वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है
सूत्र ४४-४५ ] अध्याय २ २४१
मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥
मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—मन्त्रमें कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है
उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे
अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है
और इसके तीन पाद अमृतस्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही
विज्ञानानन्दस्वरूपमें) हैं,* (छा० उ० ३।१२।६)। इस प्रकार मन्त्रके
शब्दोंमें स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे
भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं।
सम्बन्ध— उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं—
अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥
अपि=इसके सिवा; स्मर्यते च=(भगवद्गीता आदिमें) यही स्मरण
भी किया गया है।
व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमें ही नहीं कही गयी है, अपितु गीता
(१५।७)-में साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है—
‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।’ ‘इस जीवलोकमें यह
जीवसमुदाय मेरा ही अंश है।’ इसी प्रकार दसवें अध्यायमें अपनी मुख्य-
मुख्य विभूतियों अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१०।४२)-
में कहा है कि—
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥
‘अर्जुन! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है,
तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस
- यह मन्त्र पहले पृष्ठ ४० में आ गया है।
समस्त जगत्को भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हूँ।' दूसरी जगह भी
ऐसा ही वर्णन आता है—'हे मैत्रेय ! एक पुरुष जीवात्मा जो कि अविनाशी,
शुद्ध, नित्य और सर्वव्यापी है, वह भी सर्व-भूतमय विज्ञानानन्दघन
परमात्माका अंश ही है।'*
इस प्रकार स्मृतियोंद्वारा समर्थन किया जानेसे भी यह सिद्ध होता है
कि जीवात्मा परमेश्वरका अंश है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्मा ईश्वरका ही
अंश है तब तो जीवके शुभाशुभ कर्मोंसे और सुख-दुःखादि भोगोंसे ईश्वरका
भी सम्बन्ध होता होगा, इसपर कहते हैं—
प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ २।३।४६ ॥
परः = परमेश्वर; एवम्=इस प्रकार जीवात्माके दोषोंसे सम्बद्ध; न = नहीं
होता; प्रकाशादिवत्=जिस प्रकार कि प्रकाश आदि अपने अंशके दोषोंसे
लिप्त नहीं होते।
व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश सूर्य तथा आकाश आदि भी अपने
अंश इन्द्रिय आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते, वैसे ही ईश्वर भी
जीवोंके शुभाशुभ कर्मफलरूप सुख-दुःखादि दोषोंसे लिप्त नहीं होता।
श्रुतिमें कहा है—
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥
'जिस प्रकार समस्त लोकोंके चक्षुःस्वरूप सूर्यदेव चक्षुमें होनेवाले
दोषोंसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा अद्वितीय
परमेश्वर लोकोंके दुःखोंसे लिप्त नहीं होता।' (क० उ० २।२।११)
सम्बन्ध—इसी बातको स्मृतिप्रमाणसे पुष्ट करते हैं—
- एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः सर्वव्यापी तथा पुमान्। सोऽप्यंशः सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः ॥
(वि० पु० ६।४।३६)