दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं मारवाड़ परम्परा पीठिका
सूचीपत्र शब्दों का
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शब्द पृष्ठ शब्द पृष्ठ
अब मेरे सतगुर ... .. ४५ प
अमृत नीका कहै सब कोई ... ४८ पतिव्रता पति मिली है लाग ... ३७
आदि अनादि मेरा साँई ... ३५ ब
आदि अंत मेरा हे राम ३७ बाबल कैसे बिसरा जाई ... ४३
ऐ म
ऐसे साधू करम दहै ४६ मुरली कौन बजावै हो ... ४५
मैं तोहि कैसे बिसरू देवा . ४१
क र
कहा कहूं मेरे पिउ . .. ४६ राम नाम नहिं हिरदै धारा ... ५०
राम भरोसा राखिये ... ४७
च स
चल चल रे हंस राम सिंध ३८ सतगुर से सब्द ले . ५०
चल सूवा तेरे आद राज . ३९ सब जग सोता सुध नहिं पावै . २१
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दरिया साहब (मारवाड़ वाले)
का
जीवन-चरित्र
—:❀:—
दरिया साहब ने मारवाड़ के जैतारन नामक गाँव में भादों वदी अष्टमी संवत् १७३३
(बिक्रमी) के दिन एक मुनलमान कुल में जन्म लिया और अगहन सुदी पूनों संवत् १८१५
को ८२ वरस से अधिक अवस्था में परलोक को सिधारे। उस समय महाराज वख्तसिंह जी
मारवाड़ के राजा थे। दरिया साहब के वाप मा जाति के धुनियां थे जैसा कि उन्होंने एक
पद में कहा है।
जो धुनियाँ तौ भी मैं राम तुम्हारा ।
अधम कमीन जाति मतिहीना,
तुम तो हौ सिर ताज हमारा ।
दरिया साहब की सात ही वरस की उमर मे उनके पिता का देहान्त हुआ जिस से
उसी देश के रैन नामक गाँव, परगना मेढ़ता में अपने नाना के घर जाकर रहे।
ˋनाना का नाम कमीच था।
कहते हैं कि महाराज वख्तसिंह जी को एक असाध रोग था जिसका इलाज करते
, ते वह हार गये। आखिर भाग्य से दरिया साहब के आश्रम पर रैन गाँव में जा कर
[ ]रता से विनती की जिस पर दरिया साहब ने दया करके अपने गुरुमुख चेले सुखरामदास
के द्वारा उन को उपदेश दिया और राजा आरोग्य हो गये। सुखरामदास जी जाति के
कलीगर लोहार थे जिन का स्थान रैन में अब तक मौजूद है जहाँ हर वरस मेला
[लग]ता है।
दरिया साहब के गुरु प्रेमजी थे जो बीकानेर के गाँव खियानूसर मे रहते थे।
मारवाड़ (राजपूताना) में दरिया साहब के मत के हजारों आदमी है। दरिया पंथियों
विश्वास के अनुसार नीचे लिखा हुआ दोहा महात्मा दादू साहब ने दरिया साहब के
[हो]ने से एक सौ वरस पहले कहा था –
२ जीवन-चरित्र
देह पड़तौँ दादू कहै, सौ बरसौँ इक संत ।
रैन नगर में परगटै, तारै जीव अनंत ॥
यह दरिया साहब उन दरिया साहब से बिलकुल निराले हैं जो बिहार प्रांत में डुमराँव
के पास के धरकंधा नामक गाँव में इसी समय में बिराजमान थे और जिन का देहांत होना
१०६ बरस की उमर में संवत् १८३७ में पाया जाता है । इस हिसाब से मारवाड़ वाले
दरिया साहब बिहार वाले दरिया साहब के दो बरस पीछे पैदा हुए और २२ बरस पहिले गुप्त
हुए। इन दोनों महात्माओं की बानी और इष्ट के नाम में इतना भेद है कि दोनों कदापि
एक नहीं ठहर सकते । पर यह अनूठी बात है कि दोनों महात्मा नीच जाति के मुसलमानी
