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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१

सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१
अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले' (जाबाल० उ० ४)। अतः पीछे लौटना
उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन
सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः
लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोंमें जो
एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको
छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसंगत नहीं है।
सम्बन्ध — इस प्रकारका मनुष्य प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो शुद्ध हो
जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३।४।४१ ॥
च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम-
वालोंके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये
विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योंकि स्मृतिमें उसका महान् पतन माना
गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा।
व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममें यदि ब्रह्मचारीका व्रत भंग हो जाय तो
वेद और स्मृतियोंमें उसका प्रायश्चित्त बताया गया है (मनु० २।१८१) तथा
गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भंग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त
है; क्योंकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी हैं। परंतु जिन्होंने वानप्रस्थ या संन्यास
आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ आश्रममें लौटकर स्त्री-
प्रसंगादिमें प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोंमें किसी
प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योंकि स्मृतियोंमें उनका अतिशय
पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नहीं रहे। जैमिनि
आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका
विधान नहीं है।
सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं—
उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥
एके=कई एक आचार्य; तु=तो; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी

४०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
मानते हैं, (इसलिये वे); अशनवत् = भोजनके नियमभंगके प्रायश्चित्तकी
भाँति; भावम् = इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते हैं; तदुक्तम् = यह
बात शास्त्रमें कही है (यह भी उनका कहना है)।
व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने
व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी
और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमें अधिकार है; क्योंकि यह महापातक
नहीं है, किंतु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमें विधान
है ही। अतः अभक्ष्य-भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी
प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है।
सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं—
बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३।४।४३॥
तु = किंतु; उभयथापि = दोनों प्रकारसे ही; बहिः = वह अधिकारसे
बहिष्कृत है; स्मृतेः = क्योंकि स्मृतिप्रमाणसे; च = और; आचारात् = शिष्टाचारसे
भी (यही बात सिद्ध होती है)।
व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए संन्यासी और वानप्रस्थी लोग
महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट सम्प्रदाय और
वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत हैं; क्योंकि स्मृतिप्रमाण
और शिष्टोंके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है। उनका पतन
भोगोंकी आसक्तिसे ही होता है। अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं।
श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं
करते हैं।
सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका विद्यामें
अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया। अब जो कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ
आदिमें उपासना की जाती है, उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म
करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ
किया जाता है—