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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

About this granth

The Baudhayana Dharmasutra (बौधायन-धर्मसूत्रम्) belongs to the Kalpasutra of the Baudhayana school of the Taittiriya branch of the Black Yajurveda and is among the oldest dharmasutras. Its four prashnas give rules on the sources of dharma, regional customs, the duties of the varnas and ashramas, studentship, marriage, purity, food, penances, inheritance, kingship and renunciation.

A single rule shows its directness: listing the eight forms of marriage, it states that the fifth, the gandharva, is for vaishyas and the eighth, the paishacha, for shudras. Such passages make the work a basic source for historians of Indian law and society.

This edition is number 104 of the Kashi Sanskrit Granthamala. It gives the sutras with the Sanskrit commentary Vivarana of Govindasvamin, notes by Mahamahopadhyaya A. Chinnaswami Shastri and a Hindi explanation by Dr. Umesh Chandra Pandey. It is published by Chaukhambha Prakashan, Varanasi, and has 486 pages.

नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६१

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नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६१

को बेचने वाले व्यक्ति को छूने पर ब्राह्मण वस्त्रों को धारण किये हुए ही जल में प्रवेश कर स्नान करे ॥ ५ ॥

ऋज्वेतत् ॥ ५ ॥

किञ्च—

आत्मशय्याऽऽसनं वस्त्रं जायाऽपत्यं कमण्डलुः ।
शुचीन्यत्मन एतानि परेषामशुचीनि तु ॥ ६ ॥

अनु०— अपनी ही शय्या, अपना आसन, अपने वस्त्र, अपनी पत्नी, अपने बच्चे और अपना कमण्डलु-ये सभी अपने लिए पवित्र होते हैं, किन्तु दूसरों के लिए ये सभी अपवित्र होते हैं ॥ ६ ॥

स्पष्टमेतत् ॥ ६ ॥

आसनं शयनं यानं¹ नावः पथि तृणानि च ।
²चण्डालपतितस्पृष्टं मारुतेनैव शुध्यति ॥ ७ ॥

अनु०— आसन शय्या, यान, नौका, मार्ग और घास चण्डाल या पतित व्यक्ति द्वारा स्पृष्ट होने पर वायु से ही शुद्ध हो जाते हैं ॥ ७ ॥

टी०— गोविन्दस्वामी के अनुसार यदि आसन और शय्या आदि की चण्डाल या पतित ने छू दिया हो तभी उसकी शुद्धि वायु द्वारा अपने आप मानी जाती हैं अन्यथा यदि वे उन पर बैठे या सोए हों तो शुद्धि करनी पड़ती है ।

पन्थानो भूमिविषयाः । नौः दारुमयी फलका । आन्दोलिकादीन्यपि द्रव्याणीति केचित् । एषामन्यतमानीत्यव्याहार्यम् । तत्राऽपि स्पर्शनमात्रेऽदोषः । एतद्व्यासनादिषु तु यथादोषं शौचं कर्तव्यम् ॥ ७ ॥

किञ्च—

खलक्षेत्रेषु यद्धान्यं कूपवापीषु यज्जलम् ।
अभोज्यादपि तद्भोज्यं यच्च गोष्ठगतं पयः ॥ ८ ॥

अनु०— जो अनाज खलिहान में हो जो जल कूप या तालाब में हो तथा जो दूध गायों के रहने के स्थान पर हो वह ऐसे व्यक्ति से भी, जिसका अन्न खाना निषिद्ध है, लेकर प्रयोग में लाया जा सकता है । ॥ ८ ॥


१, नौः पन्थाश्च, इति क. पु.
२. 'श्वचण्डाल' इति. ई. व्यतिरिक्तैषु मूलपुस्तकेषु.

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६२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ कमण्डलुधर्या

**टी०—**यदि खलिहान में कोई ऐसा व्यक्ति जिसका अन्न अभोज्य बताया गया है अन्न उठाकर देता है तो वह अन्न दूषित नहीं माना जाता । इसी प्रकार कुएँ या तलाव से कोई इस प्रकार का व्यक्ति जल निकाल रहा हो तो वह ग्राह्य है और गाय के दुहे जाते समय दुहने के स्थान पर कोई उपर्युक्त व्यक्ति दूध देता हो तो वह दूध अशुद्ध नहीं माना जाता । गोविन्द स्वामी ने अपनी व्याख्या में यह निर्देश दिया है कि यदि पतित या चण्डाल ने इन पदार्थों में हाथ लगाया हो तो ये पदार्थ दूषित हो जाते हैं ।

अभोज्यान्नैः पुरुषैर्निष्पादितेषु खलक्षेत्रधान्यादिषु पुनश्च साधारणत्वेन सङ्कल्पितेष्वेतद् द्रष्टव्यम् । तत्राऽपि पतितचण्डालपरिगृहीतं दुष्टमेव । गोदोहन-वेलायामेव परिगृहीतं पयो भोज्यम् , गोष्ठगतत्वविधानात् ॥ ८ ॥

किञ्च—

१त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकरूपयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ ९ ॥

**अनु०—**देवों ने ब्राह्मणों के लिये शुद्धि के तीन उपाय बनाये—प्रत्यक्षतः दोष का ज्ञान न होना, जल से प्रक्षालन तथा वाणी द्वारा प्रस्तुत पदार्थ के निर्दोष होने की प्रशंसा ॥ ९ ॥

ब्राह्मणग्रहणं प्रदर्शनार्थम् , पुराकल्पप्रशंसैषा । अदृष्टं प्रत्यक्षादिभिरनव-गतदोषम् , उपहतानुपहताशङ्कायामद्भिर्निर्णिक्के प्रक्षालितम् , तथा वाचा प्रशस्तं च । आह च वसिष्ठः—'वाचा प्रशस्तमुपयुञ्जीत' इति । वाक्प्रशस्तान्यद्भिः प्रोक्ष्योपयुञ्जीतेति ॥ ९ ॥

२आपः पवित्रं भूमिगताः गोतृप्तिर्यासु जायते ।
अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ १० ॥

**अनु०—**पृथ्वी पर एकत्र हुए जिस जल से गायें अपनी प्यास बुझाती हैं, वह यदि अपवित्र पदार्थ से बहुत अधिक मिश्रित न हो, या दुर्गन्धयुक्त गँदले रंग या बुरे स्वाद का न हो तो पवित्र होता । है ॥ १० ॥

अमेध्येन पुरीषादिना । भूगुणव्यतिरिक्तगन्धवर्णरसान्विताः वर्ज्या इत्यर्थः ॥ १० ॥


१. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीक एव मनौ दृश्यते ॥ cf. मनु. ५. १२७.
२. श्लोकोऽयं किञ्चिदेवाऽन्यथयितो मनावुपलभ्यते । cf. मनु. ५. १२८.

नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६३

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नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६३

भूमिगता इत्युक्तम्, तत्प्रसङ्गादाह—

'भूमेस्तु सम्मार्जनप्रोक्षणोपलेपनावास्तरणो-
ल्लेखनैर्यथास्थानं दोषविशेषात् प्रायत्यम् ॥ ११ ॥

**अनु०—**भूमि की शुद्धि स्थान के अनुसार तथा अशुद्धिदोष की मात्रा के अनुसार झाडू आदि से झाड़ने, जल से धोने, लीपने (दर्भ आदि के) अवस्तरण, (कुदाली आदि से) खोदने-खुरचने से—इनमें से एक, दो, तीन या एकसाथ सभी विषयों से होती है ॥ ११ ॥

भवेदिति शेषः । सम्मार्जनं संमूहन्या । प्रोक्षणं त्वद्भिः । उपलेपनं गोमयादिना । अवस्तरणं दर्भादिभिः । उल्लेखनं खनित्रैः ।

आह च मनुः—

सम्मार्जनेनाञ्जनेन सेचनोल्लेखनेन च ।
गवां च परिवासेन भूमिशुध्यति पञ्चभिः ॥ इति ॥

यथास्थानं यथादेशम्, दोषविशेषात् दोषगुरुलघुतापेक्षया सम्मार्जनादीनां व्यस्तसमस्तापेक्षया प्रायत्यं शुचित्वं भवति । तत्रैकेनँ क्वचिच्छुद्धिः, क्वचिद् द्वाभ्याम्, क्वचित्त्रिभिः क्वचित्समस्तैरिति द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥

तत्र क्वचित्प्रोक्षणस्यैव शुद्धिहेतुतामाह—

अथाऽप्युदाहरन्ति ॥ १२ ॥

इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने नवमः खण्डः ॥ ९ ॥

**अनु०—**इस सम्बन्ध में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य भी उद्धृत करते हैं—॥ १२ ॥


षष्ठाध्याये दशमः खण्डः

गोचर्ममात्रमम्बिन्दुः ॥

गोचर्मगात्रमम्बिन्दुः भूमेश्शुद्ध्यति पातितः ।
समूढमसमूढं वा यत्राऽमेध्यं न लक्ष्यत इति ॥ १ ॥

**अनु०—**गिराया गया (या न झाड़ा गया) हो जल का एक बिन्दु बैल के चर्म के


१. खननाद्दहनाद्वर्षाद्गोभिराक्रमणादपि । चतुर्भिश्शुध्यते भूमिः पञ्चमाच्चोपलेपनात् ॥ इति वसिष्ठः । (व. ध. ३. ५१)

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६४बौधायन-धर्मसूत्रम्[ शुद्धिप्रकरणम्

बराबर भूमि के भाग को चाहे वह झाड़ा गया हो, यदि उस भूमि पर कोई अपवित्र पदार्थ दृष्टिगोचर न हों तो पवित्र कर देता ॥ १ ॥

अष्ठिबिन्दुः जललवः पातितः शुष्यतीति अन्तर्णीतणिजर्थो द्रष्टव्यः । समूढं सम्मार्जन्‍या । असमूढं स्पर्शादिशिष्टं देशं गोचर्ममात्रप्रमाणं यत्र गोशतमावेष्ट-यति, यत्र देशे, अमेध्यं पुरीषादि न लक्ष्यते तमिति शेषः ॥ १ ॥

परोक्षमधिश्रितस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणम् ॥ २ ॥

**अनु०—**खाने वाले की दृष्टि से परोक्ष में पकाये गये अन्न को जलती हुई अग्नि दिखानी चाहिए तथा उसके चारो ओर जल छिड़कना चाहिए ॥ २ ॥

**टि०—**ब्यूह्लरे ने अपने अनुवाद में यह सुझाया है कि यहाँ परोक्ष पकाये गये अन्न से शूद्र द्वारा पकाये गये अन्न का तात्पर्य है "ऐसा प्रतीत होता है कि यह नियम आर्यों के निरीक्षण के बिना ही शूद्रों द्वारा पकाये गये अन्न की ओर संकेत करता है । क्योंकि आपस्तम्ब सूत्रों में भी उसी शब्द 'परोक्षम्' 'आँख से परे' का प्रयोग है और निश्चित रूप से उसी स्थिति का निर्देश है, इस बात के लिए कोई कारण नहीं कि ब्राह्मण रसोइए द्वारा बनाये गये भोजन को खाने से पहले पवित्र किया जाय ।"—ब्यूह्लरेर, वही, पृ० १७२ टि० किन्तु गोविन्द स्वामी ने यह सुझाया है कि शङ्का होने-पर ही उपर्युक्त विधि से भोजन की शुद्धि की जाती है: 'शङ्का-पदमापन्नस्य शुद्धिर्भवति ।' शङ्का न होने की स्थिति में ऊपर बतायी गयी १.९.९ की तीन विधियों से शुद्धि हो ही जाती है ।