माता के पेट से जन्मे (क्योंकि मारवाड़ वाले महात्मा की माँ धुनियाइन थी और बिहार वाले
की दर्जिन) दोनों महात्मा का नाम एक ही था, दोनों शब्द-मार्गी थे और एक ही समय में
बयासी बरस तक रहे, यद्यपि अलग-अलग देशों में एक दूसरे से बहुत दूर पर । बिहार के
दरिया साहब के पंथ वाले दूसरे दरिया साहब के पन्थ वालो से गिनती में अधिक हैं;
उन की बानी भी जो ऊँचे गट की और अति मनोहर है हमको मिली है जो उनके जीवन-
चरित्र के साथ छपी है।
मारवाड़ वाले दरिया साहब की बानी और जीवन-चरित्र हम को लाला शंकरलाल
माहेश्री बी० ए० सेक्रेटरी सरदार रिसाला जोधपुर की सहायता से मिले जिसके लिये हम
उनको हृदय से धन्यवाद देते हैं।
संत चरन की रज, अधम,
संतवानीपुस्तक-माला-कार्यालय
वेलावडियर प्रेस, प्रयाग ।
दरिया साहब (मारवाड़)
की बानी
सतगुर का अंग
नमो राम परब्रह्म जी, सतगुर संत अधारि ।
जन दरिया बंदन करै, पल पल वारूं वारि ॥१॥
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो नमो सब संत ।
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत ॥२॥
दरिया सतगुर भेंटिया, जा दिन जन्म सनाथ ।
स्रवनाँ सब्द सुनाय के, मस्तक दीना हाथ ॥३॥
सतगुर दाता मुक्ति का, दरिया प्रेम दयाल ।
किरपा कर चरनों लिया, मेटा सकल जँजाल ॥४॥
अंतर थो बहु जन्म को, सतगुर भाँज्यो¹ आय ।
दरिया पति से रूठनो, अब कर प्रीति बनाय ॥५॥
जन दरिया हरि भक्ति की, गुराँ बताई बाट ।
भूला ऊजड़ जाय था, नरक पड़न के घाट ॥६॥
दरिया सतगुर सब्द सौं, मिट गई खैंचा तान ।
भरम अंधेरा मिट गया, परसा पद निरबान ॥७॥
दरिया सतगुर सब्द की, लागी चोट सुठौर ।
चंचल सों निस्चल भया, मिट गइ मन की दौड़ ॥८॥
डूबत रहा भव सिंध में, लोभ मोह की धार ।
दरिया गुरु तैरु मिला, कर दिया पैले पार² ॥९॥
दरिया गुरु गरुवा मिला, कर्म किया सब रद्द ।
झूठा भर्म छुड़ाय कर, पकड़ाया सत सब्द ॥१०॥
(१) मिटा दिया। (२) पल्ले पार।
दरिया साहब मारवाड़
दरिया मिरतक देख कर, सतगुर कीनी रीझ।
नाम सजीवन मोहिं दिया, तीन लोक को बीज ॥११॥
तीन लोक को बीज है, ररो ममो दोइ अंक।
दरिया तन मन अर्प के, पीछे होय निसंक ॥१२॥
जन दरिया गुरदेव जी, सब बिधि दई बताय।
जो चाहो निज धाम को, सो साँस उसाँसो ध्याय ॥१३॥
जन दरिया सतगुर मिला, कोई पुरबले पुन्न।
जडु पलट चेतन किया, आन मिलाया सुन्न ॥१४॥
दरिया सतगुर सब्द सौं, गत मत पलटै अंग।
कर्म काल मन का मिटा, हरि भज भये सुरंग ॥१५॥
नहिं था राम रहीम का, मैं मतहीन अजान।
दरिया सुध बुध ज्ञान दे, सतगुर किया सुजान ॥१६॥
सोता था बहु जन्म का, सतगुर दिया जगाय।
जन दरिया गुरु सब्द सौं, सब दुख गये बिलाय ॥१७॥
सतगुर सब्दाँ मिट गया, दरिया संसय सोग।
औषद दे हरि नाम का, तन मन किया निरोग ॥१८॥
दरिया सतगुर कृपा करि, सब्द लगाया एक।
लागतही चेतन भया, नेत्तर खुला अनेक ॥१६॥
दरिया गुरु पूरा मिला, नाम दिखाया नूर।
निसा¹ भई सुख उपजा, किया निसाना दूर ॥२०॥
रंजी² सास्तर ज्ञान की, अंग रही लिपटाय।
सतगुर एकहि सब्द से, दीन्ही तुरत उड़ाय ॥२१॥
सब्द गहा सुख उपजा, गया अंदेसा मोहि।
