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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९
करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।'* (मु० उ० २।१।३) इस प्रकार
इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका श्रुतिमें वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि
इन्द्रियाँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं।
सम्बन्ध— जहाँ पहले तेज, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति बताते हुए
जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ स्पष्ट कहा है कि 'वाणी
तेजोमयी है अर्थात् वाक् इन्द्रिय तेजसे उत्पन्न हुई है; इसलिये तेजसे ओतप्रोत
है।' इससे तो पाँचों भूतोंसे ही इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका होना सिद्ध होता है जैसा
कि दूसरे मतवाले मानते हैं। इस परिस्थितिमें दोनों श्रुतियोंकी एकता कैसे
होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
गौण्यसम्भवात् ॥ २।४।२ ॥
असम्भवात् = सम्भव न होनेके कारण वह श्रुति; गौणी = गौणी है
अर्थात् उसका कथन गौणरूपसे है।
व्याख्या—उस श्रुतिमें कहा गया है कि 'भक्षण किये हुए तेजका जो
सूक्ष्म अंश है, वह एकत्र होकर वाणी बनता है।' (छा० उ० ६।६।४)
इससे यह सिद्ध होता है कि तैजस पदार्थका सूक्ष्म अंश वाणीको बलवान्
बनाता है; क्योंकि श्रुतिने खाये हुए तैजस पदार्थोंके सूक्ष्मांशका ही ऐसा
परिणाम बताया है, इसलिये जिसके द्वारा यह खाया जाय, उस इन्द्रियका तैजस
तत्त्वसे पहले ही उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार वहाँ खाये हुए
अन्नसे मनकी और पीये हुए जलसे प्राणोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है। परंतु
प्राणोंके बिना जलका पीना ही सिद्ध नहीं होगा। फिर उससे प्राणोंकी उत्पत्ति
कैसे सिद्ध होगी? अतः जैसे प्राणोंका उपकारी होनेसे जलको गौणरूपसे
प्राणोंकी उत्पत्तिका हेतु कहा गया है, वैसे ही वाक्-इन्द्रियका उपकारी होनेसे
तैजस पदार्थोंको वाक्-इन्द्रियकी उत्पत्तिका हेतु गौणरूपसे ही कहा गया है।
इसलिये वह श्रुति गौणी है, अर्थात् उसके द्वारा तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदि

  • यह मन्त्र पृष्ठ २१५ की टिप्पणीमें आ गया है।

२५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका कथन गौण है; यही मानना ठीक है और ऐसा मान
लेनेपर श्रुतियोंके वर्णनमें कोई विरोध नहीं रह जाता है।
सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उस श्रुतिका गौणत्व सिद्ध करते हैं—
तत्प्राक्छुतेश्च ॥ २ । ४ । ३ ॥
तत्प्राक्छुतेः= श्रुतिके द्वारा उन आकाशादि तत्त्वोंके पहले इन्द्रियोंकी
उत्पत्ति कही गयी है, इसलिये; च=भी (तेज आदिसे वाक् आदि
इन्द्रियकी उत्पत्ति कहनेवाली श्रुति गौण है)।
व्याख्या—शतपथ-ब्राह्मणमें ऋषियोंके नामसे इन्द्रियोंका पाँच तत्त्वोंकी
उत्पत्तिसे पहले होना कहा गया है (६। १। १। १) तथा मुण्डकोपनिषद्में
भी इन्द्रियोंकी उत्पत्ति पाँच भूतोंसे पहले बतायी गयी है। इससे भी यही
सिद्ध होता है कि आकाशादि तत्त्वोंसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति नहीं हुई है, अतः
तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदिकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली वह श्रुति
गौण है।
सम्बन्ध— अब दूसरी युक्ति देकर उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं—
तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ २ । ४ । ४ ॥
वाचः=वाणीकी उत्पत्तिका वर्णन; तत्पूर्वकत्वात्=तीनों तत्त्वोंमें उस
ब्रह्मके प्रविष्ट होनेके बाद है (इसलिये तेजसे उसकी उत्पत्ति सूचित
करनेवाली श्रुति गौण है)।
व्याख्या—उस प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'उन तीन तत्त्वरूप देवताओंमें
जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर उस ब्रह्मने नामरूपात्मक जगत्की रचना
की।' (छा० उ० ६। ३। ३) इस प्रकार वहाँ जगत्की उत्पत्ति ब्रह्मके
प्रवेशपूर्वक बतायी गयी है; इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि समस्त
इन्द्रियोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही हुई है, तेज आदि तत्त्वोंसे नहीं। अतः तेज-
तत्त्वसे वाणीकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुतिका कथन गौण है।
सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है

सूत्र ५-६ ] अध्याय २ २५१
और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया। अब जो
श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया
गया है (मु० उ० २।१।८) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है
(बृह० उ० ३।९।४) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, उसका निर्णय
करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं—
सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २।४।५॥
सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योंकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा;
विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' = कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणों (इन्द्रियों)-
के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है।
व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात
होती हैं और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना,
त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।'*
(मु० उ० २।१।८)। ऐसा कहकर इन्द्रियोंका 'सात' यह विशेषण दिया
है। इससे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ सात ही हैं।
सम्बन्ध— अब सिद्धान्तीकी ओरसे उत्तर दिया जाता है—
हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २।४।६॥
तु = किंतु; हस्तादयः = हाथ आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं; अतः = इसलिये;
स्थिते = इस स्थितिमें; एवम् = ऐसा; न = नहीं; (कहना चाहिये कि इन्द्रियाँ सात
ही हैं।)
व्याख्या—हाथ आदि (हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा) अन्य चार इन्द्रियोंका
वर्णन भी पूर्वोक्त सात इन्द्रियोंके साथ-साथ दूसरी श्रुतियोंमें स्पष्ट आता है
(प्र० उ० ४।८) तथा प्रत्येक मनुष्यके कार्यमें करणरूपसे हस्त आदि
चारों इन्द्रियोंका प्रयोग प्रत्यक्ष उपलब्ध है; इसलिये यह नहीं कहा जा सकता

  • सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
    सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