वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ १२९
सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ १२९
यही सिद्ध होता है कि बीचमें आया हुआ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन
भी उस परब्रह्म परमात्माको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये है।
सम्बन्ध - इसी विषयमें आश्मरथ्य आचार्यका मत उपस्थित करते हैं—
प्रतिज्ञासिद्धेर्लिंगमित्याश्मरथ्यः ॥ १ । ४ । २० ॥
लिंगम् = उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन,
ब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये हुआ है; प्रतिज्ञासिद्धेः = क्योंकि
ऐसा माननेसे ही पहले की हुई प्रतिज्ञाकी सिद्धि होती है; इति = ऐसा;
आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं।
व्याख्या - आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि अजातशत्रुने जो यह
प्रतिज्ञा की थी कि 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' — 'तुझे ब्रह्मका स्वरूप बताऊँगा।'
उसकी सिद्धि परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेसे हो सकती है,
इसलिये उस प्रसंगमें जो जीवात्मा तथा मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन
आया है, वह इसी बातको सिद्ध करनेके लिये है कि जगत्का कारण
परब्रह्म परमात्मा ही है।
सम्बन्ध - अब इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत दिया जाता है—
उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः ॥ १ । ४ । २१ ॥
उत्क्रमिष्यतः = शरीर छोड़कर परलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीका; एवं
भावात् = इस प्रकार ब्रह्ममें विलीन होना (दूसरी श्रुतिमें भी बताया
गया) है, इसलिये; (यहाँ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन परब्रह्मको
ही जगत्का कारण बतानेके लिये है;) इति = ऐसा; औडुलोमिः = औडुलोमि
आचार्य मानते हैं।
व्याख्या - जिस प्रकार इस प्रकरणमें सोते हुए मनुष्यके समस्त
प्राणोंसहित जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया गया है, इसी
प्रकार शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीकी गतिका वर्णन
करते हुए मुण्डकोपनिषद्में कहा गया है कि—
१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति॥
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
(३।२।७-८)
'ब्रह्मज्ञानी महापुरुषका जब देहपात होता है, तब पंद्रह कलाएँ और
सम्पूर्ण देवता अपने-अपने कारणभूत देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं,
फिर समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा ये सब-के-सब परम अविनाशी
ब्रह्ममें एक हो जाते हैं; जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको
छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं; वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नाम-
रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त
हो जाता है।'
इससे यह सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्य
प्राणका वर्णन हुआ है, वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण
केवल परब्रह्मको बतानेके लिये ही है। ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं।
सम्बन्ध—अब काशकृत्स्न आचार्यका मत उपस्थित करते हैं—
अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः॥ १।४।२२॥
अवस्थितेः=प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति उस परमात्मामें ही
होती है, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीव और मुख्य प्राणका वर्णन
परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है)। इति=ऐसा; काशकृत्स्नः=
काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं।
व्याख्या—काशकृत्स्न आचार्यका कहना है कि प्रलयकालमें सम्पूर्ण
जगत्की स्थिति परमात्मामें ही बतायी गयी है (प्र० उ० ४।११),* इससे
भी यही सिद्ध होता है कि उक्त प्रसंगमें जो सुषुप्तिकालमें प्राण और
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र।
सूत्र २३ ] अध्याय १ १३१
जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया है, वह परब्रह्मको जगत्का कारण
सिद्ध करनेके लिये ही है।
सम्बन्ध—‘‘वेदमें ‘शक्ति’ (श्वेता० ६।८), ‘अजा’ (श्वेता० १।९
तथा ४।५), ‘माया’ (श्वेता० ४।१०) तथा ‘प्रधान’ (श्वेता० १।१०)
आदि नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, उसीको ईश्वरकी अध्यक्षतामें
जगत्का कारण बताया गया है। गीता आदि स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन है
(गीता ९।१०)। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जगत्का निमित्त कारण
अर्थात् अधिष्ठाता, नियामक, संचालक तथा रचयिता तो अवश्य ही ईश्वर
है; परंतु उपादान कारण ‘प्रकृति’ तथा ‘माया’ नामसे कहा हुआ ‘प्रधान’ ही
है।‘’ ऐसा मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—
प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्॥ १।४।२३॥
प्रकृतिः=उपादान कारण; च=भी (ब्रह्म ही है); प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्=
क्योंकि ऐसा माननेसे ही श्रुतिमें आये हुए प्रतिज्ञा-वाक्य तथा दृष्टान्त-
वाक्य बाधित नहीं होंगे।
व्याख्या—श्वेतकेतुके उपाख्यानमें उसके पिताने श्वेतकेतुसे पूछा है
कि ‘उत तमादेशमप्राक्ष्यः॥ येनाश्रुतँ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्।’
(छा० उ० ६।१।२-३) अर्थात् ‘क्या तुमने अपने गुरुसे उस तत्त्वके
उपदेशके लिये भी जिज्ञासा की है, जिसके जाननेसे बिना सुना हुआ सुना
हुआ हो जाता है, बिना मनन किया हुआ मनन किया हुआ हो जाता है तथा
बिना जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है?’ यह सुनकर श्वेतकेतुने अपने
पितासे पूछा—‘भगवन्! वह उपदेश कैसा है?’ तब उसके पिताने दृष्टान्त
देकर समझाया—‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्यात्।’
(छा० उ० ६।१।४) अर्थात् ‘जिस प्रकार एक मिट्टीके ढेलेका तत्त्व जान
लेनेपर मिट्टीकी बनी सब वस्तु जानी हुई हो जाती है कि ‘यह सब मिट्टी है।’
इसके बाद आरुणिने इसी प्रकार सोने और लोहेका भी दृष्टान्त दिया है।
यहाँ पहले जो पिताने प्रश्न किया है, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है और