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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
नहीं बन सकता; क्योंकि एक क्षण पहले जो अनुभव करनेवाला था,
वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता। बहुत वर्षोंमें तो असंख्य क्षणोंके भीतर
असंख्य बार आत्माका परिवर्तन हो जायगा। अतः उक्त अनुस्मृति
होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि आत्मा क्षणिक नहीं, किंतु नित्य
है। इसीलिये बौद्धोंका क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है।
सम्बन्ध—बौद्धोंका यह कथन है कि 'जब बोया हुआ बीज स्वयं नष्ट
होता है, तभी उससे अंकुर उत्पन्न होता है। दूधको मिटाकर दही बनता है,
इसी प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' इस तरह
अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है। उनकी इस धारणाका खण्डन करनेके
लिये सूत्रकार कहते हैं—
नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २।२।२६ ॥
असतः=असत्‌से (कार्यकी उत्पत्ति); न=नहीं हो सकती;
अदृष्टत्वात्=क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया है।
व्याख्या—खरगोशके सींग, आकाशके फूल और वन्ध्या-पुत्र आदि
केवल वाणीसे ही कहे जाते हैं, वास्तवमें हैं नहीं; तथा आकाशमें नीलापन
और तिरवरे आदि बिना हुए ही प्रतीत होते हैं; ऐसे असत् पदार्थोंमें किसी
कार्यकी उत्पत्ति या सिद्धि नहीं देखी जाती है। उनसे विपरीत जो मिट्टी, जल
आदि सत् पदार्थ हैं, उनसे घट और बर्फ आदि कार्योंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष
देखी जाती है। इससे यही सिद्ध होता है कि जो वास्तवमें नहीं है, केवल
वाणीसे जिसका कथनमात्र होता है, अथवा जो बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है,
उससे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता।
किंतु रूपान्तरमात्र होता है; अतः जगत्‌का कारण सत् है और वह सर्वथा
सत्य है। इसलिये बौद्धोंकी उपर्युक्त मान्यता असंगत है।
सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने-
आप कार्य उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा
करते हैं—

सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १९३
उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥
च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार (बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी
उत्पत्ति) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन (कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा
न करनेवाले) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है।
व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमें किसी
नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने-
आप कार्य उत्पन्न हो जाता है,' तब तो जो लोग उदासीन रहते हैं, कार्य
आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य
भी पदार्थगत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परंतु ऐसा नहीं
देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब
विज्ञानवादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है।
विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्य पदार्थ
वास्तवमें कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस
मान्यताका खण्डन करते हैं—
नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥
अभावः=जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः=
क्योंकि उनकी उपलब्धि होती है।
व्याख्या—जाननेमें आनेवाले बाह्य पदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे
कारणरूपमें तथा कार्यरूपमें भी सदा ही सत्य हैं। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष
उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमें दीखनेवाली
नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती।
सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि
'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमें प्रतीत
होनेवाले तथा बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं
होते तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है, इसपर कहते हैं—

१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २।२।२९॥
वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थामें उपलब्ध होनेवाले पदार्थोंसे स्वप्न
आदिमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके धर्ममें भेद होनेके कारण; च = भी;
(जाग्रत्में उपलब्ध होनेवाले पदार्थ) स्वप्नादिवत् = स्वप्नादिमें उपलब्ध
पदार्थोंकी भाँति; न = मिथ्या नहीं हैं।
व्याख्या - स्वप्नावस्था में प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने
और अनुभव किये हुए ही होते हैं, तथा वे जागनेपर उपलब्ध नहीं होते।
एकके स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा
कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त
बालुकाराशिमें प्रतीत होनेवाले जल, सीपमें दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश
प्रतीत होनेवाली दूसरी किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती
है। परंतु जो जाग्रत्-कालमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके
विषयमें ऐसी बात नहीं है। वे एक ही समय बहुतोंको समानरूपसे
उपलब्ध होती हैं, कालान्तरमें भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। एक
प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें उनकी सत्ता
विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके
और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके
बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता
सिद्ध नहीं होती।'
सम्बन्ध - विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी
पूर्ववासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव
है, अतः इसका खण्डन करते हैं-
न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २।२।३०॥
भावः = विज्ञानवादियोंद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न = सिद्ध नहीं
होती; अनुपलब्धेः = क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी
उपलब्धि ही नहीं हो सकती।