वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
दूसरा पाद
दूसरा पाद
प्रथम पादमें यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश',
'ज्योति' तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्में जो जगत्के कारणका
और उपास्यदेवका वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन
है। 'प्राण' शब्दका प्रसंग आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३। १४। २)-में
आये हुए 'मनोमयः प्राणशरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया।
अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके चौदहवें खण्डपर विचार
करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं।
इस पादमें यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद्
(३। १४। १)-में पहले तो सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्मरूप समझकर
उसकी उपासना करनेके लिये कहा गया है। उसके बाद उसके लिये
'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्वकर्मा' आदि विशेषण
दिये गये हैं (३। १४। २), जो कि ब्रह्मके प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात्
उसको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्' अर्थात् सबसे
बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा
है (३। १४। ३-४) इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव
कौन है? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही? इसका निर्णय
करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्॥ १। २। १॥
सर्वत्र=सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमें; प्रसिद्धोपदेशात्=(जगत्की उत्पत्ति,
स्थिति और लयके कारणरूपसे) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके
रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३। १४ में बताया हुआ
उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवें खण्डके आरम्भमें
सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त
४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो
भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत॥' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण
चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योंकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है,
स्थितिके समय उसीमें चेष्टा करता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता
है। साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी
चाहिये। अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये; क्योंकि
यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमें यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है,
यहाँसे चले जानेपर परलोकमें यह वैसा ही बन जाता है। अतः उसे
उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये।' इस मन्त्र-वाक्यमें उसी परब्रह्मकी
उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति
और प्रलय होते हैं तथा जो समस्त वेदान्त-वाक्योंमें जगत्के महाकारणरूपसे
प्रसिद्ध है। अतः इस प्रकरणमें बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा
ही है, दूसरा नहीं।
सम्बन्ध— यहाँ यह प्रश्न उठता है कि (छा० उ० ३।१४।२ में)
उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण
जीवात्माके हैं, अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी संगति कैसे
लगेगी? इसपर कहते हैं—
विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १। २। २॥
च = तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः = श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोंकी संगति उस
परब्रह्ममें ही होती है; इसलिये (इस प्रकरणमें कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।
व्याख्या—छा० उ० (३।१४।२)-में उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार
उपलब्ध होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः॥'
अर्थात् 'वह उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप,
सत्यसंकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम,
सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला,