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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 548 of 634

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Page 548
५३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बच्चेको शिशु, सत्ताईस मासतकके अवस्थाप्राप्त बच्चेको बालक, पाँच वर्षकी आयुवालेको कुमार, नौ वर्षवालेको पौगण्ड, सोलह वर्षवालेको किशोर और उसके बादका यौवन-काल है। पाँच वर्षकी अल्पायुमें मृत कुमार चाहे उसका व्रतबन्ध हुआ हो अथवा न हुआ हो, वह पूर्वकथित विधानके अनुसार दशपिण्ड-कृत्यकी कामना करता है। स्वल्प कर्म, स्वल्प प्रसंग, स्वल्प विषयबन्धन, स्वल्प शरीर तथा स्वल्प वस्त्रके कारण प्राणी स्वल्प क्रियाकी इच्छा करता है।<sup>१</sup> जीव जबतक वृद्धिकी ओर बढ़ रहा हो, जबतक वह सांसारिक विषय-वासनाओंसे घिरा हो, तबतक उसे अपने उस मृत परिजनको वे सभी भोज्य पदार्थ और आवश्यक वस्तुएँ देनी चाहिये, जो उसके लिये उपजीव्य<sup>२</sup> और इच्छित थीं।

हे खगेश! चाहे बालक हों या वृद्ध हों अथवा युवा हों सभी प्राणी घटकी इच्छा करते हैं। सर्वत्रगामी देही जीवात्मा सदैव सुख-दुःखका अनुभव करता है। जिस प्रकार साँप अपनी पुरानी केंचुलका परित्याग कर देता है, उसी प्रकार जीव अपने पुराने शरीरका परित्याग कर अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला होकर तथा वायुभूत हो भूखसे पीड़ित हो जाता है। अतः बालककी भी मृत्यु होनेपर निश्चित ही दान देना चाहिये। जन्मसे लेकर पाँच वर्षतककी अवधिमें मरा हुआ प्राणी दानमें दिये गये असंस्कृत<sup>३</sup> भोजनका उपभोग करता है। यदि पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु हो जाती है तो वृषोत्सर्ग और सपिण्डीकरणको छोड़कर द्वादशाहके आनेपर षोडश श्राद्ध करने चाहिये। उस दिन यथाक्रम पायस (खीर)-से बने पिण्डका दान देना चाहिये। यह पिण्डदान गुड़से भी किया जा सकता है। उसी दिन सान्नोदक कुम्भ और पददान देना चाहिये। ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति महादानादि भी करने चाहिये। पक्षिश्रेष्ठ! दीप-दानादि जो कुछ शेष कर्म हैं उन्हें पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले कुमारकी मृत्यु होनेपर करना चाहिये।

हे पक्षिराज! व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) होनेसे पहले जिसका मरण हुआ है उसकी संतृप्तिके लिये पूर्वोक्त कर्म करना चाहिये। यदि मनुष्यके द्वारा सारी क्रिया नहीं की जाती है तो वह जीव पिशाच हो जाता है। व्रतबन्धके पूर्व मृत बालकके लिये पूर्वोक्त सब कर्म करना चाहिये। उसके बाद 'स्वाहा' शब्दसे समन्वित मन्त्रके द्वारा षोडश एकोद्दिष्ट श्राद्ध करे। ऋजु<sup>४</sup> कुशसे श्वेत तिलके द्वारा अपसव्य होकर समस्त क्रिया करनेसे पितृगण परम गतिको प्राप्त करते हैं और दीर्घायु होकर पुनः अपने ही कुलमें जन्म लेते हैं।

सभी प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाला पुत्र माता-पिताके प्रेमका अभिवर्धक होता है। जैसे एक आकाश, एक चन्द्र और एक आदित्य आश्रय-भेदसे पृथक्-पृथक् घटादिमें दिखायी देते हैं, वैसे ही पिताका आत्मा सभी पुत्रोंमें सदैव विचरण करता रहता है। जिसकी जो प्रकृति शुक्र-शोणित-संगमके पूर्व होती है, वही पुत्रोंमें आकर संनिहित हो जाती है। वैसे ही वे अपने जीवनमें कर्म करते हैं। किसीका पुत्र पिताका रूप लेकर उत्पन्न होता है, पिताकी अपेक्षा कोई अत्यधिक


१-जिस व्यक्तिका मरण हुआ है वह अपनी अवस्थाके अनुसार एवं अपने कर्मोंके अनुसार जिस मात्रामें, जिस रूपमें अन्न, वस्त्र आदिसे तुष्ट होता रहा है उसी मात्रामें, उसी रूपमें उसकी और्ध्वदैहिक क्रियामें अन्न, वस्त्र आदि देना चाहिये।
२-पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उपयोगी।
३-मन्त्र आदिके बिना दिया हुआ अन्न।
४-पवित्रक या मोटक आदिके बिना बनाये ही कुशका उपयोग ऋजु कुश है।