सतगुर ने किरपा करी, खिड़की दीनी खोहि³ ॥२२॥
(१) तसल्ली। (२) रज। (३) खोल।
जैसे सतगुर तुम करी, मुझ से कछू न होय ।
बिष भाँड़े बिष काढ़ कर, दिया अमीरस मोय ॥२३॥
गुरु आये घन गरज कर, अंतर कृपा उपाय ।
तपता से सीतल किया, सोता लिया जगाय ॥२४॥
गुरु आये घन गरज कर, सब्द किया परकास ।
बीज पड़ा था भूमि में, भई फूल फल आस ॥२५॥
गुरु आये घन गरज कर, करम कड़ी सब खेर१ ।
भरम बीज सब भूनिया, ऊग न सक्के फेर ॥२६॥
साध सुधारै सिष्य को, दे दे अपना अंग ।
दरिया संगत कीट की, पलटि सो भया भिरंग ॥२७॥
यह दरिया की बीनती, तुम सेती महराज ।
तुम भृंगी मैं कीट हूँ, मेरी तुमको लाज ॥२८॥
बिख छुड़ावैं चाह कर, अमृत देवैं हाथ ।
जन दरिया नित कीजिये, उन संतन को साथ ॥२९॥
उन संतन के साथ से, जिवड़ा पावै जख२ ।
दरिया ऐसे साध के, चित चरनों ही रख ॥३०॥
बाड़ी में है नागरी३, पान देसांतर जाय ।
जो वहँ सूखै बेलड़ी, तौ पान वहाँ बिनसाय ॥३१॥
पान बेल से बीछुड़ै, परदेसाँ रस देत ।
जन दरिया हरिया रहै, उस हरी बेल के हेत ॥३२॥
कुंभी४ परदेसों फिरै, अंड धरै घर माहिं ।
निस दिन राखै हेत में, ता सों बिनसै नाहिं ॥३३॥
अलल५ अंड को डाल दे, अंतर राखै हेत ।
पाक६ फूट पर पक होवै, (जब) खैंच आप दिस लेत ॥३४॥
(१) मिटाकर । (२) चैन । (३) नागर वेल । (४) एक चिड़िया का नाम (कुंज) ।
(५) एक चिड़िया का नाम (अलल पच्छ) । (६) पक कर ।
४ दरिया साहब मारवाड़
अलल बसै आकास में, नीची सुरत निवास।
ऐसे साधू जगत में, सुरत सिखर पिउ पास ॥३५॥
कोयल आले मूढ़१ के, घरै आपना अंड।
निस दिन राखै हेत में, तिन से पड़ै न खंड ॥३६॥
मूढ़ काग समझै नहीं, मोह माया सेवै।
चून चुगावै कोयली, अपना कर लेवै ॥३७॥
चौमासे ऋतु जान कर, पिरथी को जल देत।
कबहूं आवै ऋतु बिना, उस चात्रिक के हेत ॥३८॥
घरहर बरषै आय कर, देख पपीहा चाव।
जिम दरिया सतगुर चवै२, देख माँहिला३ आव ॥३९॥
महा प्रताप सिर पर तपै, किरपा रस पीऊँ।
दरिया बच्चा कच्छ गुरु, जोये ही४ जीऊँ ॥४०॥
जन दरिया गुरदेव जी, ऐसे किया निहाल।
जैसे सूखी बेलड़ी, बरस किया हरियाल ॥४१॥
सतगुर सा दाता नहीं, नहिं नाम सरीखा५ देव।
सिष सुमिरन साँचा करै, हो जाय अलख अभेव ॥४२॥
जन दरिया सतगुर करी, राम नाम की रीझ।
अमृत वूठा६ सब्द का, ऊगा पूरब बीज ॥४३॥
सतगुर वरषै सब्द जल, पर उपकार बिचारि।
दरिया सूखी अवनि७ पर, रहै निवाना८ बारि९ ॥४४॥
सतगुर के इक रोम पर, वारूं बेर अनंत।
अमृत ले मुख में दियो, राम नाम निज तंत ॥४५॥
सतगुर वृक्ष समान हैं, फल से प्रीत न कोय।
फल तरु से लागो रहै, रस पी परिपक होय ॥४६॥
(१) कौवा। (२) वरषा करते हैं। (३) अंतर का। (४) ध्यान रखने से। (५) बराबर।
(६) वरषा। (७) पृथवी। (८) कुवा या बावड़ी। (९) पानी।
सुमरिन का अङ्ग
सतगुर पारस की कनी, दीरग दीखै नाहिं ।
जन दरिया षट दरब धन, सब आया उन माहिं ॥४७॥
मीन तड़पती जल बिना, (तेहि) सागर माहिं समाय ।
जन दरिया ऐसी करी, गुरु किरपा मोहिं आय ॥४८॥
भवजल बहता जात था, संसय मोह की बाढ़ ।
