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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

१४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
होना असम्भव है और तत्त्वज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। अतः
सांख्यमतमें संसारसे मोक्ष न होनेका प्रसंग आ जायगा।
सम्बन्ध— उपर्युक्त प्रकारसे प्रधानकारणवादका खण्डन करके उन्हीं
युक्तियोंसे अन्य वेदविरुद्ध मतोंका भी निराकरण हो जाता है, ऐसा कहते हैं—
एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ २ । १ । १२ ॥
एतेन=इस पूर्वनिरूपित सिद्धान्तसे; शिष्टापरिग्रहाः=शिष्ट
पुरुषोंद्वारा अस्वीकृत अन्य सब मतोंका; अपि=भी; व्याख्याताः=प्रतिवाद
कर दिया गया।
व्याख्या—पाँचवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक जो सांख्यमतावलम्बियोंद्वारा
उपस्थित की हुई शंकाओंका निराकरण करके वैदिक सिद्धान्तका
प्रतिपादन किया गया है; इसीसे दूसरे मत-मतान्तरोंका भी, जो वेदानुकूल
न होनेके कारण शिष्ट पुरुषोंको मान्य नहीं है, निराकरण हो गया; क्योंकि
उनके मत भी इस विषयमें सांख्यमतसे ही मिलते-जुलते हैं।
सम्बन्ध— पूर्वप्रकरणमें प्रधानकारणवादका निराकरण किया गया। अब
ब्रह्मकारणवादमें दूसरे प्रकारके दोषोंकी उद्भावना करके उनका निवारण
किया जाता है—
भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥ २ । १ । १३ ॥
चेत्=यदि कहो; भोक्त्रापत्तेः=(ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे उसमें)
भोक्तापनका प्रसंग आ जायगा, इसलिये; अविभागः=जीव और ईश्वरका
विभाग सिद्ध नहीं होगा, उसी प्रकार जीव और जडवर्गका भी परस्पर विभाग
सिद्ध नहीं होगा; ( इति न= ) तो यह कहना ठीक नहीं है; लोकवत्=क्योंकि
लोकमें जैसे विभाग देखा जाता है, वैसे; स्यात्=हो सकता है।
व्याख्या—यदि कहो कि 'ब्रह्मको जगत्का कारण मान लेनेसे स्वयं
ब्रह्मका ही जीवके रूपमें कर्म-फलरूप सुख-दुःख आदिका भोक्ता होना सिद्ध
हो जायगा, इससे जीव और ईश्वरका विभाग सम्भव नहीं रहेगा तथा जडवर्गमें
भोक्तापन आ जानेसे भोक्ता (जीवात्मा) और भोग्य (जडवर्ग)-का भी विभाग

सूत्र १४] अध्याय २ १४७
असम्भव हो जायगा, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि लोकमें एक कारणसे
उत्पन्न हुई वस्तुओंमें ऐसा विभाग प्रत्यक्ष देखा जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म
और जीवात्मा तथा जीव और जडवर्गका विभाग होनेमें भी कोई बाधा
नहीं रहेगा। अर्थात् लोकमें जैसे यह बात देखी जाती है कि पिताका
अंशभूत बालक जब गर्भमें रहता है तो गर्भजनित पीड़ाका भोक्ता वही
होता है, पिता नहीं होता तथा उस बालक और पिताका विभाग भी प्रत्यक्ष
देखा जाता है। उसी प्रकार ब्रह्ममें भोक्तापन आनेकी आशंका नहीं है तथा
जीवात्मा और परमात्माके परस्पर विभाग होनेमें भी कोई अड़चन नहीं
है। इसके सिवा, जैसे एक ही पितासे उत्पन्न बहुत-से लड़के परस्पर
एक-दूसरेके सुख-दुःखके भोक्ता नहीं होते, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न
जीवोंको कर्मानुसार जो सुख-दुःख प्राप्त होते हैं, उनका उपभोग वे
पृथक्-पृथक् ही करते हैं, एक-दूसरेके नहीं। इसी तरह यह भी देखा जाता
है कि एक ही पृथिवी-तत्त्वके नाना प्रकारके कार्य घट, पट, कपाट
आदिमें परस्पर भेदकी उपलब्धि अनायास हो रही है, उसमें कोई बाधा
नहीं आती। घड़ा वस्त्र या कपाट नहीं बनता और वस्त्र घड़ा नहीं बनता
और कपाट वस्त्र नहीं बनता। सबके अलग-अलग नाम, रूप और
व्यवहार चलते रहते हैं। उसी प्रकार एक ही ब्रह्मके असंख्य कार्य होनेपर
भी उनके विभागमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती है।
सम्बन्ध — ऐसा माननेसे कारण और कार्यमें अनन्यता सिद्ध नहीं होगी,
ऐसी शंका प्राप्त होनेपर कहते हैं—
तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ २। १। १४॥
आरम्भणशब्दादिभ्यः = आरम्भण शब्द आदि हेतुओंसे; तदनन्यत्वम् =
उसकी अर्थात् कार्यकी कारणसे अनन्यता सिद्ध होती है।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा गया है कि 'यथा सोम्यैकेन
मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँ स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं
मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥' (छा० उ० ६।१।४) अर्थात् 'हे सोम्य ! जैसे मिट्टीके

