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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

About this granth

The Garuda Purana (गरुड़ पुराण) is one of the eighteen Mahapuranas. As the Gita Press introduction notes, its presiding deity is Vishnu, which makes it a Vaishnava Purana. Its Pretakalpa is widely recited in the days after a death, but the Purana as a whole covers much more.

This is the Gita Press abridged edition (Sankshipt Garudapuran, book no. 1189), illustrated, in large type and in Hindi only. The first part, the Acharakanda, covers creation, the lineages of Dhruva and of Daksha's daughters, rites of Vishnu worship, the Vishnu Panjara hymn, meditation, the Vishnu Sahasranama, the Mrityunjaya mantra, the worship of Shiva, Tripura, Ganesha, Gopala, the Sudarshana discus and Hayagriva, mantras against snake poison, and the Gayatri nyasa and sandhya. The second part, the Pretakalpa of the Dharmakanda, describes death, the journey of the soul and the rites for the departed.

The copy here is the 32nd reprint, of Samvat 2076, and runs to 634 pages, a way to read the whole Purana in simple Hindi without the Sanskrit.

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५३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बच्चेको शिशु, सत्ताईस मासतकके अवस्थाप्राप्त बच्चेको बालक, पाँच वर्षकी आयुवालेको कुमार, नौ वर्षवालेको पौगण्ड, सोलह वर्षवालेको किशोर और उसके बादका यौवन-काल है। पाँच वर्षकी अल्पायुमें मृत कुमार चाहे उसका व्रतबन्ध हुआ हो अथवा न हुआ हो, वह पूर्वकथित विधानके अनुसार दशपिण्ड-कृत्यकी कामना करता है। स्वल्प कर्म, स्वल्प प्रसंग, स्वल्प विषयबन्धन, स्वल्प शरीर तथा स्वल्प वस्त्रके कारण प्राणी स्वल्प क्रियाकी इच्छा करता है।<sup>१</sup> जीव जबतक वृद्धिकी ओर बढ़ रहा हो, जबतक वह सांसारिक विषय-वासनाओंसे घिरा हो, तबतक उसे अपने उस मृत परिजनको वे सभी भोज्य पदार्थ और आवश्यक वस्तुएँ देनी चाहिये, जो उसके लिये उपजीव्य<sup>२</sup> और इच्छित थीं।

हे खगेश! चाहे बालक हों या वृद्ध हों अथवा युवा हों सभी प्राणी घटकी इच्छा करते हैं। सर्वत्रगामी देही जीवात्मा सदैव सुख-दुःखका अनुभव करता है। जिस प्रकार साँप अपनी पुरानी केंचुलका परित्याग कर देता है, उसी प्रकार जीव अपने पुराने शरीरका परित्याग कर अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला होकर तथा वायुभूत हो भूखसे पीड़ित हो जाता है। अतः बालककी भी मृत्यु होनेपर निश्चित ही दान देना चाहिये। जन्मसे लेकर पाँच वर्षतककी अवधिमें मरा हुआ प्राणी दानमें दिये गये असंस्कृत<sup>३</sup> भोजनका उपभोग करता है। यदि पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु हो जाती है तो वृषोत्सर्ग और सपिण्डीकरणको छोड़कर द्वादशाहके आनेपर षोडश श्राद्ध करने चाहिये। उस दिन यथाक्रम पायस (खीर)-से बने पिण्डका दान देना चाहिये। यह पिण्डदान गुड़से भी किया जा सकता है। उसी दिन सान्नोदक कुम्भ और पददान देना चाहिये। ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति महादानादि भी करने चाहिये। पक्षिश्रेष्ठ! दीप-दानादि जो कुछ शेष कर्म हैं उन्हें पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले कुमारकी मृत्यु होनेपर करना चाहिये।

हे पक्षिराज! व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) होनेसे पहले जिसका मरण हुआ है उसकी संतृप्तिके लिये पूर्वोक्त कर्म करना चाहिये। यदि मनुष्यके द्वारा सारी क्रिया नहीं की जाती है तो वह जीव पिशाच हो जाता है। व्रतबन्धके पूर्व मृत बालकके लिये पूर्वोक्त सब कर्म करना चाहिये। उसके बाद 'स्वाहा' शब्दसे समन्वित मन्त्रके द्वारा षोडश एकोद्दिष्ट श्राद्ध करे। ऋजु<sup>४</sup> कुशसे श्वेत तिलके द्वारा अपसव्य होकर समस्त क्रिया करनेसे पितृगण परम गतिको प्राप्त करते हैं और दीर्घायु होकर पुनः अपने ही कुलमें जन्म लेते हैं।

सभी प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाला पुत्र माता-पिताके प्रेमका अभिवर्धक होता है। जैसे एक आकाश, एक चन्द्र और एक आदित्य आश्रय-भेदसे पृथक्-पृथक् घटादिमें दिखायी देते हैं, वैसे ही पिताका आत्मा सभी पुत्रोंमें सदैव विचरण करता रहता है। जिसकी जो प्रकृति शुक्र-शोणित-संगमके पूर्व होती है, वही पुत्रोंमें आकर संनिहित हो जाती है। वैसे ही वे अपने जीवनमें कर्म करते हैं। किसीका पुत्र पिताका रूप लेकर उत्पन्न होता है, पिताकी अपेक्षा कोई अत्यधिक


१-जिस व्यक्तिका मरण हुआ है वह अपनी अवस्थाके अनुसार एवं अपने कर्मोंके अनुसार जिस मात्रामें, जिस रूपमें अन्न, वस्त्र आदिसे तुष्ट होता रहा है उसी मात्रामें, उसी रूपमें उसकी और्ध्वदैहिक क्रियामें अन्न, वस्त्र आदि देना चाहिये।
२-पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उपयोगी।
३-मन्त्र आदिके बिना दिया हुआ अन्न।
४-पवित्रक या मोटक आदिके बिना बनाये ही कुशका उपयोग ऋजु कुश है।

२४२- प्रेतत्वमुक्तिके उपाय

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प्रेतकल्प ] बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप ५३१


रूपवान्, गुणवान् तथा दानपरायण होता है। इस संसारमें कोई भी प्राणी एक-समान न हुआ है और न होगा। अन्धेसे अन्धा, गूँगेसे गूँगा, बहिरेसे बहिरा तथा विद्वान्‌से विद्वान् जन्म नहीं लेता है। इस सृष्टिमें कहीं भी अनुरूपता दिखायी नहीं देती।

गरुडने कहा—औरस और क्षेत्रज आदि दस प्रकारके पुत्र माने गये हैं। जो संगृहीत (कहींसे प्राप्त) तथा दासीसे उत्पन्न हुआ है, उससे मनुष्यको क्या लाभ प्राप्त हो सकता है? मृत्युके वशमें गये हुए प्राणीको उस पुत्रसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? जिस व्यक्तिके न पुत्री है और न पुत्र है, न दौहित्र (लड़कीका पुत्र-नाती) है, उसका श्राद्ध किसके द्वारा किस विधिसे होना चाहिये?

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे गरुड! पुत्रके मुखको देख करके मनुष्य पितृऋणसे मुक्त होता है। पौत्रको देखनेसे मनुष्यको तीनों ऋणसे मुक्ति मिल जाती है। पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्रोंके होनेसे व्यक्तिको आनन्त्य लोक और स्वर्गकी प्राप्ति होती है।<sup>१</sup> जो क्षेत्रज पुत्र हैं, वे पिताको मात्र लौकिक सुख प्रदान करनेमें समर्थ होते हैं। औरस पुत्रको विधिवत् पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। अन्य पुत्र एकोद्दिष्ट श्राद्ध करते हैं, पार्वण नहीं। ब्राह्म-विवाहके नियमोंसे विवाहिता स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र पिताको स्वर्ग ले जाता है। संगृहीत पुत्र प्राणीको अधोगतिमें ले जाता है। यदि वह सांवत्सरिक श्राद्ध करता है तो उससे पिताको नरककी प्राप्ति होती है। अन्नदानके अतिरिक्त वह सब प्रकारका दान अपने पालक पिताके लिये कर सकता है। संगृहीत पुत्रको एकोद्दिष्ट श्राद्ध ही करना चाहिये, पार्वण नहीं। माता-पिताके लिये वार्षिक श्राद्ध करके वह पापसे लिप्त नहीं होता। यदि वह एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग करके पार्वण श्राद्ध करता है तो अपनेको और पितरोंको यमलोक पहुँचाता है। जो संगृहीत पुत्र और दासीसे उत्पन्न हुए पुत्रादि हैं, उन्हें तीर्थमें जाकर पितृश्राद्ध करना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये।

यदि संगृहीत पुत्र पाक-श्राद्ध<sup>२</sup> करता है तो उसके श्राद्धको वैसे ही वृथा समझना चाहिये, जैसे शूद्रान्नसे द्विजत्व नष्ट हो जाता है। वह श्राद्ध परलोकमें गये हुए पिता-पितामहादि पितरोंको प्रसन्न नहीं कर पाता। हे पक्षिश्रेष्ठ! ऐसा जानकर व्यक्तिको हीन जातिमें उत्पन्न हुए पुत्रोंका परित्याग<sup>३</sup> कर देना चाहिये। [यदि अपरिणीता] ब्राह्मणीके गर्भसे ब्राह्मणके द्वारा पुत्र उत्पन्न किया जाता है तो वह चाण्डालसे भी नीच होता है। जो पुत्र संन्यासीसे जन्म लेता है या शूद्रसे ब्राह्मणीके गर्भमें उत्पन्न होता है तो ऐसे पुत्रोंको तुम चाण्डाल ही समझो। जो सगोत्रा कन्यासे जन्म ग्रहण करता है, वह भी चाण्डाल ही होता है। हे खगेश्वर! यथाविधान विवाहिता स्त्रीसे पुत्र पैदा करके व्यक्ति स्वर्ग जाता है। ऐसे सदाचारी पुत्रोंके आचरणसे मनुष्यको सुखकी प्राप्ति निश्चित है। जो दुराचारी पुत्र है वह अपने कुत्सित आचरणसे पिताको नरकमें ले जाता है। हीन जातिसे उत्पन्न हुआ सदाचारी पुत्र अपने माता-पिताको सुख प्रदान करता है।<sup>४</sup> जो मनुष्य कलिकालके पापसे निर्मुक्त है, सिद्ध जनोंसे पूजित है, देवलोककी अप्सराओंके द्वारा सम्मानमें डुलाये जा रहे चँवर और पहनायी गयी मालासे सुशोभित है, वह अकेले ही सौ पितरों तथा नरकमें गये हुए बन्धु-बान्धवों, पुत्र-पौत्रों और प्रपौत्रोंका उद्धार कर देता है। (अध्याय २५)


१-मुखं दृष्ट्वा तु पुत्रस्य मुच्यते पैतृकादृणात्॥
$\quad$पौत्रस्य दर्शनाज्जन्तुर्मुच्यते च ऋणत्रयात्। लोकानन्त्यं दिवः प्राप्तिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः॥ (२५।३३-३४)
२-अन्न पकाकर उसके द्वारा किया गया श्राद्ध पाक-श्राद्ध है।
३-ऐसे पुत्रोंसे यथासम्भव अपना धार्मिक कृत्य नहीं करवाना चाहिये।
४-इसका तात्पर्य सदाचारकी महिमासे है।

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५४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व, प्रतिवर्ष विहित मासिक श्राद्ध आदिकी अनिवार्यता, पति-पत्नीके सह-मरण आदिकी विशेष परिस्थितिमें पाक एवं पिण्डदान आदिकी विभिन्न व्यवस्थाका निरूपण तथा बभ्रुवाहनकी कथा

गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ ! हे प्रभो ! आप मेरे ऊपर कृपा करके यह बतायें कि मरे हुए प्राणियोंका सपिण्डीकर्म किस समय करना चाहिये ? सपिण्डीकर्म होनेपर प्रेत कैसी गति प्राप्त करता है और जिस प्रेतका सपिण्डीकर्म नहीं होता, उसकी कैसी गति होती है ? स्त्री और पुरुषका किसके साथ सपिण्डीकर्म होना चाहिये। हे सुरेश्वर ! स्त्री और पुरुष एक साथ सपिण्डीकर्मके भागीदार बनकर कैसे उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं ? पतिके जीवित रहते हुए स्त्रियोंका सपिण्डीकरण कैसे हो सकता है ? वे किस प्रकार पतिलोक या स्वर्गको जाती हैं ? अन्वारोहण हो जानेपर स्त्रियोंका श्राद्ध कैसे होता है ? उनका वृषोत्सर्ग किस प्रकारसे किया जाय ? हे स्वामिन् ! सपिण्डीकरण हो जानेपर मृतकके लिये घट-दान कैसे हो ? हे हरे ! आप संसारके कल्याणार्थ इसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिन् ! जिस प्रकार सपिण्डीकरण होता है, वैसा ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। हे खगराज ! जब मनुष्य मरनेके बाद एक वर्षकी महापथ-यात्रा करता है तो पुत्र-पौत्रादिके द्वारा सपिण्डीकरण हो जानेपर वह पितृलोकमें चला जाता है। इसलिये पुत्रको पिताका सपिण्डीकरण करना चाहिये। वर्षके पूर्ण हो जानेपर पिण्डप्रवेशन अर्थात् सपिण्डीकरण करना चाहिये। हे पक्षियोंके सिंह ! वर्षके अन्तमें निश्चित रूपसे प्रेत-पिण्डका मेलन होता है। पितृपिण्डोंके साथ प्रेत-पिण्डका सम्मिलन हो जानेपर वह प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वह प्रेत नामका परित्याग करके पितृगण हो जाता है। अपने गोत्र या सापिण्ड्यमें जितने लोगोंको अशौच शास्त्रानुसार होता है उनके यहाँ यदि विवाह या कोई शुभ कार्य होना है तो तीसरे पक्ष या छः मासमें भी सपिण्डीकरण किया जा सकता है।

हे खगेश्वर ! गृहस्थके घरमें यदि किसीका मरण हुआ हो तो विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। जबतक सपिण्डीकरण नहीं हो जाता है तबतक भिक्षुक उस घरकी भिक्षाको स्वीकार नहीं करता है। अपने गोत्रमें अशौच तबतक रहता है, जबतक पिण्डका मेलन नहीं हो जाता है। पिण्डमेलन होनेपर 'प्रेत' शब्द निवृत्त हो जाता है। कुल-धर्म अनन्त हैं, पुरुषकी आयु क्षयशील है और शरीर नाशवान् है, इस कारण बारहवाँ दिन ही सपिण्डीकरण-कर्मके लिये प्रशस्त समय होता है। मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो अथवा न रहा हो, उसका सपिण्डीकरण द्वादशाहको ही कर देना चाहिये। तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने बारहवें दिन, तीसरे पक्षमें, छठे मासमें अथवा वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरणका विधान किया है।

पुत्रवान्का सपिण्डीकरणके बाद कभी भी एकोद्दिष्ट नहीं करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पश्चात् जहाँ-जहाँ श्राद्ध किया जाय, पुत्रवान्का एकोद्दिष्ट कभी न किया जाय। वहाँ-वहाँ तीन-

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प्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४१


तीन श्राद्ध (पार्वण श्राद्ध) करने आवश्यक हैं, अन्यथा कर्ता पितृघातक कहलाता है। अशक्त होनेपर भी पार्वण श्राद्ध करना चाहिये।<sup>१</sup> ऐसा मुनियोंने कहा है। यदि दिन और मास न ज्ञात हो तो उनका पार्वण श्राद्ध ही करना उचित है। पितरोंके साथ वह पिता इस लोकमें पुत्रके द्वारा दिये गये दानका फल तबतक नहीं प्राप्त करता, जबतक उसके शरीरकी उत्पत्ति पुनः [दशगात्रके पिण्डसे] नहीं हो जाती। ऐसी स्थितिमें पुत्रद्वारा किये गये इन्हीं सोलह श्राद्धोंसे प्रेत यमपाशके बन्धनसे मुक्त होता है। पुत्ररहित पुरुषका सपिण्डीकरण नहीं करना चाहिये।<sup>२</sup> पतिके जीवित रहनेपर स्त्रीका भी सपिण्डन नहीं होना चाहिये।

जिस कन्याका विवाह ब्राह्मादि-विवाह-विधिसे हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रियाएँ पतिके गोत्रसे करनी चाहिये। आसुरादि-विधिसे जिसका विवाह हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रिया पिताके गोत्रसे करनी चाहिये। पिताका सपिण्डीकरण सदैव पुत्र करे। यदि पुत्र नहीं है तो स्वयं उसकी पत्नी उस क्रियाका निर्वाह करे। उसके भी न रहनेपर सहोदर भाई, भाईका पुत्र अथवा शिष्य सपिण्डीकरण कर सकता है। सपिण्डीकरण करके वह नान्दीमुख श्राद्ध करे। हे खग! पुत्र न रहनेपर ज्येष्ठ भाईका सपिण्डीकरण कनिष्ठ भाई करे। उसके अभावमें भतीजा या पत्नी उस कर्मको सम्पन्न करे। मनुने कहा है कि—यदि सहोदर भाइयोंमेंसे एक भी भाई पुत्रवान् हो जाय तो उसी पुत्रसे अन्य सभी भाई पुत्रवान् हो जाते हैं।<sup>३</sup> यदि सभी भाई पुत्रहीन हैं तो उनका सपिण्डीकरण उनकी पत्नीको करना चाहिये अथवा वह पत्नी स्वयं न करके ऋत्विज्‌से या पुरोहितसे कराये।

चूडाकरण एवं उपनयन-संस्कारसे संस्कृत पुत्र पिताके श्राद्धको करे। जिस पुत्रका उपनयन-संस्कार नहीं हुआ है केवल चूडाकरण-संस्कार हुआ है वह श्राद्धमें स्वधाका उच्चारण तो कर सकता है पर वेदमन्त्रका उच्चारण नहीं कर सकता। स्त्रीका सपिण्डीकरण उसके पति, ससुर तथा परश्वशुरके साथ करना चाहिये। स्त्री-जातिका यह कर्म भतीजा तथा सहोदर छोटा भाई भी कर सकता है। संवत्सरपूर्ण होनेके पहले अथवा वर्षके पूर्ण होनेपर दूसरे वर्षके संधिकालमें जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण होता है, उनकी क्रिया पृथक् नहीं की जाती। हे वत्स! सपिण्डीकरण हो जानेके पश्चात् पृथक् क्रिया करना निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने पिताको पृथक् पिण्डदान देता है, वह पितृहन्ता होता है। सपिण्डीकरणके बाद पृथक् श्राद्ध उचित नहीं है। यदि कोई पृथक् पिण्डदान करता है तो वह पुनः सपिण्डीकरण करे। जो मनुष्य सपिण्डीकरण करके एकोद्दिष्ट श्राद्ध करता है, वह स्वयंको तथा प्रेतको यमराजके अधीन कर देता है।


१-(क) यहाँपर ऊनमासिक आदि तथा सांवत्सरिक [मृत्यु-तिथि आदि] श्राद्ध एकोद्दिष्ट श्राद्धके स्थानपर पार्वण श्राद्धकी विधि कात्यायनके मतसे लिखी गयी है। जो कुछ प्रदेशोंमें भी प्रचलित है। परंतु सामान्यतया ऊनमासिक सांवत्सरिकादि श्राद्धोंमें शौनकके मतानुसार एकोद्दिष्ट-विधिसे ही श्राद्ध किया जाता है।
(ख) सपिण्डीकरणं कृत्वा गयां गत्वा च धर्मवित्। एकोद्दिष्टं न कुर्वीत साग्निर्वा नाग्निमानपि॥ (दिवोदासप्रकाश)
२-उपर्युक्त श्लोकोंमें 'अपुत्रस्य' यह वाक्य 'पुत्रोत्पादन' की विधिकी प्रशंसामें पर्यवसित है। इसका तात्पर्य अपुत्रवान् पुरुषके सपिण्डन-निषेधमें नहीं है। अन्यथा—
पुत्राभावे स्वयं कुर्युः स्वभर्तॄणाममन्त्रकम्। सपिण्डीकरणं तत्र ततः पार्वणमन्वहम्॥ (श्राद्धकल्पलता पृष्ठ २४३)
'पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्यभावे सहोदरः।' (२६।२३)
'सर्वेषां पुत्रहीनानां पत्नी कुर्यात् सपिण्डनम्।' (२६।२७)
—इन वाक्योंका विरोध हो जायगा। अतः यथाविधि योग्य पुत्र उत्पन्न करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।
३-भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत् पुत्रवान् भवेत्। सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत्॥ (२६।२६)

२४४- और्ध्वदेहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त-देहके स्वरूपका वर्णन

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५४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हे पक्षिन्! वर्षपर्यन्त प्रेतसे सम्बन्धित जो भी क्रिया की जाय उसके नाम और गोत्रके सहित विद्वान् व्यक्ति करे। सपिण्डीकरण कर देनेपर भोजन और घटादिका दान, पददान तथा अन्य जो दान हैं उन्हें एकको (मृत व्यक्तिको) ही उद्देश्य करके देना चाहिये। वर्षभरके लिये अन्न और जलपूर्ण घटादिकी संख्याका निर्धारण करके ब्राह्मणको प्रदान करे। पिण्डदान देनेके पश्चात् यथाशक्ति वर्षभरके लिये उपयोगी समस्त सामग्री दानमें दे। ऐसा होनेपर मृत व्यक्ति दिव्य देह धारण करके विमानद्वारा सुखपूर्वक यमलोक चला जाता है।<sup>१</sup>

पिताके जीवित रहनेके कारण मृत पुत्रका पिताके साथ सपिण्डीकरण नहीं हो सकता अर्थात् उसका सपिण्डीकरण पितामह आदिके साथ होगा ऐसे ही पतिके जीवित होनेपर स्त्रियोंका सपिण्डीकरण उसकी श्वश्रू आदिके साथ होगा।<sup>२</sup> पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद चौथे दिन जो पतिव्रता स्त्री अपने शरीरको अग्निमें समर्पित कर देती है, उसका वृषोत्सर्गादि कर्म पतिकी क्रियाके ही दिन करना चाहिये। पुत्रिका पुत्रोत्पत्तिके पूर्व पतिके गोत्रवाली होती है। पुत्रोत्पत्तिके बाद वह पुनः पिताके गोत्रमें आ जाती है। पुत्रिका उस कन्याको कहते हैं, जिस कन्याका पिता विवाहके समय जामातासे यह तय कर लेता है कि इस कन्यासे जो पुत्र पैदा होगा वह मेरा पुत्र होगा। यदि स्त्री अपने पतिके साथ अग्निमें आरोहण करती है तो उसकी उसके पतिके साथ समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिये, किंतु क्षय-तिथिमें पुत्रको उसका श्राद्ध पृथक्-रूपमें करना चाहिये। यदि पति-पत्नी पुत्ररहित हैं और वे दोनों एक ही दिन मर जाते हैं तथा उनका दाह-संस्कार एक ही चितापर होता है तो उन दोनोंके श्राद्धोंको पृथक्-पृथक् करना चाहिये, किंतु पत्नीका सपिण्डीकरण पतिके साथ ही होगा। यदि पतिके साथ पत्नीका पिण्डदान पृथक्-पृथक् होता है तो उस पिण्डदानसे वह दम्पति पापलिप्त नहीं होता, यह मेरा सत्य वचन है। यदि पति-पत्नी दोनोंका एक ही चितापर दाह संस्कार होता है तो उन दोनोंके लिये पाक एक ही साथ बनाया जाय, किंतु पिण्डदान पृथक्-पृथक् होना चाहिये। एकादशाहको वृषोत्सर्ग, षोडश प्रेतश्राद्ध, घटादि-दान, पददान और जो महादान हैं उन्हें पति-पत्नीका वर्षपर्यन्त पृथक्-पृथक् ही करना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतको चिरकालीन संतुष्टि प्राप्त होती है।

एक गोत्रसे सम्बन्धित एक साथ मरे हुए स्त्री अथवा पुरुषसे सम्बद्ध-कृत्यमें आहुतिकी वेदी एक ही होनी चाहिये। किंतु होम पृथक्-पृथक् होना चाहिये। पति एवं पत्नीका एक साथ मरण होनेपर उनका एकादशाहका श्राद्ध एवं उनके निमित्त पिण्डदान, भोजन आदि पृथक्-पृथक् होगा, पर पाककी व्यवस्था एक ही होगी—यह विधान केवल पति-पत्नीके एक साथ मरणमें ही है अन्य किसीके मरणमें ऐसा विधान गर्हित है। पुत्र माता-पिताके लिये एक ही पाकसे यथाविधान