परोक्षं भोक्तुरसमक्षमधिश्रितस्य पक्वस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणं शङ्कापद-मापन्नस्य शुद्धिर्भवति । अनाशङ्कितस्य तु 'त्रीणि देवाः पवित्राणि' ( १.९.९. ) इत्युक्तम् ॥ २ ॥

तथापणेयानां च भक्ष्याणाम् ॥ ३ ॥

**अनु०—**इसी प्रकार बाजार की खाने योग्य वस्तुओं की भी शुद्धि होती है ॥३॥

**टि०—**बाजार की खाद्य वस्तुओं के अन्तर्गत गोविन्द ने लड्डु, अपूप, मोदक आदि तैयार बनी हुई मिठाइयों का उल्लेख किया है ।

आपणं वाणिजां पण्यस्थानम् ; क्रयविक्रयस्थानमित्यर्थः । तत्र भवा आप-णेया भक्ष्या ^१लड्डुकापूपसक्तुमोदकादयः उत्तरापथवासिनां प्रसिद्धाः । तेषा-मवद्योत्याऽभ्युक्षणम् । तथा च शङ्खः—"आकरजानामभ्युक्षितानां घृतेनाऽभि-घारितानामभ्यवहरणीयानां पुनः पचनमेव स्नेहद्रव्यसमानाम् इत्यादिना ॥३॥


१. मण्डकेति. क. पु.

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६५

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६५

न केवलमवद्योतनाद्येव शौचाकारम्। किं तर्हि ? दातुश्श्रद्धापि। तां च पुराकल्परूपेण प्रशंसति—
बीभत्सवः शुचिकामा हि देवा नाऽश्रद्दधानाय हविर्जुषन्त इति ॥ ४ ॥
**अनु०—**देवता स्वभावतः अशुद्धि से घृणा करने वाले, और पवित्रता के पक्ष-पाती होते हैं। वे श्रद्धाहीन व्यक्ति द्वारा अर्पित हवि को नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ४ ॥
**टि०—**इस सूत्र द्वारा मन की श्रद्धा को पवित्रता का हेतु माना गया है।
बीभत्सषोऽपि सन्तः अश्रद्दधानात् पुरुषाद्धविर्न जुषन्ते न सेवन्ते। तस्मान्नूनं श्रद्धाऽपि शुद्धिकारणमित्यवगम्यते ॥ ४ ॥
किञ्च—
शुचेरश्रद्दधानस्य श्रद्दधानस्य चाऽशुचेः।
मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥
प्रजापतिस्तु तानाह न समं विषमं हि तत्।
हतमश्रद्दधानस्य श्रद्धापूतं विशिष्यत इति ॥ ५ ॥
**अनु०—**श्रद्धाहीन पवित्र व्यक्ति के तथा श्रद्धासमन्वित अपवित्र व्यक्ति के अन्न के विषय में विचार करके देवों ने दोनों को समान बताया। प्रजापति ने उन देवों से कहा—ये दोनों प्रकार के अन्न समान नहीं हैं, विषम हैं। श्रद्धाहीन व्यक्ति का अन्न व्यर्थ है, श्रद्धा से पवित्र अन्न श्रेयस्कर है ॥ ५ ॥
**टि०—**इस सूत्र के भाव पर विचार करते ही रामकथा के अन्तर्गत राम का शबरी के जूठे बेर खाने के विषय में प्रसिद्ध उपाख्यान दृष्टान्तस्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कृष्ण के संबन्ध में भी अनेक ऐसे उपाख्यान हैं जिनमें उन्हें श्रद्धालु के अन्न का पक्षपाती दर्शाया गया है।
दीर्घकालं मीमांसित्वा विचार्य देवैः शुचेरश्रद्दधानस्य अशुचेश्श्रद्दधानस्य च तयोस्समीकरणे कृते देवान् प्रजापतिरब्रवीत्—विषमसमीकरणमेतद्युष्माभिः कृतं तथा मा कार्ष्टेति। किं तत्र कारणमित्याह—हतमश्रद्दधानस्य। तस्मात् श्रद्धापूतमेव विशिष्यते इति ॥ ५ ॥
किञ्च—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
अश्रद्धा परमः पाप्मा श्रद्धा हि परमं तपः।
तस्मादश्रद्धया दत्तं हविर्नाऽश्नन्ति देवताः ॥ ६ ॥
८ बौ०ध०

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६६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ शुद्धिप्रकरणम्

अनु०—इस संबन्ध में भी धर्मशास्त्रकार निम्नलिखित उद्धरण देते हैं—अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है, श्रद्धा परम तप है। इस कारण श्रद्धा के बिना ही अर्पित किये गये हवि को देवता ग्रहण नहीं करते ॥ ६ ॥

श्रद्धा आदरः कौतूहलं आस्तिक्यम् । यस्मादश्रद्धैवम्भूता तस्मादश्रद्धया न दातव्यमिति शेषः । आह च कृष्णो धनञ्जयाय—