दुरिया मोहिं गुरु कृपा कर, पकड़ बाँह लिया काढ़ ॥४६॥
सुमिरन का अंग
राम भजै गुर सब्द ले, तौ पलटै मन देह ।
दरिया छाना¹ क्यों रहै, भू पर बूठा² मेंह ॥१॥
दरिया नाम है निरमला, पूरन ब्रह्म अगाध ।
कहे सुने सुख ना लहै, सुमिरे पावै स्वाद ॥२॥
दरिया सुमिरै राम को, करम भरम सब खोय ।
पूरा गुरु सिर पर तपै, बिघन न लागै कोय ॥३॥
दरिया सुमिरै राम को, कर्म भर्म सब चूर ।
निस तारा सहजै मिटै, जो ऊगै निर्मल सूर ॥४॥
राम बिना फीका लगै, सब किरिया सास्तर ज्ञान ।
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान ॥५॥
दरिया सूरज ऊगिया, नैन खुला भरपूर ।
जिन अंधे देखा नहीं, उनसे साहब दूर ॥६॥
दरिया सूरज ऊगिया, चहुं दिस भया उजास ।
नाम प्रकासै देह में, तौ सकल भरम का नास ॥७॥
आन धरम दीपक जिसा, भरमत होय बिनास ।
दरिया दीपक क्या करै, आगे रवि परकास ॥८॥
दरिया सुमिरै राम को, दूजी आस निवार ।
एक आस लागा रहै, तो कधी न आवै हार ॥६॥
६ दरिया साहब मारवाड़ि
दरिया नर तन पाय कर, कीया चाहै काज ।
राव रंक दोनों तरैं, जो बैठे नाम जहाज ॥१०॥
नाम जहाज बैठे नहीं, आन करै सिर भार ।
दरिया निश्चय बहेंगे, चौरासी की धार ॥११॥
जन्म अकारथ नाम बिन, आवै जान अजान ।
जन्म मरन जम काल की, मिटै न खैंचा तान ॥१२॥
मुसलमान हिंदू कहा, षट दरसन रंक राव ।
जन दरिया निज नाम बिन, सब पर जम का दाव ॥१३॥
सुर्ग मिर्त पाताल कह, कह तीन लोक बिस्तार ।
जन दरिया निज नाम बिन, सभी काल को चार१ ॥१४॥
दरिया नर तन पाय कर, किया न राम उचार ।
बोझ उतारन आइया, सो लिये चले सिर भार ॥१५॥
जो कोइ साधू गृही में, माहिं राम भरपूर ।
दरिया कह उस दास की, मैं चरनन की धूर ॥१६॥
बाहर बाना भेष का, माहिं राम का राज ।
कह दरिया वे साधवा, हैं मेरे सिर का ताज ॥१७॥
राम सुमिर रामहिं मिला, सो मेरे सिर का मौर ।
दरिया भेष विचारिये, खैर मौर को ठौर ॥१८॥
दरिया सुमिरै राम को, कोटि कर्म की हान ।
जम और काल का भय मिटै, ना काहू की कान ॥१६॥
दरिया सुमिरै राम को, आतम को आधार ।
काया काँची काँच सी, कंचन होत न वार ॥२०॥
दरिया राम सँभालते, काया कंचन सार ।
ज्ञान धर्म और भर्म सब, डाला सिर से भार ॥२१॥
(१) चारा ।
सुमिरन का अङ्ग
दरिया सुमिरै राम को, सहज तिमिर का नास।
घट भीतर होय चाँदना, परम जोति परकास ॥२२॥
सतगुर संग न संचरा, राम नाम उर नाहिं।
ते घट मरघट सारिखा, भूत बसै ता माहिं ॥२३॥
राम नाम ध्याया नहीं, हुआ बहुत अकाज।
दरिया काया नगर में, पंच भूत का राज ॥२४॥
पंच भूत के राज में, सब जग लागा धुंध।
जन दरिया सतगुर बिना, मिल रहा अंधा अंध ॥२५॥
सब जग अंधा राम बिन, सूझि न काज अकाज।
राव रंक अंधा सबै, अंधों ही का राज ॥२६॥
दरिया सब जग आँधरा, सूझै सो बेकाम।
सूझा तबही जानिये, ता को दरसै राम ॥२७॥
मन बच काया समेट कर, सुमिरै आतम राम।
दरिया नेड़ा नीपजै१, जाय बसै निज धाम ॥२८॥
सकल ग्रंथ का अर्थ है, सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का, कर लीजै दिन रात ॥२६॥
ध्रू लोक ध्रू राम कह, कहै पताला सेस।
