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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 560 of 634

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Page 560
५५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

विष्णुर्माता पिता विष्णुर्विष्णुः स्वजनबान्धवाः।
यत्र विष्णुं न पश्यामि तत्र वासेन किं मम॥
जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके।
ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्॥
(३०।४१-४२)

ब्राह्मण, जल, पृथ्वी आदि जितने भी पदार्थ हैं, उन्हें अपना ही स्वरूप समझना चाहिये। इसलिये हे खगेश! किसी भी स्थानपर मनुष्य पूर्वजन्मार्जित पाप-पुण्यके अनुसार जिस कर्मको करता है, उसका फलदाता मैं ही हूँ। मैं ही प्राणीकी बुद्धिको धर्ममें नियुक्त करता हूँ और मुक्ति मैं ही देता हूँ।

हे तार्क्ष्य! अन्त-समय आनेपर मनुष्योंका हित करनेवाली वैतरणी नदी मानी गयी है। उसीके जलसे अपने पाप-समूहको धोकर प्राणी विष्णुलोकको जाता है। बाल्यावस्थाका जो पाप है, कुमारावस्थामें जो पाप हुआ है, यौवनावस्थाका जो पाप है और जन्म-जन्मान्तरमें समस्त अवस्थाओंके बीच भी जो पाप किया गया है, रात्रि-प्रातः, मध्याह्न-अपराह्न तथा दोनों संध्याओंके मध्य मन, वाणी और कर्मसे जो पाप हुआ है, उन सभी पापोंके समूहसे प्राणी अपना उद्धार अन्तिम क्षणमें सर्वकामनाओंको सिद्ध करनेवाली एक भी श्रेष्ठतमा कपिला गौका दान दे करके कर सकता है। [गोदान करते समय परमात्मासे ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—परमात्मन्!] 'गायें ही मेरे आगे रहें, गायें ही मेरे पीछे और पार्श्वभागमें रहें, गायें ही मेरे हृदयमें निवास करें, मैं गायोंके बीचमें ही रहूँ। जो सभी प्राणियोंकी लक्ष्मीस्वरूपा हैं, जो देवताओंमें प्रतिष्ठित हैं, वे गौरूपिणी देवी मेरे सभी पापोंको विनष्ट करें—

गावो ममाग्रतः सन्तु पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवे व्यवस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु॥
(३०।५२-५३)
(अध्याय ३०)


और्ध्वदैहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त देहके स्वरूपका वर्णन

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! जो मनुष्य पापाचारमें लगे हुए हैं, वे यमलोकको जाते हैं। यदि मुझको साक्षी बनाकर मनुष्यके द्वारा दान दिया जाता है, तो वह अनन्त फलदायी होता है। भूमिदान देनेवाला प्राणी दानमें दी गयी भूमिके रजकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। जो जूतेका दान देते हैं, घोर यममार्गमें वे घोड़ेपर सवार होकर चलते हैं। छत्रदान करनेसे प्रेत यमलोकमें कहींपर भी धूपसे नहीं जलते, वे सुखपूर्वक अपने पथमें चलते चले जाते हैं। जिसके उद्देश्यसे मनुष्य जो अन्न-दान देता है, उससे वह संतृप्त हो जाता है। यमलोकके महापथमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ घनघोर अन्धकार है, वहाँ कुछ भी दिखायी नहीं देता, किंतु दीपदान देनेसे मनुष्य उस मार्गमें प्रकाशसे युक्त प्राणीके समान जाते हैं। आश्विन, कार्तिक तथा माघमास, मृत-तिथि और चतुर्दशी तिथिमें दिया गया दान सुखकारक होता है। जबतक वर्ष न पूरा हो जाय, तबतक प्रतिदिन प्रेतको ऊबड़-खाबड़ मार्गमें सुखपूर्वक गमन करानेकी इच्छासे लोगोंको दीपदान करना चाहिये। जो मनुष्य दीपदान करता है, वह स्वयं प्रकाशमय होकर संसारका