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ ६ ॥

श्रद्धारहितः पुनः—

इष्ट्वा दत्त्वाऽपि वा मूर्खः स्वर्गं न हि स गच्छति ॥ ७ ॥

अनु०—( श्रद्धाहीन ) मूर्ख व्यक्ति यज्ञ करके या दान देकर भी स्वर्ग को नहीं जाता ॥ ७ ॥

स्पष्टमेतत् ॥ ७ ॥

मूर्ख इत्युक्तम्, कोऽसावित्यत आह—

शङ्का(१)पिहितचारित्रो यस्स्वाभिप्रायमाश्रितः ।
शास्त्रातिगः स्मृतो मूर्खो धर्मतन्त्रोपरोधनादिति ॥ ८ ॥

अनु०—जिस व्यक्ति का आचरण शङ्का (विवेकहीनता) द्वारा बाधित होता है, जो अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करता है, जो शास्त्रों में उक्त नियमों का अतिक्रमण करता है—वह धर्मनियमों के अनुष्ठान का विरोध करने के कारण मूर्ख कहा गया है ॥ ८ ॥

शङ्का कृत्याकृत्यविवेकशून्यता, श्रेयस्संशयात् । तया पिहितं चारित्रमनुष्ठानं यस्य स यथोक्तः । ततश्च शास्त्रतो निश्चित्य हेयोपादेयौ (२)चाऽवेक्ष्य विवेकाभावे स्वाभिप्रायमाश्रितः स्वेच्छाचारी भवतीत्यर्थः । एतस्मादेव शास्त्रातिगश्च भवति शास्त्रार्थमतीत्य गच्छति । तथाऽयुक्तम्, यतो भगवद्गीतासूक्तम्—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ॥ इति ।
एवंविधो यः पुरुषः स मूर्खस्स्मृतः । को हेतुः ? धर्मतन्त्रोपरोधनादिति । धर्मस्य तन्त्रमनुष्ठानं तस्योपरोधो भवति ॥ ८ ॥

श्रद्धा यथा द्रव्याणां शुद्धिहेतुः, एवं प्रक्षालनमपीत्येतद्दर्शयन्नाह—

शाकपुष्पफलमूलोषधीनां तु प्रक्षालनम् ॥ ९ ॥


१. विहृतेति. क. पु.
२. अनवेक्ष्य. इति. ग. पु.

षष्ठमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६७

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षष्ठमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६७

अनु०—किन्तु शाक, पुष्प, फल, मूल, वनस्पतियों का जल से प्रक्षालन करना चाहिए ॥ ९ ॥

तुशब्दो विशेषप्रायत्यप्रदर्शनार्थः। तच्चाऽस्पृश्यप्रदर्शनार्थम्। तत्र चैतद्विधानम्। एतेषां पुनः मूत्राद्युपहतानामल्पानां त्यागः, बहूनां तन्मात्रत्यागः, शिष्टानां प्रक्षालनमभ्युक्षणं वा ॥ ९ ॥

मूत्रपुरीषोपहतस्य शरीरावयवस्य शौचं वक्तुं मूत्रपुरीषकरणं तावदाह—

'शुष्कं तृणमयाज्ञिकं काष्ठं लोष्ठं वा तिरस्कृत्याऽहोरात्रयोरुदग्दक्षिणामुखः प्रावृत्य शिर उच्चरेदवमेहेद्वा ॥ १० ॥

अनु०—यज्ञ में काम न आने वाली सूखी हुई घास, यज्ञ में काम न आने वाली लकड़ी का टुकड़ा, अथवा मिट्टी का ढेला भूमि पर रखकर, दिन में उत्तर की ओर मुख कर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख कर, तथा सिर को वस्त्र से ढंककर मल और मूत्र का त्याग करे ॥ १० ॥

अयाज्ञिकं शुष्कं तृणादि तिरस्कृत्याऽन्तर्धाय भूमिम, अहन्युदङ्मुखो रात्रौ दक्षिणामुखः प्रावृत्य शिर उच्चरेदवमेहेद्वा मूत्रपुरीषे च। तथा च वसिष्ठः—'भूमिमयज्ञियैस्तृणैरन्तर्धाय मूत्रपुरीषे कुर्यात्' इति ॥ १० ॥

मूत्रे मृदाऽद्भिः प्रक्षालनम् ॥ ११ ॥

अनु०—मूत्र त्याग करने पर ( मूत्रेन्द्रिय का ) मिट्टी तथा जल से (एक बार) प्रक्षालन करे ॥ ११ ॥

लिङ्गस्य कार्यमिति शेषः। सकृदिति च ॥ ११ ॥

त्रिः पाणेः ॥ १२ ॥

अनु०—हाथ को मिट्टी तथा जल से तीन बार धोए ॥ १२ ॥

मृदाऽद्भिः प्रक्षालनमित्यनुवर्त्तते। तत्राऽपि सव्यस्य सकृत्। 'उभयोर्द्विद्विरि''ति विनिर्देशः कल्प्यः ॥ १२ ॥

तद्वत्पुरीषे ॥ १३ ॥

अनु०—इसी प्रकार मल त्याग करने पर भी प्रक्षालन करे ॥ १३ ॥


१. शिरः प्रावृत्य कुर्वीत शकृन्मूत्रविसर्जनम् । अयज्ञियेरनाद्वैश्च तृणैस्संछाद्य मेदिनीम् ॥ इति कात्यायनः । See मनु also. ४. ४९ ।

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६८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ शरीरशुद्धिः

मृद्वाद्भिः प्रक्षालनमतिदिश्यते । 'नवपुरीषे च' इति वक्तव्ये 'तद्वत्' इत्यतिदेशो विशेषविवक्षया ॥ १३ ॥

