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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
तथा यह भी कहा है कि 'उसने स्वयं अपने-आपको ही इस रूपमें बनाया है'
तथा उसको रसस्वरूप और सबको आनन्दयुक्त करनेवाला कहा है। फिर
उसके निर्विशेष लक्षणोंका वर्णन करके उस परमात्मामें स्थिति लाभ करनेवाले
साधकका निर्भय पदमें स्थित होना कहा है (तै० उ० २।७)। उसके बाद उसकी
स्तुति करते हुए कहा है कि 'इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य
उदय होता है, इसीके भयसे अग्नि और इन्द्र तथा पाँचवाँ मृत्यु अपने-अपने
कार्यमें प्रवृत्त होते हैं।' (तै० उ० २।८) इस प्रकार तैत्तिरीय शाखाके मन्त्रोंद्वारा
भी उस एक ही परमात्माके दोनों प्रकारके लक्षणोंका कथन होनेसे भी एक
ही परमेश्वरका निर्गुण और सगुण रूप होना सिद्ध होता है।
सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत
करते हैं—
अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ ३।२।१४॥
हि = क्योंकि; अरूपवत् = रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी भाँति; एव = ही;
तत्प्रधानत्वात् = उन सगुण स्वरूपके लक्षणोंकी भी प्रधानता है, इसलिये
(यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म दोनों लक्षणोंवाला है)।
व्याख्या—जिस प्रकार उस परब्रह्म परमात्माको निर्गुण-निराकार बतानेवाले
वेदवाक्य मुख्य हैं, ठीक उसी प्रकार उसे सगुण-साकार, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न
बतानेवाले वेदवाक्य भी प्रधान हैं; उनमेंसे किसी एकको मुख्य और दूसरोंको
गौण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एक ही प्रकरणमें और एक ही मन्त्रमें
एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे दोनों लक्षणोंवाला
बताया गया है (श्वे० उ० ६।११),* अतएव रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी
भाँति ही सगुण-साकार रूपकी भी प्रधानता होनेके कारण यही सिद्ध होता है
कि वह परब्रह्म परमेश्वर दोनों लक्षणोंवाला है।

  • एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
    कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