर तुझपर आठ कार्षापण जुर्माना करवाऊँगी।"
इस प्रकार परस्पर झगडकर दोनो मुखिया के पास गईं। दोषी का पता
लगाने से वही दण्डित हुई।
लोग उसे बांधकर पीटने लगे कि जुर्माना दे।
वृक्षदेवता ने गांव मे उसका यह हाल और जगल में उसके पति की विपत्ति
को देख एक टहने पर खडे होकर कहा—भो ! पुरुष ! जल में भी तेरा
काम बिगडा, स्थल पर भी। तू दोनो ओर से भ्रष्ट होगया। इतना कह यह
गाथा कही—
अक्खी भिन्ना पटो नट्ठो सखीगेहे च भण्डन,
उभतो पदुट्ठकम्मन्तो उदकम्हि थलम्हि च ॥
[ आंख फूट गई। वस्त्र खोया गया। सखी के घर में झगडा हुआ।
जल और स्थल दोनो ही में तेरा काम बिगड गया।]
सखीगेहे च भण्डन, सखी का मतलब है सहायिका, उसके घर में तेरी भार्या
न झगडा किया। झगडा करके बांधी गई, पीटी गई और दण्डित हुई।
उभतो पदुट्ठ कम्मन्तो, इस प्रकार दोनो जगह में तेरा काम बिगडा ही।
कौन से दो स्थानो में ? उदकम्हि थलम्हि च, आँख फूटने से और वस्त्र नष्ट
¹ ग्रामभोजकं ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मछुआ
काक ] १०१
होने से जल में काम बिगडा, सखी के घर पर झगडा होने से स्थल पर काम
बिगडा ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मछुआ
देवदत्त था। वृक्षदेवता तो में ही था।
१४०. काक जातक
“निच्चं उब्बिग्ग हृदया...” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय जाति-सेवा के बारे में कही। वर्तमान कथा बारहवें निपात की भद्दसाल
जातक¹ में आएगी।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कौए की योनि म पैदा हुए।
एक दिन राजा का पुरोहित नगर के बाहर नदी पर स्नान कर, सुगन्धित
लेप कर, मालाएँ पहन सुन्दर वस्त्र धारण किए नगर में प्रविष्ट हुआ। नगर-
द्वार के तोरण पर दो कौए बैठे थे। उनमें से एक ने दूसरे को कहा—
"मित्र ! मै इस ब्राह्मण के सिर पर बीट करूँगा।"
"यह अच्छा नही है। यह ब्राह्मण ऐश्वर्य्यशाली है। ऐश्वर्य्यशालियो
के साथ बैर करना बुरा है। यह क्रुद्ध होने पर सभी कौवो को भी नष्ट कर
सकता है।"
¹ भद्दसाल जातक (४६५)
काक ] १०३
उसके बाद से कौवे मारे जाने लगे, और चर्बी न पाकर जहाँ तहाँ उनका
ढेर लगाया जाने लगा। कौवो पर वडी भारी विपत्ति आई।
उस समय बोधिसत्त्व अस्सी हजार कौओ के साथ महाश्मशान वन में रहते
थे। एक कौये ने जाकर वोधिसत्त्व को कौओ पर आई विपत्ति का समाचार
कहा। उसने सोचा--'मेरे अतिरिक्त कोई मेरी जातिवालो के दुख को दूर
नहीं कर सकता। मै दूर करूँगा।"
बोधिसत्त्व दस पारमिताओं का ख्यालकर, मैत्री पारमिता को प्रमुख कर
एक ही उडान में उड खुले हुए बडे रोशनदान में प्रविष्ट हो राजा के आसन के
नीचे जा बैठे। उन्हें एक मनुष्य पकडने लगा। राजा ने रोका—शरण में
आए को मत पकडो। बोधिसत्व ने थोडा विश्राम ले मैत्री-पारमी का ध्यान
कर आसन के नीचे से निकल राजा से कहा—महाराज ! राजा को चाहिए
कि यह उत्तेजना के वशीभूत होकर राज्य न करे। जो भी कार्य करना हो
वह सोच विचार कर करना चाहिए। जो करने से हो सके, वही कार्य करना
चाहिए, दूसरा नहीं। यदि राजा ऐसा कार्य करते हैं जिसका कोई फल नहीं
होता तो यह जनता के लिए मरण होता है, महान् भय का कारण होता है।
पुरोहित ने बैर के वश हो झूठ कहा है। कौओ को चर्बी होनी ही नही।
राजा प्रसन्न हुआ। उसने बोधिसत्व को सोने का सुन्दर पीढा दिया।
वहाँ बैठने पर उसके परो को सौ-पाक सहस्र-पाक तैल लगवाया। सोने के
थाल में राज-भोजन दिलवाया। पानी पिलवाया। अच्छी तरह से खा चुकने
पर जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे तब राजा ने पूछा—"पण्डित, तू कहता है,
कौवो को चर्बी नही होती। उनको चर्बी क्यो नही होती ?"
