जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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आभस्सरूपगो, वह मनुष्य वैसा अभ्यास करने से द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो
आभस्वर-ब्रह्मलोक को प्राप्त होना ही है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व तपस्वियों को समझाकर तथा ज्येष्ठ शिष्य की प्रशंसा
कर ब्रह्मलोक गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
शिष्य सारिपुत्र थे और महाब्रह्मा तो मै ही था।
१३६. सुवण्णहंस जातक
"यं लद्धं तेन तुट्ठब्ब...", यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
थुल्ल नन्दा भिक्षुणी के बारे में कही—
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक उपासक ने भिक्षुणी संघ को लहसुन लेने का निमन्त्रण दिया
और अपने खेत वाले को आज्ञा दी कि यदि भिक्षुणियां आएँ तो एक एक भिक्षुणी
को दो तीन गांठ लहसुन दे। उसके बाद से भिक्षुणियां उसके घर भी और खेत
पर भी लहसुन के लिए जाने लगीं।
एक उत्सव के दिन उस (उपासक) के घर में लहसुन समाप्त हो गया।
थुल्लनन्दा भिक्षुणी औरों को साथ ले घर गई और बोली—आयुष्मानो, लहसुन
की आवश्यकता है।
—आर्ये, लहसुन नहीं हैं। लाया हुआ समाप्त हो गया। खेत पर जाएँ।
वह खेत पर गई और बेअन्दाज लहसुन लिवा लाई।
खेत वाला खीझा—यह क्या है कि भिक्षुणियां अन्दाज न कर बे अंदाज
लहसुन ले जाती हैं।