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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
कोई विरोध नहीं है। स्थानकी एकताके कारण ही कहीं उसको
ब्रह्मकी प्राप्ति, कहीं प्रलयकी भाँति परमात्माके साथ संयुक्त होना
आदि कहा गया है; परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि यह
भी समाधिकी भाँति मुक्तिमें सहायक है। यह तो महान् तामसी सुखका
उपभोग करानेवाली अज्ञानमयी स्थिति है (गीता १८। ३९)। अतः
शरीररक्षाके लिये कम-से-कम आवश्यक समयतक ही शयन करना
चाहिये, श्रेष्ठ सुखकी बुद्धिसे नहीं।
प्रश्नोपनिषद्में स्पष्ट ही यह वर्णन है कि 'वह मन जब तेजसे अर्थात्
उदानवायुसे दब जाता है—उदानवायु इन्द्रियोंसहित मनको हृदयमें ले जाकर
मोहित कर देता है, तब इसकी सुषुप्ति-अवस्था होती है, उस समय यह
स्वप्नको नहीं देखता। इस शरीरमें जीवात्माको यह सुषुप्ति-जनित सुख होता
है' (प्र० उ० ४। ६)। इस विषयमें दूसरी श्रुतिमें जो यह बात कही है कि
'उस समय तेजसे सम्पन्न होता है।' (छा० उ० ८। ६। ३) वहाँ भी तेजका
अर्थ उदानवायु ही समझना चाहिये, ब्रह्म नहीं; क्योंकि प्रश्नोपनिषद्में तीसरे
प्रश्नका उत्तर देते हुए नवें और दसवें मन्त्रमें स्पष्ट ही उदानवायुकी और
तेजकी एकता की गयी है। अतः ऐसा माननेसे ही वहाँ किये हुए वर्णनके
साथ छान्दोग्यश्रुतिकी एकवाक्यता सिद्ध होगी।
सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी
स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं—
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३। २। ८॥
अतः=इसीलिये; अस्मात्=यहाँसे; प्रबोधः=जीवात्माका जगना (श्रुतिमें
कहा गया है)।
व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है और वहींसे प्रकट भी होती
है। इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे
अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके