वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
है, इसलिये; ('दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है) इति=ऐसा
मानना चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है।
व्याख्या—'श्रुतिमें दहराकाशको अत्यन्त अल्प (लघु) बताया
गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योंकि
उसीका स्वरूप 'अणु' माना गया है।' परंतु ऐसी शंका नहीं करनी
चाहिये; क्योंकि इसका उत्तर पहले (सूत्र १। २। ७ में) दिया जा
चुका है। अतः बारंबर उसीको दुहरानेकी कोई आवश्यकता नहीं है।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शंकाका उत्तर प्रकारान्तरसे दिया जाता है—
अनुकृतेस्तस्य च॥ १। ३। २२॥
तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी;
(परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है)।
व्याख्या—मनुष्यके हृदयका माप अंगुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमें
जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमें इस प्रकार बतायी
गयी है—'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।' (तै० उ० २।६) 'परमात्मा उस
जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की रचना करके स्वयं भी जीवात्माके साथ उसमें
प्रविष्ट हो गया।' 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरोत्॥' (छा० उ० ६।३।३) 'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप
देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य-शरीरमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट
होकर नाम-रूपका विस्तार किया।' तथा—'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे।' (क० उ० १।३।१) अर्थात् 'शुभ कर्मोंके
फलरूप मनुष्य-शरीरमें परब्रह्मके निवासस्थानरूप हृदयाकाशके अन्तर्गत
बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो (जीवात्मा और परमात्मा)
हैं' इत्यादि। इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला
बताया जानेके कारण भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही
है। इसी भावको लेकर वेदोंमें जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'—
छोटे-से-छोटा तथा 'महतो महीयान्'—बड़े-से-बड़ा बताया गया है।
सूत्र २३-२४ ] अध्याय १ ९३
सम्बन्ध—इस विषयमें स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं—
अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥
च = इसके सिवा; स्मर्यते अपि = यही बात स्मृतिमें भी कही गयी है।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमें स्थित है और वह
छोटेसे भी छोटा है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है—
'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः।' (गीता १५।१५)। 'हृदि सर्वस्य
विष्ठितम्।' (गीता १३।१७)। 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
तिष्ठति।' (गीता १८।६१)। 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च
स्थितम्।' (गीता १३।१६) 'अणोरणीयांसम्।' (गीता ८।९) इत्यादि।
ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको स्थानकी
अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है। अतः 'दहर' शब्दसे
परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं।
सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढ़कर यह जिज्ञासा होती है कि
कठोपनिषद् (२। १। १२, १३ तथा २। ३। १७)-में जिसे अंगुष्ठके
बराबर बताया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? अतः इसका
निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४॥
शब्दात् = (उक्त प्रकरणमें आये हुए) शब्दसे; एव = ही; (यह सिद्ध
होता है कि) प्रमितः = अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष (परमात्मा ही है)।
व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य
आत्मनि तिष्ठति।' (२।१।१२) तथा 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः'
'ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः।' (२।१।१३) अर्थात् 'अंगुष्ठके
बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग (हृदय)-में स्थित है।' तथा
'अंगुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस है,
वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है। वह आज भी