तमाह—

पर्यायास्तिस्रः पायोः पाणेश्च ॥ १४ ॥

अनु०— ( मल त्याग कर ) पायु ( अर्थात् अपान प्रदेश ) तथा हाथों का प्रक्षालन मूत्र त्याग-विषयक प्रक्षालन के तिगुने बार प्रक्षालन किया जाता है ॥ १४ ॥

टि०— यहाँ गोविन्द स्वामी ने सूत्र में 'पायोः' पाठ ग्रहण किया है, जब कि सभी मूल पुस्तकों में 'पाद्योः' पाठ उपलब्ध होता है । मूत्र त्याग के संबन्ध में जो प्रक्षालन की विधि बतायी गयी है वह मलत्याग में तीन बार की जाय । पहले एक बार मिट्टी से अपान प्रदेश का प्रक्षालन हो फिर हाथ का, इसी प्रकार तीन बार करे । इस संबन्ध में गोविन्द स्वामी ने मनु, दक्ष, और वसिष्ठ के मतों को उद्धृत किया है ।

पायुरपानप्रदेशः । मूत्रे यदुक्तं तेन पुरीषे त्रिरावृत्तेन भवितव्यम् । पूर्वं पायोत्सकृत् मृद् दातव्या, सकृच्च पाणेः । एवं त्रिरावर्तते । तत्रैवं मानवम्—

एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकस्मिन् करे दश ।
उभयोस्सप्त दातव्या मृदश्शुद्धिमभीप्सता ॥ इति ।

तथाऽपरं वासिष्ठं मतम्—

एका लिङ्गे तिस्रो वामे ( करे तिस्रः ) उभाभ्यां द्वे च मृत्तिके ।
पञ्चाऽपाने दशैकस्मिन्नुभयोस्सप्त मृत्तिकाः ॥ इति ।

दक्षस्तु मृत्तिकापरिमाणमुपदिशति—

अर्धप्रसृतिमात्रा तु प्रथमा मृत्तिका स्मृता ।
द्वितीया च तृतीया च तदर्धार्धा प्रकीर्तिता ॥

तत्र विरुद्धेषु विकल्पः, अविरुद्धेषु समुच्चयो द्रष्टव्यः । 'मलापकर्षणेऽमेध्यस्य' इत्येतत्तु सर्वत्र सममित्युच्यते ॥ १४ ॥

मूत्रवद्रेतस उत्सर्गे ॥ १५ ॥

अनु०— वीर्य का उत्सर्ग होने पर भी मूत्रत्याग के समान ही प्रक्षालन करे ॥ १५ ॥

शुक्रस्योत्सर्गेऽपि मूत्रवच्छौचमेव ॥ १५ ॥

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ४९

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ४९

नीवीं विस्रस्य परिधायाऽप उपस्पृशेत् ॥ १६ ॥
आर्द्रं तृणं (१)गोमयं भूमिं वा समुपस्पृशेत् ॥ १७ ॥

अनु०—नीवी (धोती के बन्धन) को खोलने पर या वस्त्र पहनते समय नीवी बन्धन बाँधने के बाद जल का स्पर्श करे अथवा भीगी हुई घास, गोबर या भूमि का स्पर्श करे ॥ १६-१७ ॥

परिहितस्य वाससो बन्धो नीवी । अपामुपस्पर्शनं प्रक्षालनं वा सम्भवा-
पेक्षो विकल्पः ॥ १६-१७ ॥

नाभेरधस्स्पर्शनं कर्मयुक्तो वर्जयेत् ॥ १८ ॥

अनु०—देव, पितृ सम्बन्धी धार्मिक कर्म करते समय शरीर के नाभि से नीचे के भाग का स्पर्श न करे ॥ १८ ॥

देवपितृसंयुक्तं कर्म कुर्वाण इत्यर्थः ॥ १८॥

तत्र कारणमाह—
२“ऊर्ध्वं वै पुरुषस्य नाभ्यै मेध्यमवाचीनममेध्यमि”ति श्रुतिः ॥१९॥

अनु०—पुरुष की नाभि से ऊपर का भाग पवित्र होता है और नीचे का भाग अपवित्र होता है ऐसा वेद का वचन है ॥ १९ ॥
टि०—द्रष्टव्य-तैत्तिरीय संहिता ६. १. ३. ४

पुरुषस्य नाभ्या ऊर्ध्वं मेध्यम् । अवाचीनमधस्तात्, अमेध्यम्, अयज्ञार्हमित्यर्थः ॥ १९ ॥

शूद्राणामार्याधिष्ठितानामर्धमासि ३मासि वा वपनम् ॥ २० ॥

अनु०—आर्यों की सेवा में रहनेवाले शूद्रों का अर्धमास (१५ दिनों) में अथवा पूरे मास में एक क्षोर होना चाहिए ॥ २० ॥

टि०—ब्यूह्लर ने यहाँ पुनः इस बात का संकेत किया है कि शूद्र द्विजातियों के यहाँ रसोइये का कार्य भी करते थे। आपस्तम्ब धर्म सूत्र २. १. २. ४-५ से भी यही अभिप्राय ध्वनित है।


१. गां भूमिमिति आ. ग. पु.
२. ज्योतिष्टोमे दीक्षाप्रकरणे यजमानस्य मेखलाबन्धनविधिसमीपे श्रुतोऽयमर्थ-वादः। कटिप्रदेशे मेखला बद्धव्या। तस्यां च बद्धायां शरीरे मेध्यामेध्ययोः स्थानयो-विभागो भवतीति।। नाभ्यै इति षष्ठ्यर्थे चतुर्थी।
३. मासि मासीति. घ. पु.

