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सर्वकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 486 में से

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पृष्ठ 124

गया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्यसम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक
क्यों न माना जाय?' इस शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १। ४। ११॥
संख्योपसंग्रहात् =(श्रुतिमें) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह
(सांख्यमतोक्त तत्त्वोंकी) गणना नहीं है; नानाभावात्=क्योंकि वह
संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा;
अतिरेकात्=(वहाँ) उससे अधिकका भी वर्णन है।
व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है कि—
यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः।
तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥
(४। ४। १७)
'जिसमें पाँच पंचजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको
मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'-इस मन्त्रमें जो
संख्यावाचक 'पंच-पंच' शब्द आये हैं, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी
कल्पना करना उचित नहीं है; क्योंकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे-
दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पंच-पंच' से पचीस
संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमें वर्णित आकाश और आत्माको लेकर
सत्ताईस तत्त्व होते हैं; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते
हैं। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमें न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान'
का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोंका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्में
'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया
गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा परमेश्वरकी
विभिन्न कार्य-शक्तियोंका वर्णन है।
सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका
ग्रहण होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—