जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 116 of 479
Read in context६२ [ १.१४.१३७
में समान जाति के किसी आदमी को दिया। काणा किसी काम से माँ के घर
आई।
कुछ दिन बीतने पर उसके स्वामी ने दूत भेजा—मैं चाहता हूँ कि काणा
आये। काणा चली आवे।
काणा ने दूत की बात सुन, माँ से पूछा—माँ ! जाती हूँ।
काण-माता ने सोचा कि इतने दिन रहकर खाली हाथ कैसे जाएगी, इस
लिए पुए पकाने लगी।
उस समय एक पिण्डपातिक¹ भिक्षु उसके घर आया। उपासिका ने उसे
बिठाकर पात्रभर पुए दिलवाए। उसने निकल दूसरे (भिक्षु) से कहा। उसे भी
वैसे दिलवाए। उसने भी निकलकर दूसरे से कहा। उसे भी वैसे ही।
इस प्रकार चार जनों को पुए दिलवाए। सब तैयार पुए समाप्त हो गए।
काणा का जाना नहीं हुआ।
उसके स्वामी ने दूसरा दूत भेजा और दूसरे के बाद तीसरा भेजा। तीसरे
दूत के हाथ उसने कहला भेजा कि यदि काणा नहीं आएगी तो में दूसरी भार्या
ले आऊँगा। तीनों बार उसी तरह जाना न हो सका। काणा का स्वामी दूसरी
स्त्री ले आया। काणा ने जब यह सुना तो रोने लगी।
शास्ता को पता लगा तो पहन कर पात्र-चीवर ले काण-माता के घर जा
बिछे आसन पर बैठकर पूछा—
“यह क्यो रोती है ?”
“इस कारण से ।”
शास्ता ने धर्मकथा कह काण-माता को दिलासा दिया। फिर उठकर
विहार को गए।
उन चार भिक्षुओं को तीन बार तैयार पुए ले आकर काणा के गमन में
बाधक होने की बात भिक्षुसंघ में प्रकट हो गई।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! चार
¹जो भिक्षु केवल भिक्षा से ही निर्वाह करता है, निमन्त्रण आदि ग्रहण
नहीं करता।