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७०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ शौचविधिः

कार्यमिति शेषः । आर्याधिष्ठिताः आर्याच्छाखादि शुश्रूषवः ॥ २० ॥

आर्यवदाचमनकल्पः ॥ २१ ॥

**अनु०--**उनके आचमन का नियम आर्यों के समान ही हो ॥ २१ ॥

तेषामिति शेषः । कल्पः प्रयोगः । 'आसीनस्त्रिः पिबेत्' ( १. ८. १५ ) इत्यादि । एवं च 'स्त्रीशूद्रौ तु सकृत्' इत्येतदनार्याधिष्ठितशूद्रविषयं द्रष्टव्यम् । ननु सर्व एव शूद्रा आर्याधिष्ठिताः । तथा च वक्ष्यति—'शूद्रेषु पूर्वेषां परिचर्या' ( १. १८. ५ ) इति सत्यम्—तथाऽपि परिचर्यायामतिक्रमस्सम्भाव्यते । सन्ति हि केचिच्छूद्राः स्वतन्त्रा एव शिल्पजीविनश्च, तस्मादनवद्यम् । आर्यो ब्राह्मणोऽभिप्रेतो न क्षत्रियवैश्यौ, तत्रैतत्स्यात् । आर्यवदिति वतिप्रत्ययेनाऽऽचमनधर्माणां सर्वेषामतिदेशे सत्युपवीतादीनामपि प्राप्तिस्स्यात् । नेत्याह—त्रैवर्णिकप्रधानत्वादुपनयनस्य, तत्प्रयुक्तत्वाच्चोपवीतस्य, न शूद्रस्य प्राप्तिः । तस्मादुपवीतादिवर्जितस्याऽतिदेशोऽयम् ॥ २१ ॥

वर्णधर्मप्रसङ्गादिदमन्यदुच्यते मा भूत्तत्प्रसारणमिति—

वैश्यः कुसीदमुपजीवेत् ॥ २२ ॥

**अनु०—**वैश्य ब्याज पर रुपया उठाकर जीविका चला सकता है ॥ २२ ॥

कुसीदो वृद्धयर्थं द्रव्यस्य प्रयोगः ॥ २२ ॥

तमेव विस्तारयति—

पञ्चविंशतिस्त्वेव पञ्चमाषकी स्यात् ॥ २३ ॥

**अनु०—**किन्तु पच्चीस ( कार्षापण ) मूलधन पर पांच पण ( कार्षापण का बीसवां भाग ) प्रतिमास ब्याज़ होना चाहिए ॥ २३ ॥

माषो नाम कार्षापणस्य विंशतितमो भागः । 'विंशो भागः पणस्य परिकीर्तितः' इति स्मृत्यन्तरदर्शनात् । पञ्चविंशतिसङ्ख्यानां कार्षापणानां प्रतिमासं पञ्च माषा वृद्धिरित्यर्थः ॥ २३ ॥

एतदतिक्रमे दोषमाह—

अथाऽप्युदाहरन्ति—

'यस्समर्घमृणं गृह्य महार्घं यः प्रयोजयेत् ।


१. See. प्रजापतिस्मृति. श्लो० ८८. श्लोकद्वयमपीदं वासिष्ठे दृश्यते । तत्र 'ऋणं गृह्य' इत्यत्र 'धान्यमुद्धृत्य' इति पठ्यते । अन्यत् सर्वं सममेव । See वा. ध. २. ४१.

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७१

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७१

स वै वार्धुषिको नाम सर्वधर्मेषु गर्हितः ॥
वृद्धिं च भ्रूणहत्यां च तुलया समतोलयत् ।
अतिष्ठद् भ्रूणहा कोटयां वार्धुषिस्समकम्पतेति ॥ २४ ॥

अनु०—इस विषय में निम्नलिखित उद्धृत करते हैं—
जो अल्प वृद्धि पर धन लेकर अधिक वृद्धि पर लगाता है वह वार्धुषिक ( सूदखोर ) कहलाता है और वह सभी धर्मों में निन्दित है । ( ब्रह्मा ने ) ब्याज लेने तथा भ्रूण अर्थात् गर्भपात के पापों को एक साथ तराजू में तोला । गर्भपात करने वाला ऊपर उठ गया और सूदखोर नीचे झूलने लगा ॥ २४ ॥

टि०—धर्म शास्त्रानुसार अल्प वृद्धि ही उचित मानी गयी है । वार्धुषिक या सूदखोर उसे कहा गया है जो एक महाजन से कम ब्याज पर धन लेकर दूसरे जरूरतमन्द लोगों की कठिन स्थिति का लाभ उठाकर उसी ऋण में लिये गये धन को बहुत ऊंचे ब्याज की दर पर उधार देता है । ऐसा कर्म भ्रूणहत्या की अपेक्षा भी अधिक पापजनक और गर्हित है ।

अर्थो वृद्धिः, समित्ययमुपसर्गो गृह्यते । अनेन सम्पद्यते य एकस्य हस्ताल्लघीयस्या वृद्धया द्रव्यं गृहीत्वाऽन्यस्मै भूयस्यै प्रयच्छति स एको वार्धुषिकः । अपरस्तु परेणोपायार्जितं द्रव्यं पूर्वसूत्रोक्तात् परिमाणात् भूयस्यै प्रयच्छति । अयमर्थो द्वितीयेन यच्छब्देन लभ्यते । तत्र निन्दा—सर्वधर्मेषु गर्हित इत्यादि । यो य इति वीप्सया ब्राह्मणादन्येषां निषेधो द्रष्टव्यः ॥ २४ ॥