बोधिसत्त्व ने इन इन कारणो से नही होती बताते हुए सारे घर को अपने
शब्द से गूंजाते हुए धर्म-कथा की, और यह गाथा कही—
निच्च उब्बिग्गहृदया सब्बलोकविहेसका,
तस्मा तेसं वसा नत्थि काकानस्माकञातिन ॥
[हृदय नित्य उद्विग्न रहता है। सारे ससार को कष्ट देते हैं। इसलिए
५जा ' हमारी जाति के लोग—जो कौए हैं—चर्बी-रहित होते हैं।]
१०४ [ १.१४.१४० ]
महाराज ! कौवे सदैव उद्विग्न हृदय होते है, भयभीत ही विचरते है।
सारे संसार को कष्ट देते है—क्षत्रिय आदि को भी, स्त्री-पुरुष को भी, लडके
लडकियो को भी—सभी को तकलीफ पहुँचाते है। इसलिए इन दो कारणो से
हमारे जातिवालो को चर्बी नही होती। पहले भी नही हुई। आगे भी नहीं
. होगी।
इस प्रकार बोधिसत्व ने यह बात स्पष्ट कर राजा को समझाया—
महाराज ! राजा किसी भी बात को बिना सोचे-विचारे नही करते ।
राजा ने प्रसन्न हो राज्य बोधिसत्त्व को भेंट किया। बोधिसत्त्व ने राज्य
राजा को लौटा दिया। फिर उसे पञ्चशीलो में प्रतिष्ठित कर उससे सभी
प्राणियो को अभय-दान देने के लिए कहा। राजा ने धर्मोपदेश सुन सभी प्राणियो
को अभय-दान दे कौओ के लिए नित्य-भोजन बाँध दिया। प्रतिदिन अम्मण
भर चावल का भात पकाकर नाना प्रकार के रसो से मिलाकर कौओ को दान
दिया जाता। बोधिसत्त्व को राज-भोजन ही मिलता।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी
राजा आनन्द था। कौओ का राजा तो मै ही था।
१४१. गोध जातक (२)
पहला परिच्छेद
१५. कक्कटक वर्ग
१४१. गोध जातक (२)
"न पापजनससेवी..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
विपक्षी भिक्षु की संगत करने वाले भिक्षु के बारे में कही। वर्तमान कथा
महिलामुख जातक¹ की कथा के ही समान है।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए। बडे होने पर वह नदी के किनारे एक बडे बिल में सैकडो
गोहो के साथ रहने लगे।
उनके पुत्र गोह-पिल्ले की एक गिरगिट के साथ दोस्ती हो गई। वह उसके
साथ आनन्द मनाता और गले लगाने के लिए उस पर आ पडता।
उस गिरगिट के साथ उसकी दोस्ती की बात गोहराज से कही गई।
गोहराज ने पुत्र को बुलाकर कहा—
"तात ! तू अनुचित स्थान में विश्वास कर रहा है। गिरगिट की जाति
नीच होती है। उनका विश्वास नही करना चाहिए। यदि तू उसका विश्वास
करेगा, तो तेरे और गिरगिट के कारण यह सारा गोह-कुल विनाश को प्राप्त
होगा। अब से इसके साथ दोस्ती मत रख।" उसने दोस्ती नही ही
छोडी।
¹महिलामुख जातक (२६)
१०६ [ १.१५ १४१
जब बोधिसत्त्व के बार बार कहने से भी उनकी मित्रता जैसी की तैसी रही,
तब बोधिसत्त्व ने सोचा कि इस गिरगिट के कारण हमको अवश्य खतरा होगा ।
खतरे के समय के लिए भागने का मार्ग तैयार होना चाहिए । उसने एक तरफ
हवा आने का रास्ता बनवा लिया ।
बोधिसत्त्व का पुत्र भी शनै शनै बडे शरीर वाला हुआ, गिरगिट पहले
ही जितना रहा । वह समय समय पर उसका आलिङ्गन करने के लिए गिरगिट
पर आ पडता । गिरगिट को ऐसा मालूम देता कि मानो उस पर पर्वत आ
पडा है । उसने कष्ट पाते हुए सोचा कि यदि यह और कुछ दिन इस प्रकार मेरा
आलिङ्गन करता रहा तो मैं जीवित नही रहूँगा । इसलिए किसी शिकारी
के साथ मिलकर इस गोह-कुल को ही नष्ट करवाऊँ ।
एक दिन ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने पर बांबी से मक्खियाँ निकलीं । जहाँ
तहाँ से गोह निकलकर मक्खियो को खाने लगे । एक गोह-शिकारी गोह के
बिल को फाडने के लिए कुदाल और कुत्ते साथ में ले जगल में घूम रहा था ।
गिरगिट ने उसे देखकर सोचा कि आज अपना मनोरथ पूरा करूँगा ? उसने
पास आ, थोडी दूर पर ठहर पूछा—हे ! पुरुष ! जगल में क्यो घूम रहे हो ?"
उसन कहा—गोहो के लिए । गिरगिट बोला—"मै कई सौ गोहो का निवास-
स्थान जानता हूँ । आप आग और पुआल लेकर आएँ ।" उसे वहाँ ले जाकर
कहा, "यहाँ पुआल रख, आग लगाकर धुआँ करें। चारो तरफ कुत्तों को बिठाएँ।
अपने आप मुद्गर लेकर बैठें । जो जो गोह निकले उन्हें मार मारकर ढेर लगाएँ
फिर स्वय एक जगह पर सिर उठाकर पड रहा—आज शत्रु की पीठ¹ देखने
को मिलेगी ।
शिकारी ने पुआल का धुआँ किया । धुआँ बिल में घुसा । गोह जब
धुएँ से अधे हुए तब मृत्यु भय से भयभीत हो भागने लगे । शिकारी ने जो जो
गोह निकले उन्हें मारा । उसके हाथ से बच्चो को कुत्तो ने लिया । गोहो के
लिए महाविनाश उपस्थित हुआ ।
¹शत्रु की पीठ देखना मिलने का भावार्थ है पलायन; यहा विनाश
से तात्पर्य्य है ।
गोध ] १०७
बोधिसत्त्व को मालूम हुआ कि गिरगिट के कारण महान् खतरा पैदा हो
गया । वह सोचने लगे कि पापी का साथ नहीं ही करना चाहिए । पापी की
संगत से सुख नहीं हो सकता । एक पापी गिरगिट के कारण इतने गोह नाश
को प्राप्त हुए । इस प्रकार सोचते हुए हवा आने के बिल से भागते हुए यह बात
कही—
न पापजनससेवी अच्छन्तसुखमेधति,
गोधाकुलं कक्कटाव कलिं पापेति अत्तान ॥
[ पापी की संगत करने वाले को निरन्तर सुख कभी नही मिलता । जैसे
गिरगिट के कारण गोह-कुल नष्ट हुआ, इसी प्रकार वह अपना विनाश करता
है । ]
पापजनससेवी, (पापी की संगत करनेवाला) आदमी अच्छन्तसुख, केवल
सुख ही सुख वा निरन्तर सुख न एधति, नहीं प्राप्त करता, जैसे क्या ? गोधा
कुल ककण्टाव, जैसे गिरगिट से गोह-कुल को सुख नहीं मिला । इसी प्रकार
पापी जन की संगत करनेवाले को सुख नहीं मिलता । पापी जन की संगत करने
वाला निश्चय से कलिं पापेति अत्तान, कलि कहते हैं विनाश को, पापी जन की
संगत करने वाला निश्चयपूर्वक अपने को और अपने साथ रहने वालो को नष्ट
करता है ।
पालि में फल पापेति पाठ है । वह पाठ अट्ठकथा में नहीं है । उस अर्थ
का भी यहाँ मेल नहीं बैठता । इसलिए जैसे यहाँ कहा गया, वैसे ही ग्रहण
करना चाहिए ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
गिरगिट देवदत्त था । बोधिसत्त्व का पुत्र उपदेश न माननेवाला गोह पिल्ला
विपक्ष-सेवी भिक्षु था । गोह-राज तो मैं ही था ।
१४२. सिगाल जातक
१०८ [ १.१५.१४२
१४२. सिगाल जातक
“एत हि ते दुराजानं...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के (तथागत को) मारने का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
धर्म-सभा में भिक्षुओ की बातचीत सुनकर तथागत ने कहा—भिक्षुओ !
देवदत्त ने केवल अभी मेरे वध की कोशिश नहीं की। पहले भी की ही है।
लेकिन मुझे मार नहीं सका। स्वयं ही दुखी हुआ। यह कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गीदड होकर पैदा हुए। वह शृगाल-राजा बन शृगाल गण सहित श्मशान में
रहने लगे।
उस समय राजगृह में उत्सव था। अधिकांश मनुष्य सुरा पीते थे, वह
था ही सुरा-उत्सव। अनेक धूर्त बहुत सी सुरा और मांस ले आए, और मस्त
होकर सुरा पीने तथा मांस खाने लगे। रात्रि के पहले पहर मे ही उनका मांस
समाप्त हो गया, सुरा तो बहुत थी।
एक बोला—“मांस का टुकडा दो।”
दूसरे ने कहा—“मांस तो समाप्त हो गया।” "मेरे खडे रहते कही मांस
समाप्त हो सकता है ?" 'यह उसने सोचा कि कच्चे श्मशान में मृत मनुष्यो को
खाने के लिए आए हुए शृगालो को मारकर मांस लाऊँगा। वह एक मोगरी ले
नाली के रास्ते शहर से निकल श्मशान म जा मोगरी सहित मृतक की तरह
सीधा ही लेट रहा।