१-अन्नं पानीयसहितं संख्यां कृत्वाब्दिकस्य च। दातव्यं ब्राह्मणे पक्षिञ्जलपूर्णघटादिकम्॥
पिण्डान्ते तस्य सकला वर्षवृत्तिः स्वशक्तितः। दिव्यदेहो विमानस्थः सुखं याति यमालयम्॥ (२६। ३५-३६)
२-पिताके जीवित रहनेपर पुत्रके मर जानेसे पुत्रका सपिण्डीकरण पिताके साथ न करके पितामहके साथ करनेका विधान है। इसी प्रकार पतिके जीवित रहनेपर मृत पत्नीका पतिके साथ सपिण्डीकरण न करके उसके श्वश्रू, परश्वश्रू और वृद्ध परश्वश्रू (सास, परसास, वृद्धपरसास)-के साथ सपिण्डीकरण करना चाहिये। इसके समर्थनमें ये वाक्य द्रष्टव्य हैं—
अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम्। श्वश्वादिभिः सहैवास्याः सपिण्डीकरणं भवेत्॥ (पैठीनसि)
अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम्। श्वश्रूमात्रादिभिः सार्धमेव धर्मेण युज्यते॥ (व्यास)

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प्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४३


श्राद्ध करता है। विकिरान्नदान एक और पिण्डदान पृथक्-पृथक् करने चाहिये। इसी विधिका पालन तीर्थ, पितृपक्ष अथवा चन्द्र और सूर्य-ग्रहणके अवसरमें भी होना चाहिये।

जब स्त्री अपने मृत पतिके साथ अग्निमें जलती है तो अग्नि उसके शरीरको अवश्य जला देती है, किंतु आत्माको कष्ट नहीं दे पाती है, जिस प्रकार अग्निमें प्रज्वलित धातुओंका मात्र मल ही जलता है, उसी प्रकार अमृतके समान अग्निमें प्रविष्ट हुई नारीका शरीर दग्ध होता है। पुरुष शुद्ध होकर दिव्य देहधारी हो जाता है, जिसके कारण वह खौलते हुए तेल, दहकते हुए लौह तथा अग्निसे कदापि नहीं जलता, इसी प्रकार पतिके साथ चितामें जली हुई स्त्रीको कभी जला हुआ नहीं मानना चाहिये; क्योंकि उसकी अन्तरात्मा मरे हुए पतिकी अन्तरात्मासे मिलकर एक हो जाती है।

यदि स्त्री पतिका साथ छोड़ करके अन्यत्र अपने प्राणोंका परित्याग करती है तो वह पतिलोकमें तबतक नहीं पहुँच पाती, जबतक प्रलय नहीं हो जाता। धन-दौलतसे युक्त माता-पिताको छोड़कर जो स्त्री अपने मरे हुए पतिका अनुगमन करती है, वह चिरकालतक सुखोपभोग करती है। वह पतिसंयुक्ता नारी उस स्वर्गमें साढ़े तीन करोड़ दिव्य वर्षोंतक नक्षत्रोंके साथ स्वर्गमें रहकर अन्तमें महती प्रीति प्राप्त करके ऐश्वर्यसम्पन्न कुलमें उत्पन्न होती है।

धर्मपूर्वक विवाहिता जो स्त्री यदि पति-संगति नहीं करती है, तो जन्म-जन्मान्तरतक दुखी, दुःशीला और अप्रियवादिनी होती है। जो स्त्री अपने पतिको छोड़कर परपुरुषकी अनुगामिनी हो जाती है, वह अन्य जन्मोंमें चमगादड़ी, छिपकली, गोहनी अथवा द्विमुखी सर्पिणी होती है। अतः स्त्रीको मन-वाणी और कर्म—इन सभीके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपने मृत या जीवित पतिकी सेवा करनी चाहिये। पतिके जीवित रहते हुए अथवा उसके मरनेपर जो स्त्री व्यभिचार करती है, वह अनेक जन्मोंतक वैधव्य जीवन प्राप्त करती है और दुर्भाग्य उसका साथ नहीं छोड़ता। देवता और पितरोंको श्रद्धापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, उसका समग्र फल उसे पतिकी पूजा करनेसे ही प्राप्त हो जाता है, इसलिये स्त्रीको पतिकी ही पूजा करनी चाहिये।

हे पक्षिश्रेष्ठ! पातिव्रत्यधर्मरूप सत्कर्मका पालन करनेपर स्त्री चिरकालतक पतिलोकमें निवास करती है। जबतक सूर्य और चन्द्र विद्यमान हैं, तबतक वह स्वर्गमें देवतुल्य बनी रहती है। उसके बाद दीर्घायु प्राप्त करके इस लोकमें वैभवशाली कुलमें जन्म लेती है तथा कभी भी पति-वियोगका दुःख नहीं झेलती।

हे खगराज! मैंने यह सब तुम्हें बता दिया। अब मृत प्राणीको सुख प्रदान करनेवाले विशेष कर्मको बताऊँगा। मृत्युके बाद द्वादशाहके दिन यथाविधि सपिण्डनादि समस्त कार्य करके वर्षपर्यन्त प्रतिदिन जलपूर्ण घट और अन्नका दान एवं मासिक श्राद्ध करना चाहिये। हे पक्षिन्! प्रेतकार्यको छोड़कर अन्य किये हुए कार्यकी आवृत्ति नहीं होनी चाहिये।* यदि कोई मनुष्य अन्य कर्म करता है तो पूर्वका किया गया कार्य विनष्ट हो जाता है। मृतकके द्वादशाहके दिन विहित कृत्य वर्षपर्यन्त पुनः करने चाहिये, इससे प्रेत अक्षयसुख प्राप्त


* उत्तम षोडशी आदि जो प्रेतोद्देश्यक कार्य हैं सपिण्डनके बाद भी इनकी पुनरावृत्ति ऊनमासिक आदि श्राद्धके द्वारा वर्षपर्यन्त करना चाहिये। परंतु पितरोंके उद्देश्यसे किये गये कर्मकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिये—
द्वादशाहे कृतं सर्वं वर्षं यावत्सपिण्डनम्। पुनः कुर्यात्सदा नित्यं घटान्नं प्रतिमासिकम् ॥
कृतस्य करणं नास्ति प्रेतकार्यादृते खग। यः करोति नरः कश्चित्कृतपूर्वं विनश्यति ॥
मृतस्यैव पुनः कुर्यात्प्रेतोऽक्षय्यमवाप्नुयात्। प्रतिमासं घटा देया सोदना जलपूरिताः ॥
अर्वाक्च वृद्धेः करणाच्च तार्क्ष्य सपिण्डनं यः कुरुते हि पुत्रः। तथापि मासं प्रतिपिण्डमेकमन्नं च कुम्भं सजलं च दद्यात् ॥
(२६।६४–६७)

२४५- शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव, गर्भमें जीवका स्वरूप तथा उसकी वृद्धिका क्रम, शरीरके निर्माणमें पञ्चतत्त्वादिका अवदान, षाट्कौशिक शरीर, गर्भसे जीवके बाहर निकलनेपर विष्णुमायाद्वारा मोहित होना, आतुर व्यक्तिके लिये क्रियमाण कर्म तथा उनका फल, पिण्ड और ब्रह्माण्डकी समान स्थिति

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५४४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड—


करता है। प्रतिमास जलसे परिपूर्ण सान्नोदक घटका दान करना चाहिये। हे तार्क्ष्य! वृद्धिश्राद्धके कारण जो पुत्र अपने पिताका सपिण्डीकरण श्राद्ध कर देता है तो भी उसे प्रत्येक मासमें एक पिण्ड, अन्न और जलसे पूर्ण कुम्भका दान करना चाहिये।

तार्क्ष्यने कहा— हे विभो! आपने जिन प्रेतोंका वर्णन किया है, वे इस धरतीपर कैसे निवास करते हैं; उनके रूप किस प्रकारके होते हैं, वे कौन-कौन-से कर्म-फलोंके द्वारा महाप्रेत और पिशाच बन जाते हैं और किस शुभ दानसे प्राणीकी प्रेतयोनि छूट जाती है? हे मधुसूदन! समस्त जगत्‌के कल्याणार्थ मुझको यह सब बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे तार्क्ष्य! तुमने मानव-कल्याणके लिये बहुत अच्छी बात पूछी। प्रेतका लक्षण मैं कह रहा हूँ, उसे सावधान होकर सुनो। यह अत्यन्त गुप्त है। जिस-किसीके सामने इसको नहीं कहना चाहिये। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हारे सामने इसे कह रहा हूँ।

हे पुत्र गरुड! पुराने समयमें बभ्रुवाहन नामका एक राजा था, जो महोदय (कान्यकुब्ज) नामक सुन्दर नगरमें रहता था। वह धर्मनिष्ठ, महापराक्रमी, यज्ञपरायण, दानशील, लक्ष्मीवान्, ब्राह्मणहितकारी, साधुसम्मत, सुशील, सदाचारी तथा दया-दाक्षिण्यादि सद्गुणोंसे संयुत था। वह महाबली राजा सदैव अपनी प्रजाका पालन पुत्रवत् करता तथा क्षत्रिय-धर्मका सम्यक् पालन करते हुए सदैव अपराधियोंको दण्डित किया करता। कभी विशाल भुजाओंवाले उस राजाने अपनी सेनाके सहित शिकार करनेके लिये नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए सैकड़ों सिंहोंसे परिव्याप्त, विभिन्न प्रकारके पक्षियोंके कलरवसे निनादित एक घनघोर वनमें प्रवेश किया। वनके बीचमें जाकर राजाने दूरसे ही एक मृगको देखा और उसके ऊपर अपने बाणको छोड़ दिया। उसके द्वारा छोड़े गये उस कठिन बाणसे वह मृग अत्यन्त आहत हो उठा और शरीरमें बिंधे हुए उस बाणके सहित वह मृग वहाँसे भागकर वनमें लुप्त हो गया, किंतु उसकी काँखसे बह रहे रक्तके चिह्नोंसे राजाने उसका पीछा किया। इस प्रकार उसके पीछे-पीछे वह राजा दूसरे वनमें जा पहुँचा।

भूख और प्याससे उसका कण्ठ सूख रहा था तथा परिश्रम करनेके कारण अत्यन्त थकानका अनुभव करता हुआ वह मूर्च्छित-सा हो गया था; उसको वहाँ एक जलाशय दिखायी दिया। जलाशय देखकर घोड़ेके सहित उसने वहाँ स्नान किया और कमलपरागसे सुवासित शीतल जलका पान किया। तत्पश्चात् उस जलसे निकलकर राजा बभ्रुवाहन विशाल वटवृक्षकी मनमोहक शीतल छायाके नीचे बैठ गया, जो पक्षियोंके कलरवसे निनादित तथा उस समूचे वनकी पताकाके रूपमें अवस्थित था। इसके बाद उस राजाने वहाँपर भूख-प्याससे व्याकुल इन्द्रियोंवाले एक प्रेतको देखा, जिसके सिरकी केशराशि ऊपरकी ओर खड़ी थी। उसका शरीर मलिन, कुब्जा (रूक्ष), मांसरहित और देखनेमें महाभयंकर लगता था। मात्र शरीरमें शेष स्नायु-तन्त्रिकाओंसे जुड़ी हुई हड्डियोंवाला वह अपने पैरोंसे इधर-उधर दौड़ रहा था और अन्य बहुत-से प्रेत उसको चारों ओरसे घेरे हुए थे।

हे तार्क्ष्य! उस विकृत प्रेतको देखकर बभ्रुवाहन विस्मित हो गया और उस प्रेतको भी महाभयंकर वनमें आये हुए राजाको देखकर कम आश्चर्य नहीं हुआ। प्रसन्नचित्त होकर प्रेतने उस राजाके पास जाकर कहा—

प्रेतने कहा—हे महाबाहो! आज आपके दर्शनका यह संयोग प्राप्त कर मैंने प्रेतभावको त्यागकर परम गति प्राप्त कर ली है। मुझसे बढ़कर धन्य कोई नहीं है।

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प्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४५

राजाने कहा—हे प्रेत! तुम मुझे कृष्णवर्णवाले भयंकर प्रेतके समान दिखायी दे रहे हो। तुम्हें इस प्रकारका स्वरूप जैसे प्राप्त हुआ है वैसा मुझे बताओ।

राजाके ऐसा कहनेपर उस प्रेतने अपने सम्पूर्ण जीवनवृत्तको इस प्रकार कहा—

प्रेतने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं अपने सम्पूर्ण जीवन-वृत्तका विवरण आपको आदिसे सुना रहा हूँ, मेरे इस प्रेतत्वका कारण सुन करके आप दया अवश्य करेंगे। हे राजन्! नाना रत्नोंसे युक्त तथा अनेक जनपदोंमें व्याप्त समस्त सम्पदाओंसे भरा हुआ, विभिन्न पुण्योंसे प्रख्यात अनेकानेक वृक्षोंसे आच्छादित विदिशा नामका एक नगर है। मैं वहींपर निरन्तर देवपूजामें अनुरक्त रहकर निवास करता था। उस जन्ममें मेरी जाति वैश्यकी थी और नाम मेरा सुदेव था। मैं उस जन्ममें हव्यसे देवताओंको, कव्यसे पितरोंको तथा नाना प्रकारके दानसे ब्राह्मणोंको सदैव तृप्त किया करता था। मेरे द्वारा दीन-हीन, अनाथ और विशिष्ट जनोंकी अनेक प्रकारसे सहायता की गयी थी, किंतु दुर्भाग्यवश वह सब कुछ मेरा निष्फल हो गया। मेरे वे पुण्य जिस प्रकारसे विफल हुए, मैं आपको वह सुनाता हूँ।

हे तात! पूर्वजन्ममें न मेरे कोई संतान हुई, न कोई ऐसा बन्धु-बान्धव या मित्र ही रहा जो मेरी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करता। हे नृपोत्तम! उसीके कारण मुझे यह प्रेतयोनि प्राप्त हुई है। हे राजन्! एकादशाह, त्रिपक्ष, षाण्मासिक, सांवत्सरिक, प्रतिमासिक और इसी प्रकारके अन्य जो षोडश श्राद्ध हैं, वे जिस प्रेतके लिये सम्पन्न नहीं किये जाते हैं, उस प्रेतकी प्रेतयोनि बादमें स्थिरताको प्राप्त कर लेती है, भले ही बादमें क्यों न उसके लिये सैकड़ों श्राद्ध किये जायें। हे महाराज! ऐसा जानकर आप मेरा इस प्रेतयोनिसे उद्धार करें। राजाको सभी वर्णोंका बन्धु कहा जाता है। मैं आपको एक मणिरत्न दे रहा हूँ। हे राजेन्द्र! इस नरकसे मुझे उबार लें। हे नृपश्रेष्ठ! हे महाबाहो! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो जिस प्रकारसे मुझे शुभ गति प्राप्त हो मेरे लिये वही उपाय करें और आप अपना भी समस्त प्रकारसे और्ध्वदैहिक कार्य करें।

राजाने कहा—हे प्रेत! और्ध्वदैहिक कर्म करनेपर भी प्राणी कैसे प्रेत हो जाते हैं? किन कर्मोंको करनेसे उन्हें पिशाच होना पड़ता है? तुम उसे भी बताओ।

प्रेतने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! जो लोग देवद्रव्य, ब्राह्मण-द्रव्य और स्त्री एवं बालकोंके संचित धनका अपहरण करते हैं, वे प्रेतयोनि प्राप्त करते हैं। जिनके द्वारा तपस्विनी, सगोत्रा एवं अगम्या स्त्रीका भोग किया जाता है, जो कमलपुष्पोंकी चोरी करते हैं, वे महाप्रेत होते हैं। हे राजन्! जो हीरा-मूँगा-सोना और वस्त्रके अपहर्ता हैं, जो युद्धमें पीठ दिखाते हैं, जो कृतघ्न, नास्तिक, क्रूर तथा दुःसाहसी हैं, जो पञ्चयज्ञ नहीं करते, किंतु बहुत बड़े-बड़े दान देनेमें अनुरक्त रहते हैं, जो अपने स्वामीसे वैर करते हैं, जो मित्र और ब्राह्मणद्रोही हैं, जो तीर्थमें जाकर पापकर्म करते हैं, वे प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। हे महाराज! इस प्रकार इन सभी प्राणियोंका जन्म प्रेतयोनिमें होता है।

राजाने कहा—हे प्रेतराज! इस प्रेतत्वसे तुम्हें और तुम्हारे साथियोंको कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है? मैं किस प्रकारसे अपना और्ध्वदैहिक कर्म कर सकता हूँ? वह कार्य किस विधानसे सम्भव है? यह सब कुछ मुझे बताओ।

प्रेतने कहा—हे राजेन्द्र! संक्षेपमें नारायणबलिकी विधि सुनें। मैंने सुना है कि सद्ग्रन्थोंका श्रवण, विष्णुका पूजन तथा सज्जनोंका साथ प्रेतयोनिको विनष्ट करनेमें समर्थ होता है। अतः मैं आपको प्रेतत्वभावको नष्ट करनेवाली विष्णुपूजाका विधान बताऊँगा।

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५४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हे राजन् ! दो सुवर्ण* ले करके उससे भगवान् नारायणकी सभी आभूषणोंसे विभूषित प्रतिमाका निर्माण करवाना चाहिये। मूर्तिको दो पीले वस्त्रोंसे आच्छादित करके चन्दन तथा अगुरुसे सुवासित करे। तदनन्तर नाना तीर्थोंसे लाये गये पवित्र जलके द्वारा सविधि स्नान कराकर तथा अधिवासितकर पूर्वमें भगवान् श्रीधर, दक्षिणमें भगवान् मधुसूदन, पश्चिममें भगवान् वामन, उत्तरमें भगवान् गदाधर, मध्यभागमें पितामह ब्रह्मा और भगवान् महेश्वरकी विधिवत् पूजा गन्ध-पुष्पादिसे पृथक्-पृथक् रूपमें की जाय। तत्पश्चात् उस देवमण्डलकी प्रदक्षिणा करके अग्निमें देवताओंकी संतुष्टिके लिये आहुति दे। घृत, दही और दूधसे विश्वेदेवोंको संतृप्त करे। उसके बाद यजमान फिरसे स्नान करके विनम्रतापूर्वक एकाग्रचित्तसे भगवान् नारायणके सामने विधिवत् अपनी और्ध्वदेहिक क्रिया सम्पन्न करे। विनीतभावसे क्रोध एवं लोभरहित होकर कार्य आरम्भ करना चाहिये। इस अवसरपर सभी श्राद्ध और वृषोत्सर्ग करने चाहिये। तेरह ब्राह्मणोंको वस्त्र, छत्र, जूता, मुक्तामणिजटित अँगूठी, पात्र, आसन और भोजन देकर संतुष्ट करे। उसके बाद प्रेतकल्याणके लिये अन्न और जलपूर्ण कुम्भका दान देना चाहिये। शय्यादान करके घटदान भी प्रेतके उद्देश्यसे करे। तदनन्तर 'नारायण' नाम ही सत्य है—ऐसा कहकर सम्पुटमें स्थित भगवान् नारायणकी पूजा करे। ऐसा विधिवत् करनेपर निश्चित ही प्राणीको शुभ फल प्राप्त होता है।

राजाने कहा— हे प्रेत ! प्रेतघट कैसा होना चाहिये, उसको प्रदान करनेका क्या विधान है? सभी प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये तुम प्रेतके लिये मुक्तिदायक घटके विषयमें मुझे बताओ।

प्रेतने कहा— हे महाराज ! आपने बड़ा अच्छा प्रश्न किया है। जिस दानसे प्रेतत्व प्राप्त नहीं होता, उसे मैं कहता हूँ, सुनें।

प्रेतघट नामका दान समस्त अमङ्गलोंका विनाशक है। दुर्गतिको क्षय करनेवाला यह प्रेतघटका दान सभी लोकोंमें दुर्लभ है। संतस स्वर्णमय घट बनवाकर उसे घृत और दूधसे परिपूर्ण करके लोकपालोंसहित ब्रह्मा, शिव और केशवको भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्राह्मणको दानमें दे। अन्य सैकड़ों दान देनेसे क्या लाभ ? इसके मध्यभागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा पूर्वादिक सभी दिशाओंमें और कण्ठभागमें यथाक्रम लोकपालोंकी विधिवत् पुष्प, धूप एवं चन्दनादिसे पूजा करके उसे दूध और घीसे पूर्ण स्वर्णमय घट दानमें देना चाहिये। यह सभी दानोंसे बढ़कर दान है। इस दानसे सभी महापातकोंका विनाश हो जाता है। प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये श्रद्धापूर्वक यह दान अवश्य करना चाहिये।

श्रीभगवान्ने कहा— हे वैनतेय ! उस प्रेतके साथ इस प्रकारका वार्तालाप राजाका चल ही रहा था कि उसी समय उनके पदचिह्नोंका अनुगमन करती हुई हाथी, घोड़े तथा रथसे परिव्यास उनकी सेना वहाँ आ पहुँची। सेनाके वहाँ आ जानेपर प्रेतने राजाको एक महामणि देकर प्रणाम किया और अपने प्रेतत्व-विमुक्तिकी प्रार्थना करके अदृश्य हो गया। उस वनसे निकलकर राजा भी अपने नगरको चला गया। हे पक्षिन् ! नगरमें पहुँचकर राजाने उस प्रेतके द्वारा कही गयी सम्पूर्ण और्ध्वदेहिक क्रियाको विधि-विधानसे सम्पन्न किया। उसके पुण्यसे वह प्रेत बन्धन-विमुक्त होकर स्वर्ग चला गया।

हे गरुड ! पुत्रके द्वारा दिये गये श्राद्धसे पिताको सद्गति प्राप्त होती है, इसमें आश्चर्य क्या है? जो मनुष्य इस पुण्यदायक इतिहासको सुनता है और जो सुनाता है, वह पापाचारसे युक्त होनेपर भी प्रेतत्व-योनिको प्राप्त नहीं होता है। (अध्याय २६-२७)


* सुवर्णमाष।

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प्रेतकल्प ] दानधर्मकी महिमा, आतुरकालके दानका वैशिष्ट्य ५४७

प्रेतत्वमुक्तिके उपाय

गरुडजीने कहा—हे मधुसूदन! जिस दान या सत्कर्मसे प्राणीकी प्रेतयोनि छूट जाती है, उसे बतानेकी कृपा करें, इसके ज्ञानसे लोगोंका बड़ा कल्याण होगा।

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! सुनो! मैं तुम्हें समस्त अमङ्गलोंको विनष्ट करनेवाले दानको बता रहा हूँ। शुद्ध स्वर्णका घट बनाकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा लोकपालोंसहित उसकी पूजाकर दुग्ध और घृतसे परिपूर्ण उस घटको सुपात्र ब्राह्मणको दानमें देनेसे प्रेतत्वसे मुक्ति मिल जाती है।

हे गरुड! पुत्रहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती, अतः यथाविधान पुत्र उत्पन्न करना चाहिये। मृत व्यक्तिको गोबरसे लीपी गयी मण्डलाकार भूमिमें स्थापित करना चाहिये। भूमि गोबरसे लीपनेपर पवित्र हो जाती है तथा मण्डलका निर्माण करनेसे उस स्थानपर देवताओंका वास हो जाता है। ऐसे ही मृत व्यक्तिके नीचे तिल और कुश बिछानेसे जीवको उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है, साथ ही मृत व्यक्तिके मुँहमें पञ्चरत्न डालनेसे जीवको शुभ गति मिलती है।

हे तार्क्ष्य! तिल मेरे पसीनेसे उत्पन्न हैं, इसलिये वे सदा पवित्र हैं—‘मम स्वेदसमुद्भूतास्तिलास्तार्क्ष्य पवित्रकाः।’ (२९। १५)। इसी प्रकार कुशकी उत्पत्ति मेरे रोमसे हुई है ‘दर्भा मल्लोमसम्भूताः (२९। १७)। कुशयुक्त भूमि अपने ऊपर विद्यमान मृत जीवको निःसंदेह स्वर्ग पहुँचा देती है। कुशमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—ये तीनों देव प्रतिष्ठित रहते हैं—‘त्रयो देवाः कुशे स्थिताः।’ हे पक्षिराज! ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि तथा तुलसी—ये बार-बार प्रयोगमें लाये जानेपर भी पर्युषित (बासी) नहीं होते—

विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर।
नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः॥
(२९।२१)

इसी तरह विष्णु, एकादशीव्रत, भगवद्गीता, तुलसी, ब्राह्मण तथा गौ—ये छः इस संसारसागरसे मुक्ति दिलानेवाले हैं;—

विष्णुरेकादशीगीतातुलसीविप्रधेनवः ।
अपारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी॥
(२९।२४)

इसीलिये हे गरुड! तिल, कुश और तुलसी—ये आतुर व्यक्तिकी दुर्गति को रोककर उसे सद्गति दिलाते हैं। आतुर-कालमें दानकी भी विशेष महिमा है। भगवान् विष्णुकी देहसे लवणका प्रादुर्भाव हुआ है, अतः आतुर-कालमें लवण-दान करनेसे भी जीवकी दुर्गति नहीं होती।* (अध्याय २८-२९)


दानधर्मकी महिमा, आतुरकालके दानका वैशिष्ट्य, वैतरणी-गोदानकी महिमा

श्रीकृष्णने कहा—हे तार्क्ष्य! देवताओंके लिये परम गोपनीय दानोंमें उत्तम और सभी दानोंमें श्रेष्ठ दानको सुनो—

हे गरुड! रूईका दान सभी दानोंमें उत्तम तथा महान् है। उसका दान मनुष्यको अवश्य करना चाहिये, उसके दानसे भूः, भुवः, स्वः अर्थात् पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—ये तीनों लोक प्रसन्न हो उठते हैं। इस कार्यसे ब्रह्मा आदि सभी देवोंको


* २८वें तथा २९वें अध्यायका विषय प्रथम तथा द्वितीय अध्यायमें पूर्णरूपसे आ गया है, इसलिये इसे यहाँ संक्षिप्त रूपमें दिया गया है। पूर्ण विवरण प्रथम तथा द्वितीय अध्यायमें देखना चाहिये।

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५४८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

प्रसन्नता होती है। प्रेतका उद्धार करनेके लिये इस महादानको करना चाहिये। ऐसे महादानका दाता चिरकालतक रुद्रलोकमें रहता है, तदनन्तर इस लोकमें जन्म लेकर रूपसम्पन्न, सौभाग्यशाली, वाक्चतुर, लक्ष्मीवान् और अप्रतिहत-पराक्रमी राजा होता है। अपने सुकृतोंसे यमलोकको जीतकर वह स्वर्गलोकमें जाता है। जो प्राणी ब्राह्मणको गौ, तिल, भूमि तथा स्वर्णका दान देता है, उसके जन्म-जन्मार्जित सभी पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं। तिल और गौका दान महादान है, इसमें महापापोंको नाश करनेकी शक्ति होती है। ये दोनों दान केवल विप्रको देने चाहिये, अन्य वर्णोंको नहीं। दानके रूपमें संकल्पित तिल, गौ तथा पृथ्वी आदि द्रव्य, अपने पोष्य-वर्ग एवं ब्राह्मणेतर वर्णको न दे। पोष्यवर्ग और स्त्री-जातिको असंकल्पित वस्तु दानमें देनी चाहिये। रुग्णावस्थामें अथवा सूर्य एवं चन्द्रग्रहणके अवसरपर दिये गये दान विशेष महत्त्व रखते हैं। रोगीके लिये जो दान दिया जाता है, वह उसके लिये तत्काल यथोचित फल देनेवाला होता है। यदि रोगी दान देनेके बाद रोगमुक्त होकर पुनः जीवन प्राप्त कर लेता है तो उसके निमित्त दिया गया दान निश्चित ही उसे प्राप्त होता है। विकलेन्द्रियकी विकलांगताको नष्ट करनेके लिये जो दान दिया जाता है वह दान भी अवश्य ही यथायोग्य फलदायक होता है। जिस दानका पुत्र अनुमोदन करता है, उस दानका फल अनन्त होता है। अतः उसके सगे-सम्बन्धी अथवा पुत्रको तबतक दान देना चाहिये, जबतक उसका आतुर सम्बन्धी या पिता जीवित हो; क्योंकि अतिवाहिक प्रेत उसका भोग करता है।

अस्वस्थ-अवस्थामें—आतुरकालमें देहपात हो जानेपर पृथ्वीपर पड़े रहनेकी स्थितिमें दिया गया दान अतिवाहिक शरीरके लिये प्रीतिकारक होता है। लँगड़े, अंधे, काने और अर्धनिमीलित नेत्रवाले रोगीके लिये तिलके ऊपर कुश बिछाकर उसके ऊपर आतुरको लिटाकर दिया गया दान उत्तम और अक्षय होता है।

तिल, लौह, स्वर्ण, रुई, नमक, सप्तधान्य, भूमि तथा गौ—ये एकसे बढ़कर एक पवित्र माने गये हैं। लौह-दानसे यमराज और तिल-दानसे धर्मराज संतुष्ट होते हैं। नमकका दान करनेपर प्राणीको यमराजसे भय नहीं रह जाता। रुईका दान देनेपर भूतयोनिसे भय नहीं रहता। दानमें दी गयी गायें मनुष्यको त्रिविध पापोंसे निर्मुक्त करती हैं। स्वर्ण-दानसे दाताको स्वर्गका सुख प्राप्त होता है। भूमि-दानसे दाता राजा होता है। स्वर्ण और भूमि—इन दोनोंका दान देनेसे प्राणीको नरकमें किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं होती। यमलोकमें जितने भी यमराजके दूत हैं, वे सभी उसी यमके समान ही महाभयंकर हैं। सप्तधान्यका दान देनेसे वे प्रसन्न होकर दानदाताओंके लिये वरदाता बन जाते हैं।

हे गरुड! भगवान् विष्णुका स्मरणमात्र करनेसे प्राणीको परम गति प्राप्त होती है। मनुष्य जो गति प्राप्त करता है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। पिताकी आज्ञासे जो पुत्र दान देता है, उसकी सभी प्रशंसा करते हैं। भूमिपर सुलाये गये मरणासन्न पिताके उद्देश्यसे जो पुत्र सभी प्रकारका दान देता है, वह पुत्र कुलनन्दन है। उसके द्वारा दिया गया दान गया-तीर्थमें किये गये श्राद्धसे भी बढ़कर है। वह पुत्र अपने कुलको आनन्दित करनेवाला होता है। जिस समय अपने लोकको छोड़कर बेचैन पिताकी परलोक-यात्राका काल समीप हो, उस समय पुत्रोंको प्रयत्नपूर्वक दान देना चाहिये; क्योंकि वे ही दान पिताको पार करते हैं। पुत्रको पिताकी अन्त्येष्टि-क्रिया अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये।

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प्रेतकल्प ] दानधर्मकी महिमा, आतुरकालके दानका वैशिष्ट्य ५४१


इतना करनेमात्रसे अन्य सभी बहुविध दानोंका फल प्राप्त हो जाता है; क्योंकि अश्वमेध-जैसा महायज्ञ भी इस पुण्यके सोलहवें अंशकी क्षमता नहीं रखता। पृथ्वीपर पड़े हुए आतुर पितासे जो धर्मात्मा पुत्र दान दिलाता है, उसकी पूजा देवता भी करते हैं।

लौहका दान करनेवाला दाता महाभयानक आकृतिवाले यमराजके निकट न तो जाता है और न तो नारकीय लोकको ही प्राप्त करता है। पापियोंको भयभीत करनेके लिये यमराजके हाथोंमें कुठार, मूसल, दण्ड, खड्ग और छुरिका रहती है; इसलिये प्राणीको चाहिये कि वह ब्राह्मणको लौह-दान दे। यह दान यमराजके आयुधोंकी संतुष्टिके लिये कहा गया है। गर्भस्थ प्राणी, शिशु, युवा और वृद्ध—ये जो भी हैं, इन दानोंसे अपने समस्त पापोंको जला देते हैं। श्याम एवं शबल वर्णके षण्ड तथा मर्क और गूलरके सदृश मांसल, हाथमें छूरी धारण करनेवाले, काले-चितकबरे यमके दूत लौह-दानसे प्रसन्न होते हैं। यदि पुत्र-पौत्र, बन्धु-बान्धव, सगोत्री और मित्र अपने रोगीके लिये दान नहीं देते तो वे ब्रह्महन्ताके समान ही पापी हैं।

हे पक्षीन्द्र! भूमिपर स्थित प्राणीकी मृत्यु हो जानेपर उसकी क्या गति होती है, इसे सुनो! अतिवाहिक शरीरवाला प्रेत वर्ष समाप्त होनेके पश्चात् पुनः पुण्यका लाभ प्राप्त करता है। इस संसारमें तीन अग्नि, तीन लोक, तीन वेद, तीन देवता, तीन काल, तीन संधियाँ, तीन वर्ण तथा तीन शक्तियाँ मानी गयी हैं। मनुष्यके शरीरमें पैरसे ऊपर कटिप्रान्ततक ब्रह्मा निवास करते हैं। नाभिसे लेकर ग्रीवा-भागतक हरिका वास रहता है और उसके ऊपर मुखसे लेकर मस्तकतक व्यक्त तथा अव्यक्त-स्वरूपवाले महादेव शिवका निवास है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इनका शरीरमें तीन भागोंमें अवस्थान है।

मैं ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्जके शरीरोंमें प्राणरूपसे स्थित रहता हूँ। धर्म-अधर्म, सुख-दुःख तथा कृत-अकृतमें बुद्धिको मैं ही प्रेरित करता हूँ। मैं ही स्वयं प्राणीकी बुद्धिमें बैठकर पूर्व-कर्मके अनुसार उसको फल प्रदान करता हूँ। प्राणियोंको मैं ही कर्ममें प्रेरित करता हूँ। उसीके अनुसार प्राणी निश्चित ही स्वर्ग, नरक और मोक्ष प्राप्त करता है। स्वर्ग अथवा नरकमें गये हुए प्राणीकी तृप्ति श्राद्धके द्वारा होती है, इसलिये विद्वान् व्यक्तिको तीनों प्रकारका श्राद्ध करना चाहिये। मत्स्य, कूर्म, वराह, नारसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि—ये दस नाम सदैव मनीषियोंके लिये स्मरण करने योग्य हैं। इनका स्मरण करनेसे स्वर्गमें गये हुए प्राणी सुखका भोग करते हैं और स्वर्गसे पुनः इस लोकमें आनेपर सुख और धन-धान्यसे पूर्ण होकर दया-दाक्षिण्य आदि सद्गुणोंसे भरे रहते हैं, वे पुत्र-पौत्रसे युक्त और धनाढ्य होकर सौ वर्षतक जीते हैं। रोगग्रस्त होनेपर मनुष्यके लिये दान देना चाहिये और भगवान् विष्णुकी पूजा करनी या करानी चाहिये। उस समय उसे अष्टाक्षर अथवा द्वादशाक्षर-महामन्त्रका जप करना चाहिये।

श्वेत पुष्पसे, घीमें पकाये गये नैवेद्यसे, गन्ध-धूपसे भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये तथा श्रुतियों और स्मृतियोंमें अभिवर्णित स्तुतियोंसे भगवान् विष्णुकी स्तुति इस प्रकार करनी चाहिये—'विष्णु ही माता हैं, विष्णु ही पिता हैं, विष्णु ही अपने स्वजन और बान्धव हैं। जहाँपर मैं विष्णुको नहीं देखता हूँ, वहाँ निवास करनेसे मुझे क्या लाभ? विष्णु जलमें हैं, विष्णु स्थलमें हैं, विष्णु पर्वतकी चोटीपर हैं और विष्णु चारों ओरसे मालारूपमें घिरी हुई ज्वालामालासे व्याप्त स्थानमें अवस्थित हैं। यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय है'—

२४६- यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन तथा चित्रगुप्तके भवनका वर्णन, यमदूतोंद्वारा पापियोंको पीड़ित करना

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५५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

विष्णुर्माता पिता विष्णुर्विष्णुः स्वजनबान्धवाः।
यत्र विष्णुं न पश्यामि तत्र वासेन किं मम॥
जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके।
ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्॥
(३०।४१-४२)

