वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३
सूत्र २२ ] अध्याय २ १५३
व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' (छा० उ० ६।
८। ७) — 'हे श्वेतकेतु! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० उ० २।
५।१९) — 'यह आत्मा ब्रह्म है।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव
जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' (छा० उ० ६। ३। ३)—
अर्थात् 'इस देवता (ब्रह्म)-ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमें इस
जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम-रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह
भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी'
(श्वेता० ४। ३) — 'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है'
इत्यादि। इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ
है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता
है, जो उचित नहीं है; क्योंकि जगत्में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता
जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि
वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्
परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात्
अपनेको जन्म-मरणके चक्करमें डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित
होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं, अतः ब्रह्मको जगत्का कारण मानना
उचित नहीं है।
सम्बन्ध — अब उक्त शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं—
अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥
तु=किंतु (ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे); अधिकम्=अधिक है;
भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है।
व्याख्या — बृहदारण्यकोपनिषद्में जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन
है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोंका तथा वाणी आदि
आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमें 'आत्मा' को
'ज्योति' अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृह० उ० ४। ३। ४-६) फिर उस
आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृह० उ०
१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
४।३।७) तदनन्तर जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओंके
भेदोंका वर्णन करते हुए कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर-
भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' (बृ० उ०
४।३।२१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका निरूपण करते हुए बताया
है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता
है।' (बृ० उ० ४।३।३५) इस वर्णनसे जीव और ब्रह्मका भेद स्पष्ट
हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में जो यह कहा है कि 'अनेन
जीवेनात्मनानुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश
करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे
ही श्वेताश्वतरोपनिषद् (४।६)-में जो जीव और ईश्वरको एक ही
शरीररूप वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोंकी भाँति बताया गया है, वह संगत
होता है।१ (एवं) कठोपनिषद्में जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी
गुहामें प्रविष्ट दो तत्त्वों (जीवात्मा और परमात्मा)-का वर्णन किया गया
है।२ श्वेताश्व० (१।९)-में जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो
अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)-का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमें
जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा दोनोंपर शासन करनेवाला
कहा गया है, इन सब वर्णनोंकी संगति भी जीव और ब्रह्ममें भेद माननेपर
ही हो सकती है। अन्तर्यामिब्राह्मणमें तो स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको
ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३।७।२२)३ मैत्रेयी ब्राह्मण (बृ०
उ० २।४।५)-में परमात्माको जानने तथा ध्यान करनेयोग्य बताया है।
इस प्रकार वेदमें जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे
यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और संहर्ता परमेश्वर
१-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है।
२-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आया है।
३-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।
जीव नहीं; किंतु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी हैं। 'तत्त्वमसि',
'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योंद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया
है, वह पूर्ववर्णित कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर
कारण है और जड-चेतनात्मक जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य
अभिन्न होता है; क्योंकि वह उसकी ही शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे
जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमें स्वरूपगत भेद तो है ही।
जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ है। जीव ईश्वरके अधीन है, परमात्मा सबके
शासक और स्वामी हैं। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध
होता। जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपंचकी कारणरूप ब्रह्मसे अभिन्नता होते
हुए भी भेद प्रत्यक्ष है। उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद है। ब्रह्म
नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमें अपनेको
डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते।
सम्बन्ध— इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २। १। २३॥
च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति (अल्पज्ञ)
जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और
परमात्माका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता।
व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय
तथा सबके रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप
पत्थर, काठ, लोहा और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं,
केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें अनुगत होनेके कारण ही उनसे
अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा प्रकृतिके विस्तारभूत
जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं सुख-
दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार,
सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है। कारण और कार्यकी अनन्यताको
लेकर ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं। इसलिये