'गोरक्षकान् वाणिजकान् तथा कारुकुशीलवान् ।
प्रेष्यान् वार्धुषिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ॥ २५ ॥

अनु०—गो आदि पशुओं के रक्षक, व्यापार करने वाले, कारीगरी का अभिनय करने वाले नट ( और चारण ) का कार्य करने वाले, सन्देशवाहक भृत्यों का काम करने वाले तथा सूदखोर ब्राह्मणों को शूद्र मानकर उनके साथ व्यवहार करे ॥ २५ ॥

टि०—इन व्यवसायों में रत ब्राह्मण यदि वेदशास्त्र का उच्च विद्वान् भी हो तो उसे शूद्रवत् समझा जायेगा । गोविन्द स्वामी के अनुसार इस सूत्र में विप्र शब्द से ब्राह्मण के अतिरिक्त क्षत्रिय और वैश्य भी अभिप्रेत है ।


१. Cf. मनु ८. १०३. गोरक्षणजीविनः, वाणिज्यजीविनः, कारुकर्मजीविनः, इत्यादि, वृद्धययाजीवो वार्धुषिकः ।

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५२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वृद्धिपरिमाणम्

गोरक्षकान् विप्रानधीतवेदानपि । एतेन क्षत्रियवैश्यावपि व्याख्यातौ । शूद्रवदाचरेत् । गोरक्षकादिब्राह्मणहिंसायामपि ब्रह्महत्या भवत्येव । साक्षिशपथे तावत् विशेषः—

सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः ।
गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ इति ॥

तथा दिव्येऽपि 'अग्निं जलं वा शूद्रस्य' इति ॥ २५ ॥

वृद्धिप्रयोगे तु स्वयमेव वक्ष्यति—

कामं तु परिलुप्तकृत्याय कदर्याय नास्तिकाय पापीयसे पूर्वौ दद्याताम् ॥ २६ ॥

**अनु०—**किन्तु प्रथम दो वर्णों अर्थात् ब्राह्मण और क्षत्रिय यदि चाहे तो धार्मिक कृत्यों को न करने वाले, कंजूस, नास्तिक और पापी व्यक्ति को इच्छानुसार ( अधिक ) वृद्धि पर धन दे सकते हैं ॥ २६ ॥

**टि०—**कदर्य से ऐसे व्यक्ति का निर्देश है जो धन होते हुए भी द्रव्यार्जन में रत है। वेद और ब्राह्मणों के निन्दक को नास्तिक कहा गया है । पापीयान् से गोविन्द स्वामी ने शूद्र अर्थ लिया है ।

परिलुप्तकृत्यो विच्छिन्नाचारः । कदर्यः सत्यपि द्रव्ये द्रव्यार्जनस्वभावः । नास्तिको वेदब्राह्मणनिन्दकः । पापीयान् शूद्रः । एतेभ्यो यथाकामं भूयस्यै वृद्धयै पूर्वौ वर्णौ ब्राह्मणक्षत्रियौ दद्याताम् । यः पुनस्स्मृतिषु ब्राह्मणस्य वार्धुष्यप्रतिषेधस्स कृतकृत्यविषयो द्रष्टव्यः ॥ २६ ॥

परिलुप्तक्रतुप्रसङ्गादन्यदुच्यते—

अयज्ञेनाऽविवाहेन वेदस्योत्सादनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ २७ ॥

**अनु०—**यज्ञ न करने, शास्त्रानुसार विवाह न होने, वेदाध्ययन को उपेक्षित करने तथा ब्राह्मण का प्रतिक्रमण करने से उच्च कुल भी निकृष्ट हो जाते हैं ॥ २७ ॥

विवाहश्शास्त्रलक्षणभार्यापरिग्रहलाभः । वेदस्योत्सादनमनध्ययनम् अधीतवेदस्योपेक्षया वा नाशः । ब्राह्मणातिक्रमं तु शातातप आह—

प्रत्यासन्नमधीयानं ब्राह्मणं यस्त्वतिक्रमेत् ।
भोजनाच्चैव दानाच्च दहत्यासप्तमं कुलम् ॥ इति ।

कुलान्युत्कृष्टान्यपि निकृष्टतां यान्तीत्यर्थः ॥ २७ ॥

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७३

इदानीं मूर्खब्राह्मणातिक्रमे दोषो नाऽस्तीत्याह—
'ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति मूर्खे मन्त्रविवर्जिते ।
ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य न हि भस्मनि हूयते ॥ २८ ॥

अनु०—मूर्ख, मन्त्रों के ज्ञान से शून्य (केवल जन्मना ब्राह्मण के घर में उत्पन्न) ब्राह्मण की उपेक्षा करने में दोष नहीं होता, क्योंकि यज्ञ में जलती हुई अग्नि को छोड़कर भस्म में हवन नहीं किया जाता ॥ २८ ॥

मूर्खलक्षणमुक्तं 'शाखातिगस्मृतो मूर्खः' (१. १०. ८) इत्यत्र । तथा च वसिष्ठः—
'यस्य चैव गृहे मूर्खो दूरे च स्याद् बहुश्रुतः ।
बहुश्रुताय दातव्यं मूर्खे नाऽस्ति व्यतिक्रमः ॥ २८ ॥
^३गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ।
कुलान्यकुलतां यान्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥
मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि ॥ २९ ॥
कुलसङ्ख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥ ३० ॥

अनु०—मन्त्रों के ज्ञान से हीन जो कुल होते हैं वे गाय-बैल, अश्व और यान रखने से, कृषि कर्म करने से तथा राजा के यहाँ सेवा कार्य करने से अकुलता को प्राप्त होते हैं । मन्त्रों से समृद्ध कुल स्वल्पधन होकर भी कुल गिने जायेंगें और बड़ी कीर्ति अर्जित करेंगे ॥ २९–३० ॥

किञ्च—
गोभिरश्वैश्चेत्यत्र संव्यवहारेणेत्यध्याहार्यम् ॥ २९-३० ॥


१. श्लोकोऽयं सदृशानुपूर्विक एव वासिष्ठे दृश्यते. See. व. ध. ३. ११. एवमेव लघुशातातपोऽपि. See. लघुशातातप. श्लो० ७७. ।
२. लघुशातातप also. ७६.
३. कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः । गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥ अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् । कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥ मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि । कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥ इति मनौ See मनु० ३. ६३–६६.