दरिया परघट नाम बिन, कहु कौन आयो देख ॥३०॥
लोह पलट कंचन भया, कर पारस को संग।
दरिया परसै नाम को, सहजहिं पलटै अंग ॥३१॥
अपने अपने इष्ट में, राच रहा सब कोय।
दरिया रत्ता राम सूं, साधसिरोमन सोय ॥३२॥
दरिया धन वे साधवा, रहें राम लौ लाय।
राम नाम बिन जीव सो, काल निरंतर खाय ॥३३॥
(१) पैदा हो।
८ दरिया साहब मारवाड़
दरिया काया कारवी १, मौसर है दिन चार ।
जब लग साँस सरीर में, तब लग राम सँभार ॥३४॥
राम नाम रसना रटै, भीतर सुमिरै मन ।
दरिया ये गत साध की, पाया नाम रतन ॥३५॥
दरिया दूजे धर्म से, संसय मिटै न सूल ।
राम नाम रटता रहै, सर्व धर्म का मूल ॥३६॥
लख चौरासी भुगत कर, मानुष देह पाई ।
राम नाम ध्याया नहीं, तो चौरासी आई ॥३७॥
दरिया नाके नाम के, बिरला आवै कोय ।
जो आवै तो परम पद, आवागवन न होय ॥३८॥
दरिया राम अगाध है, आतम का आधार ।
सुमिरत ही सुख उपजै, सहजहि मिटै बिकार ॥३६॥
दरिया राम संभालता, देख किता गुन होय ।
आवागवन का दुख मिटै, ब्रह्म परायन सोय ॥४०॥
मरना है रहना नहीं, जा में फेर न सार ।
जन दरिया भय मान कर, आपन राम सँभार ॥४१॥
कहा कोई बन बन फिरै, कहा लियाँ कोइ फौज ।
जन दरिया निज नाम बिन, दिन दस मन की मौज ॥४२॥
दरिया आतम मल भरा, कैसे निर्मल होय ।
सावन लावै प्रेम का, राम नाम जल धोय ॥४३॥
दरिया इस संसार में, सुखी एक है संत ।
पिये सुधारस प्रेम से, राम नाम निज तंत ॥४४॥
राम नाम निस दिन रटै, दूजा नाहीं दाँय ।
दरिया ऐसे साध की, मैं बलिहारी जाँय ॥४५॥
(१) कूँडी ।
बिरह का अंग ९
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल ।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल ॥४६॥
दरिया सुमिरन राम का, कीमत लखै न कोय !
टुक इक घट में संचरै, पाव बस्तु मन होय ॥४७॥
दरिया सुमिरै राम कां, साकित नाहिं सुहात ।
बीज चमकै गगन में, गधिया बावै१ लात ॥४८॥
फिरी दुहाई सहर में, चोर गये सब भाज ।
सत्रू फिर मित्रज भया, हुआ राम का राज ॥४९॥
जो कुछ थी सोही बनी, मिट गइ खेंचा तान ।
चोर पलट कर साह भै, फिरी राम की आन ॥५०॥
बिरह का अंग
दरिया हर किरपा करी, बिरहा दिया पठाय ।
यह बिरहा मेरे साध को, सोता लिया जगाय ॥१॥
बिरह बियापी देह में, किया निरंतर बास ।
तालावेली जीव में, सिसके साँस उसाँस ॥२॥
कहा हाल तेरे दास का, निस दिन दुख में जाहि ।
पिव सेती परचो नहीं, बिरह सतावै माँहि ॥२॥
दरिया बिरही साध का, तन पीला मन सूख ।
रैन न आवै नींदड़ी, दिवस न लागै भूख ॥३॥
बिरहन पिउ के कारने, ढूँढ़न बन खंड जाय ।
निस बीती पिउ ना मिला, दरद रहा लिपटाय ॥५॥
बिरहन का घर बिरह में, ता घट लोहु न मास ।
अपने साहब कारने, सिसके साँसो साँस ॥६॥
(१) चलावै ।
प्रथम भाग: साखी संग्रह (नाम, गुरु व चेतावनी अंग)
१० दरिया साहब मारवाड़
सूर का अंग
इष्टी स्वाँगी बहु मिले, हिरसी मिले अनंत।
दरिया ऐसा ना मिला, राम रता कोइ संत ॥१॥
पंडित ज्ञानी बहु मिले, बेद ज्ञान परबीन।
दरिया ऐसा ना मिला, राम नाम लवलीन ॥२॥
बक्ता स्रोता बहु मिले, करते खैंचा तान !
