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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
यदि जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं तो उनके कर्मफल-भोगकी
व्यवस्था कौन करेगा। जीवात्मा स्वयं अपने कर्मोंका विभाग करके ऐसा
नियम बना ले कि अमुक कर्मका अमुक फल मुझे अमुक प्रकारसे
भोगना है तो यह सम्भव नहीं है। कर्म जड हैं, अतः वे भी अपने फलका
भोग करानेकी व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते। यदि ऐसा मानें कि एक
ही परमात्मा घटाकाशकी भाँति अनादिसिद्ध शरीरादिकी उपाधियोंके
निमित्तसे नाना जीवोंके रूपमें प्रतीत हो रहा है; तो भी उन जीवोंके
कर्मफलभोगकी व्यवस्था नहीं हो सकती; क्योंकि इस मान्यताके अनुसार
जीवात्मा और परमात्माका भेद वास्तविक न होनेके कारण समस्त
जीवोंके कर्मोंका विभाग करना, उनके भोगनेवाले जीवोंका विभाग करना
तथा परमात्माको उन सबसे अलग रहकर उनके कर्मफलोंका व्यवस्थापक
मानना सम्भव न होगा। अतः श्रुतिके कथनानुसार यही मानना ठीक है
कि सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर ही सबके कर्मफलोंकी यथायोग्य
व्यवस्था करता है तथा सब जीव उसीसे प्रकट होते हैं, इसलिये पिता-
पुत्रकी भाँति उसके अंश हैं।
सम्बन्ध - केवल कर्मफलभोगमें ही नहीं, संकल्प आदिमें भी उसी
दोषकी प्राप्ति दिखाते हैं—
अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥ २।३।५२ ॥
च = इसके सिवा; एवम् = इसी प्रकार; अभिसन्ध्यादिषु = संकल्प
आदिमें; अपि = भी (अव्यवस्था होगी)।
व्याख्या - ईश्वर तथा जीवोंका अंशांशिभाव वास्तविक नहीं, घटाकाशकी
भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होनेवाला है; यह माननेपर जिस प्रकार
पूर्वसूत्रमें जीवोंके कर्मफल-भोगकी नियमित व्यवस्था न हो सकनेका
दोष दिखाया गया है, उसी प्रकार उन जीवोंके संकल्प और इच्छा आदिके
विभागकी नियमित व्यवस्था होनेमें भी बाधा पड़ेगी; क्योंकि उन सबके
संकल्प आदि परस्पर अलग नहीं रह सकेंगे और परमात्माके संकल्प

आदिसे भी उनका भेद सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः शास्त्रमें जो परब्रह्म
परमेश्वरके द्वारा ईक्षण (संकल्प)-पूर्वक जगत्की उत्पत्ति करनेका वर्णन
है, उसकी भी संगति नहीं बैठेगी।

प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ २ । ३ । ५३ ॥

चेत् = यदि कहो; प्रदेशात् = उपाधियोंमें देशभेद होनेसे (सब व्यवस्था
हो जायगी); इति न = तो यह नहीं हो सकता; अन्तर्भावात् = क्योंकि सभी
देशोंका उपाधिमें और उपाधियोंका सब देशोंमें अन्तर्भाव है।
व्याख्या—यदि कहो, उपाधियोंमें देशका भेद होनेसे सब जीवोंका
अलग-अलग विभाग हो जायगा और उसीसे कर्मफल-भोग एवं संकल्प
आदिकी भी व्यवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सर्वव्यापी
परब्रह्म परमेश्वर सभी उपाधियोंमें व्याप्त है। उपाधियोंके देशभेदसे
परमात्माके देशमें भेद नहीं हो सकता। प्रत्येक उपाधिका सम्बन्ध सब
देशोंसे हो सकता है। उपाधि एक जगहसे दूसरी जगह जाय तो उसके
साथ आकाश नहीं आता-जाता है। जब जिस देशमें उपाधि रहती है, उस
समय वहाँका आकाश उसमें आ जाता है। इस प्रकार समस्त आकाशके
प्रदेशका सब उपाधियोंमें अन्तर्भाव होगा। इसी तरह समस्त उपाधियोंका
भी आकाशमें अन्तर्भाव होगा। किसी प्रकारसे कोई विभाग सिद्ध नहीं
हो सकेगा। इसलिये परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्माओंका अंशांशिभाव
घटाकाशकी भाँति उपाधिनिमित्तक नहीं माना जा सकता।*

तीसरा पाद सम्पूर्ण

  • इसका विस्तार सूत्र ३ । ३ । ३५ से ३ । ३ । ४१ की व्याख्यामें पढ़ना चाहिये।