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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
निचाय्यत्वात् = क्योंकि (वह) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् = उसके
विषयमें ऐसा कहा गया है; च = तथा; व्योमवत् = वह आकाशकी भाँति
सर्वत्र व्यापक है (इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)।
व्याख्या - यदि कोई यह शंका करे कि छा० उ० (३ । १४) - के तीसरे
और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है
तथा तीसरे मन्त्रमें उसे धान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा
गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ
उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योंकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा,
सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है;
क्योंकि उक्त मन्त्रमें जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमें स्थित बताया गया है, वह
उसके उपलब्धिस्थानकी अपेक्षासे है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका
स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है। अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक
प्राणीके हृदयमें भी है और उसके बाहर भी १ (ईशा० ५)। (गीता १३ । १५) २
अतएव उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता
तथा जो उसे धान, जौ, सरसों और सावाँसे भी छोटा बताया गया है, इससे
श्रुतिका उद्देश्य उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म
और इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य (ग्रहण करनेमें न आनेवाला) बतलाना है। इसीलिये
उसी मन्त्रमें यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और
समस्त लोकोंसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी
समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है।
इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं।
१-तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ (ईशा० ५)
२-बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५)
'वह परमात्मा चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है तथा चर और अचर भी
है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमें भी स्थित वही है।'

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ ५३
सम्बन्ध— परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें स्थित होकर भी उनके सुख-
दु:खसे अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं—
सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १।२।८॥
चेत्=यदि कहो; सम्भोगप्राप्तिः=(सबके हृदयमें स्थित होनेसे चेतन
होनेके कारण उसको) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो
ऐसा कहना ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममें
विशेषता है।
व्याख्या—यदि कोई यह शंका करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक
परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-
दुःखोंका भोग भी करता ही होगा; क्योंकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं,
चेतन है और चेतनमें सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है तो यह कथन
ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामें कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं
है। वह सबके हृदयमें रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोंसे सर्वथा असंग है।
यही जीवोंकी अपेक्षा उसमें विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता
और भोक्ता है; किंतु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है,
भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)*। इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-
दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।
सम्बन्ध— ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके
हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है, परंतु वेदान्तमें कहीं-कहीं
परमात्माको भोक्ता भी बताया गया है (क० उ० १।२।२५)। फिर यह
वचन किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है? यह
निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं—
अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १।२।९॥
चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ;

  • तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मु० उ० ३।१।१)