दरिया ऐसा ना मिला, जो सन्मुख झेले बान ॥३॥
दरिया बान गुरदेव का, बेधै भरम बिकार।
बाहर घाव दीखै नहीं, भीतर भया सिमार¹ ॥४॥
दरिया बान गुरदेव का, कोइ झेलै सूर सधीर।
लागत ही ब्यापै सही, रोम रोम में पीर ॥५॥
सोई घाव तन पर लगै, उठ्ठ सँभालै साज।
चोट सहारे सब्द की, सो सूरा सिरताज ॥६॥
चोट सहै उर सेल की, मुख ज्यों का त्यों नूर।
चोट सहारै सब्द की, दरिया साँचा सूर ॥७॥
दरिया सूरा गुरमुखी, सहै सब्द का घाव।
लागत ही सुध बीसरे, भूलै आन सुभाव ॥८॥
दरिया साँचा सूरमा, सहै सब्द की चोट।
लागत ही भाजै भरम, निकस जाय सब खोट ॥६॥
दरिया सस्तर बाँध कर, बहुत कहावैं सूर।
सूरा तब ही जानिये, अनी² मिले मुख नूर ॥१०॥
सबहि कटक³ सूरा नहीं, कटक माहिं कोइ सूर।
दरिया पड़े पतंग ज्यों, जब बाजै रन तूर ॥११॥
पड़ै पतंगा अगिन में, देह की नाहिं सँभाल।
दरिया सिप सतगुर मिलै, तो हो जाय निहाल ॥१२॥
(१) मिस्मार, चकनाचूर। (२) नोक, घाव। (३) फ़ौज।
९१
सूर का अंग
भया उजाला गैब का, दैड़े देख पतंग ।
दरिया आपा मेटकर, मिले अगिन के रंग ॥१३॥
दरिया प्रेमी आत्मा, आवै सतगुर संग ।
सतगुर सेती सब्द ले, मिलै सब्द के रंग ॥१४॥
दरिया प्रेमी आत्मा, राम नाम धन पाया ।
निरधन था धनवँत हुवा, भूला घर आया ॥१५॥
सूरा खेत बुहारिया, सतगुर के बिस्वास ।
सिर ले सौंपा राम को, नहिं जीवन की आस ॥१६॥
दरिया खेत बुहारिया, चढ़ा दई की गोद ।
कायर काँपै खड़बड़ै, सूरा के मन मोद ॥१७॥
सूर बीर साँची दसा, भीतर साँचा सूत ।
पूठ¹ फिरै नहिं मुख मुड़ै, राम तना रजपूत ॥१८॥
साध सूर का एक अँग, मना न भावै झूठ ।
साध न छाँड़ै राम को, रन में फिरै न पूठ ॥१९॥
सूर बीर की सभा में, कायर बैठे आय ।
सूरातन आवै नहीं, कोटि भाँति समुझाय ॥२०॥
सूर बीर की सभा में, जो कोइ बैठे सूर ।
सुनत बात सुख ऊपजै, चढ़ै सवाया नूर ॥२१॥
आगे बढ़ै फिरै नहीं, यह सूरा की रीत ।
तन मन अरपै राम को, सदा रहै अघ जीत ॥२२॥
सूर न जानै कायरी, सूरातन से हेत ।
पुरजा पुरजा हो पड़ै, तहू न छाँड़ै खेत ॥२३॥
सूर सदा है सनमुखी, मन में नाहीं संक ।
आपा अरपै राम को, तो बाल न होवै बंक ॥२४॥
(१) पीठ ।
१५ दरिया साहब मारवाड़
सूर बीर साँची दसा, कबहु न मानै हार ।
अनी मिलै आगे धसै, सनमुख झेलै सार१ ॥२५॥
सूरा के सिर साम२ है, साधों के सिर राम ।
दूजी दिस ताकैं नहीं, पड़ै जो कड़ड़ा काम ॥२६॥
सूर चढ़ै संग्राम को, मन में संक न कोय ।
आपा अरपै राम को, मन में संक न कोय ॥२७॥
सूरा खेत बुहारिया, भरम मनी कर चूर ।
आय बिराजा राम जी, दुर्जन भाजा दूर ॥२८॥
पीछे पाँव धरै नहीं, सूरा बड़ा सुभाव ।
हूँ करिया आगे धसै, कायर खेलै दाँव ॥२६॥
साध सुरग चाहै नहीं, नरकाँ दिस नहिं जाय ।
पारब्रह्म के पार लग, पटा गैब का खाय ॥३०॥
पटा पत्रड़िया३ ना लहै, पटा लहै कोइ सूर ।
साखियाँ साहब ना मिलै, भजन किये भरपूर ॥३१॥
दरिया सुमिरन राम का, सूराँ हंदा साज ।
आगे पीछे होय नहीं, वाहि धनी की लाज ॥३२॥
दरिया सो सूरा नहीं, जिन देह करी चकचूर ।
मन को जीत खड़ा रहै, मैं बलिहारी सूर ॥३३॥
सिंधु४ बजा सूरा भिड़ा, बिरद५ वखानै भाट ।
हला मेरु६ धूजी धरा, खुली सुरग की बाट ॥३४॥
बाट खुली जब जानिये, अंतर भया उजास ।
जो कुछ थी सो ही बनी, पूरी मन की आस ॥३५॥
दरिया साँचा सूरमा, अरि दल७ घालै चूर ।
राज घरपिया८ राम का, नगर बसा भरपूर ॥३६॥
(१) लोहा । (२) हथियार का नाम । (३) दरबान । (४) फौजी बाजा । (५) तारीफ ।
(६) पहाड़ । (७) दुश्मन की फौज । (८) थापा ।
किया ब्रह्म में बास ॥३७॥-> wait:जीवन मरन थित मेटकर, किया ब्रह्म में बास ॥३७॥`
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कायागढ़ ऊपर चढ़ा, परसा पद निर्बान । -
ब्रह्म राज निरभय भया, अनहद घुरा निसान ॥३८॥ -
Separator / Section Heading:
- There is a small decorative line under L5: between L5 and L6. Usually we don't transcribe the decorative rule, or just omit it.