ब्राह्मण, जल, पृथ्वी आदि जितने भी पदार्थ हैं, उन्हें अपना ही स्वरूप समझना चाहिये। इसलिये हे खगेश! किसी भी स्थानपर मनुष्य पूर्वजन्मार्जित पाप-पुण्यके अनुसार जिस कर्मको करता है, उसका फलदाता मैं ही हूँ। मैं ही प्राणीकी बुद्धिको धर्ममें नियुक्त करता हूँ और मुक्ति मैं ही देता हूँ।

हे तार्क्ष्य! अन्त-समय आनेपर मनुष्योंका हित करनेवाली वैतरणी नदी मानी गयी है। उसीके जलसे अपने पाप-समूहको धोकर प्राणी विष्णुलोकको जाता है। बाल्यावस्थाका जो पाप है, कुमारावस्थामें जो पाप हुआ है, यौवनावस्थाका जो पाप है और जन्म-जन्मान्तरमें समस्त अवस्थाओंके बीच भी जो पाप किया गया है, रात्रि-प्रातः, मध्याह्न-अपराह्न तथा दोनों संध्याओंके मध्य मन, वाणी और कर्मसे जो पाप हुआ है, उन सभी पापोंके समूहसे प्राणी अपना उद्धार अन्तिम क्षणमें सर्वकामनाओंको सिद्ध करनेवाली एक भी श्रेष्ठतमा कपिला गौका दान दे करके कर सकता है। [गोदान करते समय परमात्मासे ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—परमात्मन्!] 'गायें ही मेरे आगे रहें, गायें ही मेरे पीछे और पार्श्वभागमें रहें, गायें ही मेरे हृदयमें निवास करें, मैं गायोंके बीचमें ही रहूँ। जो सभी प्राणियोंकी लक्ष्मीस्वरूपा हैं, जो देवताओंमें प्रतिष्ठित हैं, वे गौरूपिणी देवी मेरे सभी पापोंको विनष्ट करें—

गावो ममाग्रतः सन्तु पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवे व्यवस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥
(३०।५२-५३)
(अध्याय ३०)


और्ध्वदैहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त देहके स्वरूपका वर्णन

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! जो मनुष्य पापाचारमें लगे हुए हैं, वे यमलोकको जाते हैं। यदि मुझको साक्षी बनाकर मनुष्यके द्वारा दान दिया जाता है, तो वह अनन्त फलदायी होता है। भूमिदान देनेवाला प्राणी दानमें दी गयी भूमिके रजकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। जो जूतेका दान देते हैं, घोर यममार्गमें वे घोड़ेपर सवार होकर चलते हैं। छत्रदान करनेसे प्रेत यमलोकमें कहींपर भी धूपसे नहीं जलते, वे सुखपूर्वक अपने पथमें चलते चले जाते हैं। जिसके उद्देश्यसे मनुष्य जो अन्न-दान देता है, उससे वह संतृप्त हो जाता है। यमलोकके महापथमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ घनघोर अन्धकार है, वहाँ कुछ भी दिखायी नहीं देता, किंतु दीपदान देनेसे मनुष्य उस मार्गमें प्रकाशसे युक्त प्राणीके समान जाते हैं। आश्विन, कार्तिक तथा माघमास, मृत-तिथि और चतुर्दशी तिथिमें दिया गया दान सुखकारक होता है। जबतक वर्ष न पूरा हो जाय, तबतक प्रतिदिन प्रेतको ऊबड़-खाबड़ मार्गमें सुखपूर्वक गमन करानेकी इच्छासे लोगोंको दीपदान करना चाहिये। जो मनुष्य दीपदान करता है, वह स्वयं प्रकाशमय होकर संसारका

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प्रेतकल्प ] और्ध्वदेहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल ५५१


पूज्य हो जाता है। वह शुद्धात्मा अपने कुलमें द्योतित होता है और प्रकाशस्वरूपको प्राप्त करता है।

हे खगेश! देवालयमें पूर्वाभिमुख, ब्राह्मणके लिये उत्तराभिमुख तथा प्रेतके निमित्त दक्षिणाभिमुख होकर सुस्थिर दीपकका दान जलसे संकल्पपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें जो सभी प्रकारके उपहारोंसे युक्त तेरह पददान मृत व्यक्तिके लिये तथा जीवित दशामें अपने लिये करता है, वह महान् कष्टोंसे मुक्त होकर महापथकी यात्रा करता है। आसन, पात्र और भोजन जो ब्राह्मणको देता है, वह उसीके पुण्यसे सुखपूर्वक खाता-पीता हुआ महापथको पार करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्यासा प्रेत जल प्राप्त करता है। प्रेतका उद्धार करनेके लिये एकादशाहको पात्र, वस्त्र, पुष्प तथा अँगूठीका दान देना चाहिये। इसी प्रकार प्रेतका शुभेच्छु बनकर जो पुत्र यथाशक्ति तेरह पदोंका दान करता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। भोजन, तिल, जलपूर्ण तेरह घट, अँगूठी तथा उत्तरीय एवं अधोवस्त्रका जो दान देता है, उस दानके पुण्यसे प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है।

जो अश्व, नौका अथवा हाथीका दान ब्राह्मणको देता है वह उसी देय वस्तुकी महिमाके अनुसार उन-उन सुखोंको प्राप्त करता है। जो मनुष्य भैंसका दान देता है, वह नाना प्रकारके लोकोंमें विचरण करता है। यमदूतोंके हर्षवर्धनके लिये ताम्बूल और पुष्पका दान देना चाहिये, इससे संतुष्ट होकर वे दूत उस प्रेतको कष्ट नहीं देते।

प्राणीको यथाशक्ति गौ, भूमि, तिल तथा स्वर्णका दान अवश्य करना चाहिये, ऐसा मनीषियोंने कहा है। जो व्यक्ति मृत प्राणीके लिये जलसे परिपूर्ण मिट्टीका पात्र दान करता है, उसे हजार जलपूर्ण पात्रके दानका फल प्राप्त होता है। यमराजके दूत महाक्रोधी, महाभयंकर आकृतिवाले, काले तथा पीले वर्णके हैं; वे वस्त्र-दान किये जानेपर मृत प्राणीको यमलोकमें कष्ट नहीं देते। तृषा और श्रमसे पीड़ित होकर महापथमें आगे बढ़ता हुआ प्रेत अन्न और जलसे पूर्ण घटका दान देनेसे निश्चित ही सुखी हो जाता है। दक्षिणा, अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र तथा विष्णुकी स्वर्ण-प्रतिमासे युक्त शय्याका दान भी ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतयोनिका परित्यागकर प्राणी स्वर्गमें देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निवास करता है।

हे तार्क्ष्य! यह अन्त्येष्टि-कर्ममें होनेवाला दान मैंने तुमसे कहा। मृत प्राणी अन्य शरीरमें कैसे प्रवेश करता है, अब मैं उसको कहूँगा।

‘हे परंतप! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीकी मृत्यु निश्चित है, इसलिये अपने-अपने धर्मके अनुसार मृत व्यक्तिका श्राद्धादिक कृत्य करना चाहिये। हे खगेश्वर! मरे हुए प्राणियोंके मुखमण्डलसे पहले जीवात्मा वायुका सूक्ष्म रूप धारण करके निकल जाता है। लोगोंके नेत्र आदि नौ द्वार, रोम तथा तालुरन्ध्रसे भी जीवात्मा बाहर हो जाता है; किंतु जो पापी हैं उनका जीवात्मा अपान-मार्गसे शरीर छोड़ता है’—

जातस्य मृत्युलोके वै प्राणिनो मरणं ध्रुवम्।
मृतिः कुर्यात् स्वधर्मेण यास्यतश्च परंतप॥
पूर्वकाले मृतानां च प्राणिनां च खगेश्वर।
सूक्ष्मो भूत्वा त्वसौ वायुर्निर्गच्छत्यास्यमण्डलात्॥
नवद्वारै रोमभिश्च जनानां तालुरन्ध्रके।
पापिष्ठानामपानेन जीवो निष्क्रामति ध्रुवम्॥
(३१। २५-२७)

प्राणवायुके निकल जानेपर शरीर पृथ्वीपर वैसे ही गिर पड़ता है, जैसे वायुके थपेड़ोंसे आहत होकर निराधार वृक्ष भूमिपर गिर पड़ता है। मृत्युके बाद शरीरमें स्थित पृथ्वीतत्त्व पृथ्वीमें, जलतत्त्व

महिमा एवं सपिण्डीकरण-श्राद्धका स्वरूप

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५५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जलमें, तेजस्तत्त्व तेजमें, वायुतत्त्व वायुमें, आकाशतत्त्व आकाशमें तथा सर्वव्यापी आत्मतत्त्व शिवमें लीन हो जाता है।

हे तार्क्ष्य ! काम-क्रोध तथा पञ्चेन्द्रियोंका समूह शरीरमें चोरके समान स्थित कहा गया है। देहमें काम-क्रोध तथा अहंकारसहित मन भी रहता है, वही सबका नायक है। पुण्य-पापसे संयुक्त होकर काल उसका संहारक बन जाता है। संसारमें भोगके लिये योग्य शरीरका निर्माण अपने कर्मके अनुसार होता है। मनुष्य अपने सत्कर्म और दुष्कर्मसे दूसरे शरीरमें प्रविष्ट होता है। जिस प्रकार पुराने घरके जल जानेपर गृही नये घरमें जाकर शरण लेता है, उसी प्रकार यह जीव भी विषयोंके साथ पञ्चेन्द्रियोंसे युक्त नौ द्वारवाले एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें आश्रय ग्रहण करता है। शरीरमें विद्यमान धातुएँ माता-पितासे ही प्राप्त हैं, इन्हींसे निर्मित यह शरीर षाट्कौशिक* कहलाता है। हे गरुड ! शरीरमें सभी प्रकारके वायु रहते हैं, मूत्र-पुरीष तथा उन्हींके योगसे उत्पन्न अन्यान्य व्याधियाँ रहती हैं। अस्थि, शुक्र तथा स्नायु शरीरके साथ ही जल जाते हैं।

हे पक्षिन् ! सभी प्राणियोंके शरीरका विनाशक्रम यही है, इसे मैंने कह दिया। प्राणियोंका शरीर कैसा होता है, उसको अब मैं फिरसे कह रहा हूँ।

हे गरुड ! पुरुषका शरीर छोटी-बड़ी नसोंसे बँधा हुआ एक स्तम्भ है, जिसको नीचेसे पैररूपी दो अन्य स्तम्भ धारण किये हैं। पञ्चेन्द्रियोंसहित उसमें नौ द्वार हैं। सांसारिक विषयोंसे युक्त एवं काम-क्रोधसे बेचैन जीव इसी शरीरमें रहता है। राग-द्वेषसे व्याप्त यह शरीर तृष्णाका दुस्तर दुर्ग है। नाना प्रकारके लोभोंसे भरे हुए जीवका यह शरीर पुर है। यही स्थिति सभी शरीरोंकी है। इसी शरीरमें सभी देवता और चौदहों लोक स्थित हैं। जो लोग अपनेको नहीं पहचानते, वे पशुके समान माने गये हैं।

हे पक्षिराज ! इस प्रकार ऊपर बतायी गयी प्रक्रियासे निर्मित शरीरका वर्णन मैंने किया। सृष्टिमें चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं, जो उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज—इन चार मुख्य भागोंमें विभक्त हैं। (अध्याय ३१)


शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव, गर्भमें जीवका स्वरूप तथा उसकी वृद्धिका क्रम, शरीरके निर्माणमें पञ्चतत्त्वादिका अवदान, षाट्कौशिक शरीर, गर्भसे जीवके बाहर निकलनेपर विष्णुमायाद्वारा मोहित होना, आतुर व्यक्तिके लिये क्रियमाण कर्म तथा उनका फल, पिण्ड और ब्रह्माण्डकी समान स्थिति

तार्क्ष्यने कहा— हे प्रभो ! उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज—ये चार प्रकारके प्राणी किस प्रकार उत्पन्न होते हैं? त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा और अस्थिमें जीव कैसे आता है? दो पैर, दो हाथ, गुह्यभाग, जिह्वा, केश, नख, सिर, संधिमार्ग तथा नाना प्रकारकी बहुत-सी रेखाओंकी उत्पत्ति कैसे होती है? काम, क्रोध, भय, लज्जा, हर्ष, सुख और दुःखका भाव मनमें कैसे आता है?


* त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा तथा अस्थि—इन षट् धातुओंसे निर्मित शरीर 'षाट्कौशिक' कहलाता है।

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प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५३

इस शरीरका चित्रण, छिद्रण और विभिन्न प्रकारकी नसोंसे वेष्टन कैसे हुआ है? हे हृषीकेश! इस असार भवसागरमें शारीरिक रचनाको मैं इन्द्रजाल ही मानता हूँ। हे स्वामिन्! नाना दुःखोंसे भरे हुए इस असार सागररूप संसारका कर्ता कौन है?

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! कोशके निर्माणकी परम गोपनीय प्रक्रियाको मैं कहता हूँ, इसके जाननेमात्रसे व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। हे वैनतेय! संसारके प्रति दया करते हुए तुमने जीवके कारण-तत्त्वपर अच्छा प्रश्न किया है। एकाग्रचित्त होकर तुम उसे सुनो।

स्त्रियाँ ऋतुकालमें चार दिन त्याज्य होती हैं, क्योंकि प्राचीन कालमें ब्रह्माने वृत्रासुरके मारे जानेपर लगी हुई ब्रह्महत्याको इन्द्रके शरीरसे निकालकर एक चौथाई भाग स्त्रियोंको दे दिया था, उसीके कारण स्त्रियाँ ऋतुकालके आरम्भमें चार दिन अपवित्र मानी जाती हैं और उस समयतक इनका मुख नहीं देखना चाहिये, जबतक वह पाप उनके शरीरमें विद्यमान रहता है। स्त्रीको ऋतुकालके पहले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन रजकी मानना चाहिये। चौथे दिन वह शुद्ध होती है। एक सप्ताहमें वह देवता और पितरोंके पूजनयोग्य हो जाती है। प्रथम सप्ताहके बीच जो गर्भ स्त्रीमें रुक जाता है, उसकी उत्पत्ति मलिम्लुचसे माननी चाहिये। वीर्यस्थापनके समय माता-पिताके चित्तमें जैसी कल्पना होगी, वैसे ही गर्भका जन्म होगा, इसमें संदेह नहीं है।

युग्म तिथिवाली रात्रियोंमें सहवास करनेसे पुत्र और अयुग्म रात्रियोंमें सहवास करनेसे कन्याका जन्म होता है। अतः ऋतुकालके पहले सप्ताहको छोड़कर दूसरे सप्ताहकी युग्म तिथियोंमें सहवासमें प्रवृत्त होना चाहिये। सामान्यतः स्त्रियोंका ऋतुकाल सोलह रात्रियोंका होता है। यदि चौदहवीं रात्रिमें गर्भाधानकी क्रिया होती है तो उस गर्भसे गुणवान्, भाग्यवान्, धनवान् तथा धर्मनिष्ठ पुत्रका जन्म होता है। हे पक्षिराज! वह रात्रि सामान्य लोगोंको प्राप्त होना सम्भव नहीं है। प्रायः स्त्रीमें गर्भोत्पत्ति आठवीं रात्रियोंके मध्यमें ही हो जाती है। ऋतुकालके पाँचवें दिन स्त्रियोंको कटु, क्षार, तीक्ष्ण और उष्ण भोजनका परित्याग करके मधुर भोजन करना चाहिये; क्योंकि उनकी कोख औषधिपात्र है और पुरुषका बीज अमृततुल्य है। उसमें (स्त्रीरूप औषधिपात्रमें) बीज वपन करके मनुष्य सम्यक् फल प्राप्त कर सकता है, इसलिये उसको क्रोधादिकी ज्वालासे बचाकर मधुर भोजन तथा मृदु स्वभावकी शीतलतासे अभिसिंचित करना चाहिये। पुरुषको चाहिये कि वह पहले ताम्बूल और पुष्पोंकी माला तथा चन्दनसे सुवासित होकर स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण करे। तदनन्तर शुद्ध मनसे स्त्रीकी शय्यापर शयन करनेके लिये जाय। वीर्य-वपनके समय उसके चित्तमें जैसी कल्पना होगी, उसी स्वभाववाली संतान जन्म लेगी। प्रारम्भमें शुक्र और रक्तके संयोगसे जीव पिण्डरूपमें अस्तित्वको प्राप्त करता है और गर्भमें वह उसी प्रकार बढ़ता है, जिस प्रकार आकाशमें चन्द्रमाकी अभिवृद्धि होती है।

शुक्रमें चैतन्य बीजरूपसे स्थित रहता है। जब काम चित्त तथा शुक्र ऐक्यभावको प्राप्त हों, उस समय स्त्रीके गर्भाशयमें जीव एक निश्चित रूप धारण करनेकी पूर्वावस्थामें आता है। रक्ताधिक्य होनेपर कन्या और शुक्राधिक्य होनेपर पुत्र होता है। जब रक्त तथा शुक्र समान होते हैं तो गर्भमें स्थित संतानें नपुंसक होती हैं। शुक्र तथा शोणित पहले दिन और रातमें कलल, पाँचवें दिन बुद्बुद तथा चौदहवें दिन मांस-रूपमें हो जाता है। उसके बाद वह घनीभूत मांस गर्भमें रहता हुआ क्रमशः

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५५४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बीसवें दिनतक पिण्डरूपमें बढ़ता है। तदनन्तर पचीसवें दिन उसमें शक्ति और पुष्टताका संचार होने लगता है। एक मास पूरा होते ही वह पञ्चतत्त्वोंसे युक्त हो जाता है। तत्पश्चात् उस गर्भस्थ जीवके शरीरपर दूसरे मासमें त्वचा और मेदा, तीसरे मासमें मज्जा तथा अस्थि, चौथे मासमें केश एवं अँगुली, पाँचवें मासमें कान, नाक तथा वक्षःस्थलका निर्माण होता है। उसके बाद छठे मासमें कण्ठ, रन्ध्र और उदर, सातवें मासमें गुह्यादि भाग तथा आठवें मासमें वह सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पूर्ण हो जाता है। आठवें मासमें ही वह जीव माताके गर्भमें बार-बार चलने लगता है और नवें मासमें उस गर्भस्थ शिशुका ओजगुण परिपक्व हो जाता है। उसके बाद गर्भवासका काल बीतनेपर वह गर्भस्थ शिशु गर्भसे निकलना चाहता है। वह चाहे कन्या हो, चाहे पुत्र, चाहे नपुंसक हो, फिर उसका जन्म होता है।

इस प्रकार जन्म, पुष्टि तथा संहार—इन तीनोंकी शक्तिसे युक्त षट्कोशोंके भीतर विद्यमान पाँच इन्द्रिय, दस नाड़ी, दस प्राण और दस गुणसे समन्वित शरीरको जो जान लेता है, वही योगी है। जीवका पाञ्चभौतिक शरीर मज्जा, अस्थि, शुक्र, मांस, रोम तथा रक्त—इन छः कोशोंसे निर्मित पिण्ड एक है। नवें या दसवें मासमें इसका पाञ्चभौतिक स्वरूप अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है। प्रसवकालीन वायुसे आकृष्ट, तात्कालिक पीड़ासे बेचैन, माताकी सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा दी जा रही शक्तिसे पुष्ट वह जीव गर्भसे निकलनेका यथाशीघ्र प्रयास करता है। पृथ्वी, जल, हवि, भोक्ता, वायु तथा आकाश—इन छः भूतोंसे पीड़ित होता हुआ जीव स्नायु-तन्त्रिकाओंसे आबद्ध रहता है। इन्हींको विद्वानोंने मूलभूत तत्त्व कहा है, ये शरीरमें फैली हुई सात नाड़ियोंके बीचमें रहते हैं। त्वचा, अस्थि, नाड़ी, रोम और मांस—ये पाँच पृथ्वीतत्त्वके कारण-शरीरमें आते हैं।

हे काश्यप! इसी प्रकार लार, मूत्र, शुक्र, मज्जा तथा रक्त—ये पाँच जलतत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। हे तार्क्ष्य! क्षुधा, तृषा, निद्रा, आलस्य एवं कान्ति—ये पाँच तेजस्तत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। ऐसे ही राग, द्वेष, लज्जा, भय और मोह—ये पाँच वायुतत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। आकुञ्चन, धावन, लंघन, प्रसारण तथा निरोध—ये भी पाँचों वायुतत्त्वके कारण-शरीरमें ही पाये जाते हैं। हे गरुड! शब्द, चिन्ता, गाम्भीर्य, श्रवण और सत्यसंक्रम (सत्य और असत्यका विवेक)—ये पाँच आकाशतत्त्वके कारण-शरीरमें आते हैं, ऐसा तुम्हें जानना चाहिये।

श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा तथा नाक—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जबकि हाथ, पैर, गुदा, वाणी और गुह्य—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। इडा, पिंगला, सुषुम्णा, गान्धारी, गजजिह्वा, पूषा, यशा, अलम्बुषा, कुहू तथा शंखिनी—ये दस नाड़ियाँ मानी गयी हैं। यही प्रधान दस नाड़ियाँ पिण्ड (शरीर)-के मध्य स्थित रहती हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त तथा धनञ्जय नामके दस वायु प्राणियोंके शरीरमें विद्यमान रहते हैं। केवल खाया गया अन्न ही देहधारियोंके शरीरको पुष्ट करता है और इस खाये गये अन्नको प्राणवायु ही शरीरमें तथा उसकी सभी संधियोंमें पहुँचाता है। भोजनके रूपमें ग्रहण किया गया आहार वायुके द्वारा दो रूपोंमें विभक्त किया जाता है। इसके अनन्तर यह प्राणवायु ही गुदाभागमें प्रविष्ट होकर अन्न और जलको पृथक्-पृथक् कर देता है तथा यही प्राणवायु अग्निके ऊपर जलको एवं जलके ऊपर अन्नको पहुँचाकर स्वयं अग्निके नीचे रहते हुए अग्निको धीरे-धीरे उद्दीप्त करता है। तत्पश्चात्

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प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५५


वायुसे उद्दीप्त किया हुआ अग्नि अन्नके रसभागको अलग और शुष्कभागको अलग कर देता है। यही शुष्कभाग बारह प्रकारके मलोंके रूपमें शरीरसे बाहर आता है। शरीरमें विद्यमान कान, नेत्र, नाक, जिह्वा, दाँत, नाभि, गुदा तथा नख—ये सब मलके आश्रय हैं। ऐसे ही विष्ठा, मूत्र, शुक्र एवं शोणित-रूपसे ये मल अनन्त प्रकारके हैं।

हे विनतासुत! मनुष्यके शरीरमें सामान्यतः साढ़े तीन करोड़ रोम और बत्तीस दाँत होते हैं। सिरमें बालोंकी संख्या सात लाख तथा नख बीस हैं। हे तार्क्ष्य! पुराने लोगोंने सामान्य रूपसे शरीरमें एक हजार पल मांस, सौ पल रक्त, दस पल मेदा, दस पल त्वचा, बारह पल मज्जा, तीन पल महारक्त, दो कुडव (अन्नकी एक माप जो बारह मुट्ठीके बराबर होती है) शुक्र तथा एक कुडव संतानोत्पत्तिके लिये उपयोगी स्त्रीके विद्यमान शोणित (रज)-को माना है। इसी प्रकार मानव-शरीरमें छः प्रकारके कफ, छः प्रकारकी विष्ठा, छः प्रकारके मूत्र और तीन सौ साठसे अधिक अस्थियाँ होती हैं। इस प्रकार पिण्ड (शरीर)-के विषयमें बताया गया। इसे ही शरीरका वैभव कहते हैं। इन सबके अतिरिक्त शरीरमें कुछ नहीं है।

