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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९
है, इसलिये; च=तथा; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अपि=भी; (यही सिद्ध
होता है कि) अंशः=जीव ईश्वरका अंश है; एके=क्योंकि एक शाखावाले;
दाशकितवादित्वम्=ब्रह्मको दाशकितव आदिरूप कहकर; अधीयते=अध्ययन
करते हैं।
व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १२-१३)-में कहा है कि-
एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
'बहुत-से निष्क्रिय जीवोंपर शासन करनेवाला जो एक परमेश्वर एक
बीज (अपनी प्रकृति)-को अनेक प्रकारसे विस्तृत करता है, उस अपने
हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानीजन निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा
रहनेवाला सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं। जो एक नित्य चेतन परब्रह्म
परमेश्वर बहुत-से नित्य चेतन जीवोंके कर्मफलभोगोंका विधान करता है,
वही सबका कारण है, उस ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य
परमदेव परमेश्वरको जानकर जीवात्मा समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।'
इस प्रकार श्रुतिमें जीवोंके नानात्वका प्रतिपादन किया गया है;
साथ ही उसको नित्य और चेतन भी कहा गया है और ईश्वरको जगत्का
कारण बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके
अंश हैं। केवल इतनेसे ही नहीं, प्रकारान्तरसे भी जीवगण ईश्वरके
अंश सिद्ध होते हैं; क्योंकि अथर्ववेदकी शाखावालोंके ब्रह्मसूक्तमें यह
पाठ है कि 'ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' अर्थात् 'ये
केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा ये जुआरी भी ब्रह्म ही हैं।' इस
प्रकार जीवोंके बहुत्व और ब्रह्मरूपताका भी वर्णन होनेसे यही सिद्ध
होता है कि जीव ईश्वरके अंश हैं। यदि जीवोंको परमेश्वरका अंश न
मानकर सर्वथा भिन्न तत्त्व माना जाय तो जो पूर्वोक्त श्रुतियोंमें ब्रह्मको

२४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

जगत्का एकमात्र कारण कहा गया है और उन दाश, कितवोंको ब्रह्म कहा
गया है, उस कथनमें विरोध आयेगा, इसलिये सर्वथा भिन्न तत्त्व नहीं माना
जा सकता। इसलिये अंश मानना ही युक्तिसंगत है, किंतु जिस प्रकार साकार
वस्तुके टुकड़ोंको उसका अंश कहा जाता है, वैसे जीवोंको ईश्वरका अंश
नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयवरहित अखण्ड परमेश्वरके खण्ड नहीं
हो सकते। अतएव कार्यकारणभावसे ही जीवोंको परमेश्वरका अंश मानना
उचित है तथा वह कार्यकारणभाव भी इसी रूपमें है कि प्रलयकालमें अव्यक्तरूपसे
परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहनेवाले नित्य और चेतन जीव, सृष्टिकालमें उसी
परमेश्वरसे प्रकट हो जाते हैं और पुनः संहारके समय उन्हींमें उन जीवोंका
लय होता है तथा उनके शरीरोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है।
यह बात श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार स्पष्ट की गयी है—
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
'हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण
भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं उस योनिमें चेतनरूप
बीजको स्थापित करता हूँ, उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति
होती है। तथा हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात्
शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृति तो गर्भको धारण
करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापित करनेवाला पिता हूँ।'
(गीता १४। ३-४)
इसलिये पिता और संतानकी भाँति जीवोंको ईश्वरका अंश मानना ही
शास्त्रके कथनानुसार ठीक मालूम होता है और ऐसा होनेसे जीव तथा ब्रह्मका
अभेद कहनेवाली श्रुतियोंकी भी सार्थकता हो जाती है।
सम्बन्ध—प्रमाणान्तरसे जीवके अंशत्वको सिद्ध करते हैं—