वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ९ ] अध्याय १ ११९
सूत्र ९ ] अध्याय १ ११९
ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके॥ १। ४ । ९॥
तु=निश्चय ही; ज्योतिरुपक्रमा=यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध
तत्त्वोंकी कारणभूता परमेश्वरकी शक्तिका वाचक है; हि=क्योंकि;
एके=एक शाखावाले; तथा=ऐसा ही; अधीयते=अध्ययन (वर्णन) करते हैं।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। ३, ४)-में परमेश्वरसे उत्पन्न
तेज आदि तत्त्वोंसे जगत्के विस्तारका वर्णन है। अतः यहाँ यही मानना
ठीक है कि उनकी कारणभूता परमेश्वर-शक्तिको ही 'अजा' कहा गया
है। छान्दोग्यमें बताया गया है कि 'उस परमेश्वरने विचार किया; 'मैं बहुत
हो जाऊँ।' फिर उसने तेजको रचा, तत्पश्चात् तेजसे जल और जलसे
अन्नकी उत्पत्ति कही गयी है। इसके बाद इनके तीन रूपोंका वर्णन है।
अग्निमें जो लाल रंग है, वह तेजका है, जो सफेद रंग है, वह जलका
है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथिवी)-का है।' इस प्रकार प्रत्येक
वस्तुमें उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंकी व्यापकताका वर्णन है (छा० उ०
६। ४। १ से ७ तक)। इसी तरह श्वेताश्वतरोपनिषद्में जो 'अजा' के
तीन रंग बताये गये हैं, वे भी तेज आदिमें उपलब्ध होते हैं। अतः निश्चित
रूपसे यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अजाके नामसे प्रधानका ही वर्णन
है। यदि प्रकृति या प्रधानका वर्णन मान लिया जाय तो भी यही मानना
होगा कि वह उस परब्रह्मके अधीन रहनेवाली उसीकी अभिन्न शक्ति है,
जो उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंका भी कारण है। सांख्यशास्त्रोक्त
प्रधानका वहाँ वर्णन नहीं है, क्योंकि श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १०)-
में जहाँ उसका 'प्रधान' के नामसे वर्णन हुआ है, वहाँ भी उसको
स्वतन्त्र नहीं माना है। अपितु क्षर-प्रधान अर्थात् भगवान्की शक्तिरूप
अपरा प्रकृति, अक्षर-जीवात्मा अर्थात् भगवान्की परा प्रकृति-इन
दोनोंको शासन करनेवाला उस परम पुरुष परमेश्वरको बताया है।* फिर
- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०)
१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
आगे चलकर स्पष्ट कर दिया है कि भोक्ता (अक्षरतत्त्व), भोग्य (क्षरतत्त्व)
और उन दोनोंका प्रेरक ईश्वर—इन तीनों रूपोंमें ब्रह्म ही बताया गया है।*
अतः ‘अजा’ शब्दका पर्याय ‘प्रधान’ होनेपर भी वह सांख्यशास्त्रोक्त ‘प्रधान’
नहीं है। अपितु परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति है।
सम्बन्ध—‘‘अनादि ईश्वर-शक्तिको यहाँ ‘अजा’ कहा गया है; यह
बात कैसे मानी जा सकती है; क्योंकि वह तो रूप आदिसे रहित है और
यहाँ अजाके लाल, सफेद और काला—ये तीन रंगके रूप बताये गये हैं?’’
ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १। ४। १० ॥
कल्पनोपदेशात् = जहाँ ‘अजा’ का रूपक मानकर उसके त्रिविध
रूपकी कल्पनापूर्वक उपदेश किया गया है, इसलिये; च = भी;
मध्वादिवत् = मधु आदिकी भाँति; अविरोधः = कोई विरोध नहीं है।
व्याख्या—जैसे छान्दोग्य० (३।१)-में रूपककी कल्पना करते
हुए, जो वास्तवमें मधु नहीं, उस सूर्यको मधु कहा गया है।
बृहदारण्यकमें वाणीको; धेनु न होनेपर भी धेनु कहा गया है (बृह०
उ० ९। ८। १), तथा द्युलोक आदिको अग्नि बताया गया है (बृह०
उ० ६। २। ९)। इसी प्रकार यहाँ भी रूपककी कल्पनामें भगवान्की
शक्तिभूता प्रकृतिको ‘अजा’ नाम देकर उसके लाल, सफेद और काले
तीन रंग बताये गये हैं; इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिज्ञासुको
समझानेके लिये रूपककी कल्पना करके वर्णन करना उचित ही है।
सम्बन्ध—‘‘पूर्व प्रकरणमें यह बात सिद्ध की गयी कि श्रुतिमें आया
हुआ ‘अजा’ शब्द सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका वाचक नहीं,
परब्रह्म परमात्माकी स्वरूपभूता अनादि शक्तिका वाचक है। किंतु
दूसरी श्रुतिमें ‘पंचपंच’ यह संख्यावाचक शब्द पाया जाता है। इससे
यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वोंका ही समर्थन किया
- भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥ (श्वेता० १। १२)
गया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्यसम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक
क्यों न माना जाय?' इस शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १। ४। ११॥
संख्योपसंग्रहात् =(श्रुतिमें) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह
(सांख्यमतोक्त तत्त्वोंकी) गणना नहीं है; नानाभावात्=क्योंकि वह
संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा;
अतिरेकात्=(वहाँ) उससे अधिकका भी वर्णन है।
व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है कि—
यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः।
तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥
(४। ४। १७)
'जिसमें पाँच पंचजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको
मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'-इस मन्त्रमें जो
संख्यावाचक 'पंच-पंच' शब्द आये हैं, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी
कल्पना करना उचित नहीं है; क्योंकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे-
दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पंच-पंच' से पचीस
संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमें वर्णित आकाश और आत्माको लेकर
सत्ताईस तत्त्व होते हैं; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते
हैं। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमें न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान'
का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोंका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्में
'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया
गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा परमेश्वरकी
विभिन्न कार्य-शक्तियोंका वर्णन है।
सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका
ग्रहण होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—