कर्मानुसार ही मनुष्यको सुख-दुःख, भय तथा कल्याण प्राप्त होता है। कर्मका अनुष्ठान शरीरके द्वारा ही सम्भव होनेसे शरीरका महत्त्व है। इस शरीरके द्वारा ही जीव उत्तम-से-उत्तम अथवा अधम-से-अधम गति प्राप्त करता है। इसलिये शरीरकी उत्पत्तिकी प्रक्रिया यहाँ बतायी जा रही है—वायु जीवको गर्भसे बाहर करता है। उस समय उसके दोनों पैर ऊपर और मुख नीचेकी ओर रहता है। ऐसा जीव पहले तो यथाक्रम माँके गर्भमें रहकर ही धीरे-धीरे बढ़ता है। माताके द्वारा ग्रहण किये गये अन्न, फल, दूध, घृत और जलके आहारसे उस जीवके शरीरकी हड्डियाँ पुष्ट होती हैं तथा वह जीवित रहता है। उस जीवके नाभिप्रान्तसे शक्तिवर्धिनी नाड़ी जुड़ी रहती है, जिसको आप्यायनी कहा जाता है। उसका सम्बन्ध स्त्रियोंके आँत-छिद्रसे होता है। उनके द्वारा खाया-पिया गया पदार्थ गर्भमें स्थित प्राणीके पेटमें आप्यायनी नाड़ीके द्वारा पहुँचता है। माँके द्वारा भुक्त पदार्थोंसे पुष्ट देहवाला होकर वह जीव प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। इसी वृद्धिक्रममें संसारकी पूर्वानुभूत अनेक विषयोंकी स्मृतियाँ उसे होती हैं और इन्हीं स्मृतियोंके कारण दुःखित वह प्राणी खिन्न हो जाता है तथा अनेक प्रकारकी पीड़ाका अनुभव कर इधर-उधर गतिमान् होता है एवं 'गर्भसे निकल करके मैं पुनः ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे मुझे पुनः गर्भकी प्राप्ति हो'—यह सोचकर जीव अपने उन सैकड़ों पूर्वजन्मोंका स्मरण करता है, जिनमें उसको सांसारिक, देवयोनियों और मृत्युलोककी नाना योनियोंके सुख-दुःखका अनुभव प्राप्त हुआ था। उसके बाद समयानुसार वह प्राणी अधोमुख होकर नवें या दसवें मासमें गर्भसे बाहर आता है।

प्राजापत्य वायुके प्रभावसे गर्भ छोड़कर बाहर निकलता हुआ वह जीव दुःखी होता है। उस समय दुःखसे पीड़ित वह प्राणी विलाप करता हुआ बाहर निकलता है। उदरसे बाहर होते हुए उस जीवको असह्य कष्ट देनेवाली मूर्च्छा आ जाती है, किंतु कुछ ही क्षणमें वह जीव पुनः चेतनामें आ जाता है। वायुके स्पर्शसे उसको सुखानुभूति होती है। तत्पश्चात् संसारको मोहित करनेवाली विष्णुकी माया उसके ऊपर अपना प्रभाव जमा लेती है। उस मायाशक्तिसे विमोहित जीवात्माका पूर्व ज्ञान नष्ट हो जाता है। ज्ञान नष्ट होनेके बाद वह जीव बालभावको प्राप्त करता है। तदनन्तर उसे कौमार्य, यौवन और वृद्धावस्था भी प्राप्त होती है। उसके

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५५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बाद मनुष्य पुनः उसी प्रकार मरता है और जन्म लेता है। इस संसार-चक्रमें वह घड़ा बनानेवाले चक्रयन्त्रके समान घूमता रहता है। प्राणी कभी स्वर्ग प्राप्त करता है और कभी नरकमें जाता है।

स्वर्ग तथा नरक मनुष्यको अपने कर्मानुसार ही प्राप्त होते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! स्वर्ग और नरकमें कर्मफलका भोग करके प्राणी कभी थोड़ेसे शेष पाप-पुण्यका भोग करनेके लिये पृथ्वीपर आ जाता है। जो स्वर्गमें निवास करते हैं, उन लोगोंको यह दिखायी देता है कि नरकलोकोंमें प्राणियोंको बहुत दुःख है। यहाँपर यमराजके दूतोंसे प्रताड़ित वे नरकवासी कभी प्रसन्न नहीं होते हैं, उन्हें तो दुःख-ही-दुःख झेलना पड़ता है। जबसे मनुष्य विमानमें चढ़कर ऊपरकी ओर प्रस्थान करता है तभीसे उसके मनमें यह भाव स्थान बना लेता है कि पुण्यके समाप्त होनेपर मैं स्वर्गसे नीचे आ जाऊँगा। इसलिये स्वर्गमें भी बहुत दुःख है। नरकवासियोंको देख करके जीवको महान् दुःख होता है; क्योंकि मेरी भी इसी प्रकारकी गति होगी—इस चिन्तासे वह रात-दिन मुक्त ही नहीं होता है। गर्भवासमें प्राणीको योनिजन्य बहुत कष्ट होते हैं। योनिसे पैदा होते समय उसे महान् दुःख होता है। उत्पन्न होनेके बाद बालपनमें भी उसे दुःख है और वृद्धावस्थामें भी दुःख है। काम, क्रोध तथा ईर्ष्याका सम्बन्ध होनेसे युवावस्थामें भी उसके लिये असहनीय दुःख है। दुःस्वप्न, वृद्धावस्थामें तथा मरणके समय भी उत्कट दुःख उसे होता है। यमदूतोंके द्वारा खींचकर नरकमें भी ले जाये जा रहे जीवको अधोगति प्राप्त होती है। उसके बाद फिर जीवका गर्भसे जन्म होता है और मृत्यु होती है। ऐसे संसार-चक्रमें प्राणी कुम्भकारके चक्रके समान घूमते रहते हैं। पूर्वजन्ममें किये गये पुण्य-पापसे बँधे जीव बार-बार इसी संसारके आवागमनका दुःख भोगते हैं।

हे पक्षिन् ! सैकड़ों प्रकारके दुःखसे व्याप्त इस संसारक्षेत्रमें रञ्चमात्र भी सुख नहीं है। हे विनतासुत ! इसलिये मनुष्योंको मुक्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जीवकी जैसी स्थिति गर्भमें होती है, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब मैं पूर्वक्रमसे पूछे गये प्रश्नका ही उत्तर दूँ या इसी अन्तरालमें कुछ अन्य प्रश्न करनेकी तुम्हारी इच्छा है?

गरुडने कहा—हे देवेश ! पूछे गये प्रश्नोंमेंसे दो महत्त्वपूर्ण प्रश्नोंके उत्तर तो मुझे प्राप्त हो गये हैं, अब मुझे तीसरे प्रश्नका उत्तर प्रदान करनेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षीन्द्र ! मरणासन्न प्राणीके लिये क्या करना चाहिये? यह तुमने प्रश्न किया है? उसका उत्तर सुनो ! मैं संक्षेपमें उसे कह रहा हूँ।

मृत्युको संनिकट जानकर मनुष्यको सबसे पहले गोमूत्र, गोमय, तीर्थोदक और कुशोदकसे स्नान कराये। तदनन्तर स्वच्छ एवं पवित्र वस्त्र पहना दे और गोमयसे लिपी हुई भूमिपर दक्षिणाग्र कुशोंका एवं तिलका आस्तरण करके सुला दे। सुलाते समय उस मरणासन्न प्राणीके सिरको पूर्व अथवा उत्तरकी ओर करके उसके मुखमें सोनेका टुकड़ा डाले। हे खगेश ! उसीके संनिकट भगवान् शालग्रामकी मूर्ति और तुलसीका वृक्ष लाकर रख दे। तत्पश्चात् वहींपर घीका एक दीपक जलाये और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस मन्त्रका जप करे। पूजा-दान तथा नाम-स्मरण आदिमें मन्त्रसे **‘ॐ’**का योग करे। पुष्प-धूपादिसे भली प्रकार हृषीकेश विष्णुदेवकी पूजा करे। तदनन्तर विनम्रभावसे स्तुति-पाठ करते हुए उनका ध्यान करे। उसके बाद ब्राह्मणों, दीनों और अनाथोंको दान देकर, भगवान् विष्णुके चरणोंको हृदयमें स्थान देते हुए पुत्र, मित्र, स्त्री, खेती-बारी तथा

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प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५७


धन-धान्यादिके प्रति अपनी ममताका परित्याग कर दे। उस समय जीवको बहुत ही कष्ट होता है। उसके निवारणके लिये पुत्रादि सभी परिजनोंको मरणासन्न प्राणीके कल्याण-हेतु ऊँचे स्वरमें 'पुरुषसूक्त'का पाठ करना चाहिये।

हे गरुड! मृत्युके आ जानेपर जो कर्म करना चाहिये, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया। अब इस समस्त कर्मका फल क्या है? उसको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, तुम सुनो।

हे पक्षिराज! स्नान करनेसे प्राणीको स्वच्छता प्राप्त होती है। उससे शरीरकी अपवित्रता दूर होती है। उसके बाद भगवान् विष्णुका स्मरण होता है और उनका स्मरण सभी प्रकारके उत्तम फल प्रदान करता है। कुश और कपास आतुर प्राणीको स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। तिल तथा कुश जलमें डालकर मरणासन्न व्यक्तिको कराया गया स्नान यज्ञमें किये गये अवभृथ-स्नानके समान होता है। ऐसे ही गोमयसे लिपी हुई भूमिपर मण्डल बनाकर उसपर तिल, कुश आदि डालकर यदि मरणासन्न व्यक्तिको सुलाया जाय तो विष्णु आदि देव प्रसन्न होते हैं; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी और अग्निदेव मण्डलमें रहते हैं। इसीलिये मरणासन्न व्यक्तिको जिस भूमिपर शयन कराना है, वहाँपर मण्डलका निर्माण करना चाहिये। हे खगेश! पूर्व अथवा उत्तरकी ओर यदि मरणासन्न व्यक्तिका सिर कर दिया जाय, यदि उसके पाप कम हों तो इतनेमात्रसे उसे उत्तम लोक प्राप्त हो सकते हैं। आतुर व्यक्तिके मुखमें पञ्चरत्न डालनेपर उसमें ज्ञानका उदय होता है। हे पक्षिन्! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु और एकादशीव्रत—ये पाँच संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्योंके लिये नौकाके समान हैं।* विष्णु, एकादशी, गीता, तुलसी, ब्राह्मण एवं गौ—यह षट्पदी इस असार और जटिल संसारमें प्राणीको भक्ति प्रदान कराती है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस प्रकार भगवान् विष्णुके मन्त्रका जप करता हुआ मनुष्य निस्संदेह उन्हींका सायुज्य प्राप्त करता है। पूजा करनेसे भी मेरे (भगवान् विष्णु) लोककी प्राप्ति होती है, मेरी पूजा करनेवाला साक्षात् स्वर्गलोकको जाता है। हे काश्यप! 'पुरुषसूक्त'के पाठसे अपने परिजनोंके व्यामोहमें फँसा हुआ प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। परलोक-प्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं, उनमें जिन साधनोंकी अधिकता होगी, उन्हींका फल मनुष्यको अधिकाधिक प्राप्त होगा। यथाशक्ति ब्राह्मणों, दीनों और अनाथोंको दान देना चाहिये ऐसा करनेसे वह सदैव प्रसन्न रहता है।

हे साधो! स्नानादि करनेपर मनुष्यको प्राप्त होनेवाले समस्त फलोंका विवरण यही है, इसको मैंने कह दिया। अब इस ब्रह्माण्डमें जो गुण विद्यमान हैं, उन्हें तुम सुनो! वे सब तुम्हारे शरीरमें भी हैं। पाताल, पर्वत, लोक, द्वीप, सागर, सूर्यादि सभी ग्रह तुम्हारे शरीरमें ही स्थित हैं। यथा—पैरके नीचे तललोक, पैरके ऊपर वितललोक, दोनों जानुओंमें सुतललोक और सक्थि-प्रदेशमें महातल नामक लोक समझने चाहिये। वैसे ही ऊरु-भागमें तलातललोक तथा गुह्य-स्थानमें रसातललोक स्थित है। ऐसे ही प्राणीके कटिप्रदेशमें पाताललोककी स्थिति समझे। नाभिके मध्यमें भूर्लोक, उसके ऊपर भुवर्लोक, हृदयमें स्वर्गलोक, कण्ठदेशमें महर्लोक, मुखमें जनलोक, मस्तकमें तपोलोक एवं


* पञ्चरत्ने मुखे मुक्ते जीवे ज्ञानं प्ररोहति। तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ॥
पञ्चप्रवहणान्येव भवाब्धौ मजतां नृणाम्। विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी भक्तिदायिनी। नमो भगवते वासुदेवायति जपेन्नरः ॥ (३२।९९-१०१)