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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७

सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७
तथा उसके विषयमें यह भी कहा है कि 'यह आत्मा सब पापोंसे
रहित, जरामरणवर्जित, शोकशन्य, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम
तथा सत्यसंकल्प है' इत्यादि (८।१।५)। तदनन्तर आगे चलकर
(छा० उ० ८।३।४ में) कहा है कि यही आत्मा, अमृत, अभय और
ब्रह्म है। इसीका नाम सत्य है।' इससे सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर'
शब्द परब्रह्मका ही बोधक है।
सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं-
गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिंगं च ॥ १ । ३ । १५ ॥
गतिशब्दाभ्याम् = ब्रह्ममें गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द
होनेसे; तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोंमें ऐसा ही वर्णन देखा गया है;
च=और; लिंगम्=इस वर्णनमें आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये
यहाँ 'दहर' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है।
व्याख्या-इस प्रसंगमें यह बात कही गयी है कि- 'इमाः सर्वाः
प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥'
(छा० उ० ८।३।२) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमें इस
ब्रह्मलोकको जाते हैं परंतु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं
हैं।' इस वाक्यमें प्रतिदिन ब्रह्मलोकमें जानेके लिये कहना तो गतिका वर्णन
है और उस 'दहर' को ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है। इन दोनों
कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है।
इसके सिवा दूसरी जगह (६।८।१ में) भी ऐसा ही वर्णन पाया
जाता है—यथा- 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।' अर्थात् 'हे सौम्य !
उस सुषुप्त-अवस्था में जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले परब्रह्म परमात्मासे
संयुक्त होता है' इत्यादि । तथा आगे बताये गये, अमृत, अभय आदि लक्षण
भी ब्रह्ममें ही सुसंगत होते हैं। इन दोनों कारणोंसे भी यही सिद्ध होता
है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है।
सम्बन्ध - उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं—

८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १। ३। १६ ॥
धृतेः = इस 'दहर'में समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्ति बतायी
जानेके कारण; च = भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है क्योंकि) अस्य = इसकी;
महिम्नः = (समस्त लोकोंको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका; अस्मिन् = इस
परब्रह्म परमात्मामें होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमें भी पाया जाता है,
इसलिये ('दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है)।
व्याख्या—छान्दोग्य० (८। ४। १)-में कहा गया है कि 'अथ य
आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम्।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन
सब लोकोंको धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य
आत्मामें समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण
'दहर' यहाँ परमात्माका ही वाचक है; क्योंकि दूसरी श्रुतियोंमें भी परमेश्वरमें
ऐसी महिमा होनेका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य
प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' (बृह० उ० ३। ८। ९)
अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर परमात्माके ही शासनमें रहकर सूर्य और चन्द्रमा
भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हैं' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है
कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां
लोकानामसम्भेदाय।' (बृ० उ० ४। ४। २२) अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है,
यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है। यह सब भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला
है तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे बचानेके लिये उनको धारण
करनेवाला सेतु है।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको
धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म
परमेश्वरका ही वर्णन है।
सम्बन्ध—अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं—
प्रसिद्धेश्च ॥ १। ३। १७ ॥
प्रसिद्धेः = आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है, इस कारण;
च = भी ('दहर' नाम परब्रह्मका ही है)।