नाद परचे का अंग(orनाद परचे का अंग) - wait, there is a dot to the right: no, that's just a speck. Text isनाद परचे का अंग.
-
Verses 1 to 10:
- Verse 1:
दरिया सुमिरै राम को, आठ पहर आराध ।रसना में रस उपजे, मिसरी के से स्वाद ॥१॥
- Verse 2:
रसना सेती ऊतरा, हिरदे कीया बास ।दरिया बरषा प्रेम की, षट ऋतु बारह मास ॥२॥
- Verse 3:
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- Verse 1:
१४ दरिया साहब मारवाड़
दरिया मेरु उलंघ कर, पहुँचा त्रिकुटी सन्ध ।
दुख भाजा सुख ऊपजा, मिटा भर्म का धुन्ध ॥११॥
अनंतहि चंश ऊगिया, सूर्य कोटि परकास ।
बिन बादल बरषा घनी, छह ऋतु बारह मास ॥१२॥
बंक नाल की सुध गहै, कोइ पहुँचै बिरला सन्त ।
अमी फिरै जोत झिलमिलै, नौबत घुरै अनन्त ॥१३॥
दरिया मन परमन भया, बैठा त्रिकुटी छाजै ।
अमी फिरै बिगसै कँवल, अनहद धुन गाजै ॥१४॥
दरिया त्रिकुटी सन्ध में, मन ध्यान धरै कर धीर ।
अवस चलत है सुषमना, चलत प्रेम की सीर ॥१५॥
चलै सुरसरी१ अगम की, हिरदे मंझ समाय ।
जन दरिया वा सुषमना, रोम रोम हो जाय ॥१६॥
दरिया नाद प्रकासिया, सो छबि कही न जाय ।
धन्य धन्य वे साधवा, वहाँ रहे लौ लाय ॥१७॥
दरिया नाद प्रकासिया, पूरी मन की आस ।
घन बरसै गाजै गगन, तेज पुंज परकास ॥१८॥
दरिया नाद प्रकासिया, [तहँ] किया निरंतर बास ।
पारब्रह्म परसा सही, जहँ दरसन पावै दास ॥१९॥
जन दरिया जाय गगन में, परसा देव अनाद ।
असुध बीसरी सुध भई, मिटिया वाद विवाद ॥२०॥
घुरै नगारा गगन में, बाजै अनहद तूर ।
जन दरिया जहँ थिति रची, निस दिन बरसै नूर ॥२१॥
जन दरिया जाय गगन में, किया सुधा रस पान ।
गंग बहै जहँ अगम की, जाय किया असनान ॥२२॥
(१) गंगा ।
नाद परचे का अङ्ग १५
अमी भरत बिगसत कँवल, उपजत अनुभव ज्ञान।
जन दरिया उस देस का, भिन भिन करत बखान ॥२३॥
सुरत गगन में बैठ कर, पति का ध्यान सँजोय।
नाड़ि नाड़ि रूँ रूँ बिषे१, ररंकार धुन होय ॥२४॥
बिन पावक पावक जलै, बिन सूरज परकास।
चाँद बिना जहँ चाँदना, जन दरिया का बास ॥२५॥
नौबत बाजै गगन में, बिन बादल घन गाज।
महल बिराजैं परम गुरु, दरिया के महराज ॥२६॥
कंचन का गिर देख कर, लोभी भया उदास।
जन दरिया थाके बनिज, पूरी मन की आस ॥२७॥
ब्रह्म अगिन ऊपर जलै, चलत प्रेम की बाय।
दरिया सीतल आतमा, [जाका] कर्म कंद२ जल जाय ॥२८॥
कहा कहै किरपा करी, कहै रहै कोइ रूठ।
जन दरिया बानक३ बना, राम ठपोरी पीठ४ ॥२६॥
दरिया त्रिकुटी महल में, भई उदासी मोय।
जहँ सुख है तहँ दुख सही, रबि जहँ रजनी होय ॥३०॥
दरिया मन रंजन कहे, सुखी होत सब कोय।
मीठे औगुन ऊपजै, कडुवा से गुन होय ॥३१॥
मीठे राचै लोग सब, मींठे उपजै रोग।
निरगुन कडुवा नीम सा, दरिया दुर्लभ जोग ॥३२॥
त्रिकुटी के मँझ बहत है, सुख की सलिता जोर।
जन दरिया सुख दुख परे, वह कोइदेस जो और ॥३३॥
त्रिकुटी माहीं सुख घना, नाहीं दुख का लेस।
जन दरिया सुख दुख नहीं, वह कोइ अनुभव देस ॥३४॥
(१) में। (२) पुत्ती, जड़। (३) संजोग। (४) पीठ ठोका।
१६ दरिया साहब मारवाड़
ब्रह्म परचे का अंग
दरिया त्रिकुटी संधि में, महा जुद्ध रन पूर।
कायर जन पूठा फिरै, सुन पहुँचै कोइ सूर ॥१॥
दरिया मेरु उलंघिया, त्रिकुटी बैठा जाय।
जो वहँ से पूठा फिरै, तो विषयों का रस खाय ॥२॥
दरिया मन निज मन अया, त्रिकुटी मंझ समाय।
जो वहँ से पाछे फिरै, तो मन कामन हो जाय ॥३॥
दरिया देखे दोय पख, त्रिकुटी संधि मँझार।
निराकार एकै दिसा, एकै दिसा आकार ॥४॥
निराकार आकार बिच, दरिया त्रिकुटी संधि।
परे अस्थान जो सुरत का, उरे सो मन का बंध ॥५॥
मन बुध चित हंकार कीं, है त्रिकुटी लग दौड़।
जन दरिया इनके परे, ब्रह्म सुरत की ठौर ॥६॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें अपनी हद माहिं।
आगे पूरन ब्रह्म है, सो इनकी गम नाहिं ॥७॥
मन बुध चित हंकार के, सुरत सिरोमन जान।
ब्रह्म सरोवर सुरत के, दरिया संत प्रमान ॥८॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें सुरत के माहिं।
सुरत मिली जाय ब्रह्म में, जहँ कोइ दूजा नाहिं ॥९॥
मन मेरू१ से वावडै़२, त्रिकुटी लग ओंकार।
जन दरिया इनके परे, ररंकार निरधार ॥१०॥
दरिया त्रिकुटी हद लग, कोइ पहुँचै संत सयान।
आगे अनहद ब्रह्म है, निराधार निरवान ॥११॥
दरिया त्रिकुटी के परे, अनहद ब्रह्म अलेख।
जहाँ सुरत गैली३ भई, अनुभव पद को देख ॥१२॥
(१) पहाड़। (२) लौट आवे। (३) हैरान।
ब्रह्म परचे का अंग १७
रतन अमोलक परख कर, रहा जौहरी थाक।
दरिया तहँ कीमत नहीं, उनमुन भया अबाक१ ॥१३॥
इड़ा पिंगला सुषमना, त्रिकुटी सन्धि मँझार।
दरिया पूरन ब्रह्म के, यह भी उल्ली वार ॥१४॥
सुरत उलट आठों पहर, करत ब्रह्म आराध।
दरिया तबही देखिये, लागी सुन्न समाध ॥१५॥
सुरत ब्रह्म का ध्यान धर, जाय ब्रह्म में पर्स।
जन दरिया जहँ एकमा, दिवस एक सौ बर्स ॥१६॥
ररंकार धुन हौद में, गर्क२ भया कोइ दास।
जन दरिया व्यापै नहीं, नींद भूख और प्यास ॥१७॥
जन दरिया आकास लग, ओंकार का राज।
महासुन्न तिस के परे, ररंकार महराज ॥१८॥
दरिया सुरति सिरोमनी, मिलि ब्रह्म सरोवर जाय।
जहाँ तीनों पहुँचै नहीं, मनसा बाचा काय ॥१६॥
काया अगोचर मन्न अगोचर, सब्द अगोचर सोय।
जन दरिया लवलीन होय, पहुँवैगा जन कोय ॥२०॥
धरती गगन पवन नहिं पानी, पावक चंद न सूर।
रात दिवस की गम नहीं, जहाँ ब्रह्म रहा भरपूर ॥२१॥
ररंकार सतगुर बरम्ह, दरिया चेला सुर्त।
जैसे मिल तैसा भया, ज्यों संचे३ माहीं भर्त्त४ ॥२२॥
दरिया सूरति सर्पनी, चढ़ी ब्रह्म के माँथ।
जाय मिली परब्रह्म से, निरभय रही समाय ॥२३॥
दरिया देखत ब्रह्म को, सुरत भई भयभीत।
तेज पुंज रवि अगिन बिन, जहाँ कोइ उष्ण न सीत ॥२४॥
(१) चुप। (२) डूब जाना। (३) साँचा। (४) ताँवा और सीसा से मिल कर बनी हुई धात।
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