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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु, कालका भी महाकाल, समस्त
कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न और सबको जाननेवाला है। वह प्रकृति और
जीवात्माका स्वामी, समस्त गुणोंका शासक तथा जन्म-मृत्युरूप संसारमें
बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है।'१ चौथा हेतु है भेदका
प्रतिपादन। उस परब्रह्म परमात्माको इन दोनों प्रकृतियोंका अन्तर्यामी एवं
धारण-पोषण करनेवाला बताकर तथा अन्य प्रकारसे भी श्रुतिने इनसे उसकी
भिन्नताका निरूपण किया है।२
इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ,
सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सबका स्वामी परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियोंसे
अत्यन्त विलक्षण और परम श्रेष्ठ है; क्योंकि इन श्रुतियोंमें कहा हुआ उन
परमात्माका स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधिरहित है तथा उस परब्रह्मको
जाननेका फल परम शान्तिकी प्राप्ति,३ सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होना४
तथा अमृतको प्राप्त होना बताया गया है।५
सम्बन्ध- यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि उस परब्रह्म परमात्माका
अपनी अपरा और परा नामक प्रकृतियोंके साथ अभेद भी है और भेद भी।
१. स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः सँसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥
(श्वेता० ६। १६)
२. देखिये (श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय ४ के ६, ७, ८-१४-१५ आदिमन्त्र),
(मु० उ० ३।१।१-२), (श्वेता० उ० १।९), (बृ० उ० ३।४।१-२ तथा ३।७।१
से २३ तक)।
३. तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ (श्वेता० उ० ४।११)
'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥' (श्वेता० उ० ४।१४)
'तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥'
(क० उ० २।२।१३)
४. ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः। (श्वेता० उ० १।११)
५. तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ (श्वेता० उ० ३।८)