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एक ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीसे उत्पन्न होनेवाले समस्त कार्य जाने
हुए हो जाते हैं, उनके नाम और आकृतिके भेद तो व्यवहारके लिये हैं,
वाणीसे उनका कथनमात्र होता है, वास्तवमें तो कार्यरूपमें भी वह मिट्टी
ही है।' इसी प्रकार यह कार्यरूपमें वर्तमान जगत् भी ब्रह्मरूप ही है।
इस कथनसे जगत्की ब्रह्मसे अनन्यता सिद्ध होती है; तथा सूत्रमें 'आदि'
शब्दका प्रयोग होनेसे यह अभिप्राय निकलता है कि इस प्रकरणमें आये हुए
दूसरे वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है। उक्त प्रकरणमें 'ऐतदात्म्यमिदँ
सर्वम्' का (छा० उ० ६।८ से लेकर १६ वें खण्डतक) प्रयोग कई बार
हुआ है। इसका अर्थ है कि 'यह सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है।' इस प्रकार श्रुतिने
कारणरूप ब्रह्मसे कार्यरूप जगत्की अनन्यताका स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादन
किया है। उसी प्रकरणमें उपदेशका आरम्भ करके आचार्यने कहा है—
'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' (छा० उ० ६।२।१) अर्थात्
'हे सौम्य ! यह समस्त जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र अद्वितीय सत्यस्वरूप
ब्रह्म ही था।' इससे अनन्यताके साथ-साथ यह भी सिद्ध होता है कि यह
जड़-चेतन भोग्य और भोक्ताके आकारमें प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् उत्पत्तिके
पहले भी अवश्य था। परंतु था परब्रह्म परमात्माकी शक्तिरूपमें। इसका
वर्तमान रूप उस समय अप्रकट था। जैसे स्वर्णके विकार हार-कंकण-
कुण्डल आदि उत्पत्तिके पहले और विलीन होनेके बाद अपने कारणरूप
स्वर्णमें शक्तिरूपसे रहते हैं। शक्ति, शक्तिमान्‌में अभेद होनेके कारण
उनकी अनन्यतामें किसी प्रकारका दोष नहीं आता, उसी प्रकार यह जड़-
चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् उत्पत्तिके पहले और प्रलयके बाद परब्रह्म
परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अव्यक्त रहता है। अतः जगत्की ब्रह्मसे अनन्यतामें
किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती। गीतामें भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि
'यह आठ भेदोंवाली जड़-प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृतिरूपा शक्ति
है और जीवरूप चेतनसमुदाय मेरी परा प्रकृति है' (७।५)। इसके बाद यह
भी बताया है कि 'ये दोनों समस्त प्राणियोंके कारण हैं और मैं सम्पूर्ण