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७४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [स्वेच्छाचारनिन्दा

अधुना नानाविधानां पुरुषार्थानां परस्परविरोधं दर्शयित्वा हेयोपादेयविवेकायाऽऽह—

१वेदः कृषिविनाशाय कृषिर्वेदविनाशिनी ।
शक्तिमानुभयं कुर्यादशक्तस्तु कृषिं त्यजेत् ॥ ३१ ॥

**अनु०—**वेद का अध्ययन-अध्यापन कृषि कर्म को नष्ट कर देता है और कृषि कर्म वेद ज्ञान का विनाश करता है। जिस व्यक्ति में दोनों कार्य कर लेने की क्षमता हो वह दोनों करे किन्तु जिसमें दोनों कार्य करने की शक्ति न हो वह कृषि का परित्याग कर दे ॥ ३१ ॥

**टिप्पणी—**बौधायन धर्मसूत्र का दृष्टिकोण विशेषतः उल्लेखनीय है। यह उस काल की ओर संकेत करता है जब ब्राह्मण वेदाध्ययन के साथ-साथ कृषि भी करने लगे थे। किन्तु बौधायन० के विचार से दोनों कार्य करने के लिए प्रचुर साधन अपेक्षित थे और ये दोनों व्यवसाय स्वभावतः परस्पर विरोधी हैं । इनमें धर्म शास्त्रानुसार वेदाध्ययन या वेदाध्यापन का कर्म श्रेयस्कर है। मनु ने भी स्पष्ट कहा है कि उन सभी कर्मों का त्याग कर देना चाहिए जो स्वाध्याय में विघ्न उपस्थित करते हैं।

कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥
शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः ।
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् ।
कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥
— मनु० ३ । ६३-६५

कृषिग्रहणं वेदतदर्थज्ञानविरोधप्रदर्शनार्थम् ॥ आह च मनुः—

सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ॥ इति ॥ ३१ ॥

वेदोत्सादनप्रसङ्गादिदमन्यदुच्यते—

न वै देवान् पीवरोऽसंयतात्मा रोरूयमाणः ककुदी समश्नुते ।
चलत्तुन्दी रभसः कामवादी कुशास इत्यणवस्तत्र यान्ति ॥ ३२ ॥


१. अत्र मनुविरुद्धे । See मनु० १०. ८३, ८४.
कृषिर्वेदविनाशाय वेदः कृषिविनाशनः । इति ई. पु.

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७५

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७५

**अनु०—**स्थूल, अनियन्त्रित चित्त वाला, शब्द करने वाला या गानप्रिय, बैलों के सहारे जीविका चलाने वाला, प्राणियों को आघात पहुँचाने वाला, तीखे स्वभाव-वाला तथा स्वच्छन्द बोलने वाला, दुर्बलों को कष्ट देने वाला और अणुवत् क्षुद्र व्यक्ति निःसन्देह कदापि देवों के लोक को नहीं पहुँचते, किन्तु वहीं जाते हैं जहाँ उत्पन्न होते हैं अर्थात् इस लोक में ही चक्कर काटते रह जाते हैं ॥ ३२ ॥

**टिप्पणी—**उपर्युक्त अनुवाद गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार है । व्यूह्लेर ने अन्तिम पंक्ति 'कृशास इत्यणवः तत्र यान्ति' को भिन्न वाक्य के रूप में ग्रहण किया है और इस अर्थ में अनुवाद किया है : 'किन्तु जो (तपस्या एवं व्रत से दुर्बल बनकर) अणुओं के समान हल्के हैं वे वहाँ जाते हैं।' इस प्रकार व्यूह्लेर ने 'कृशासः इत्यणवः' बहुवचन को यान्ति के साथ जोड़ा है। गोविन्द स्वामी के अनुसार 'कृशासः' का अर्थ है दुर्बलों को पीड़ित करने वाला (कृशान् दुर्बलान् अशक्तान् अस्यति क्षिपति बाधते इति कृशासः । इसी प्रकार 'अणवः' का अर्थ है क्षुल्लकाः क्षुद्रा इत्यर्थः । किन्तु यहाँ एकवचन तथा बहुवचन का अन्तर विशेष रूप से द्रष्टव्य है । संभवतः 'अणवः तत्र यान्ति' को अलग वाक्य मानकर 'अणु के समान हल्के व्यक्ति ही वहाँ अर्थात् देवलोक को जाते हैं' ऐसा अर्थ करना अधिक संगत होगा। 'पीवरः' से 'अणवः' का विपर्यास भी उचित ही है। गोविन्द स्वामी के अनुसार इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार होगी। पीवरः-दूसरे के मांस से अपने मांस की वृद्धि करने वाला; असंयतात्मा—असंयत बुद्धि वाला, निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति रखने वाला, मन को संयत करने में असमर्थ; रोरूयमाणः-नरगानप्रिय, गन्धर्वविद्या आदि गाने बजाने में मन रमाने वाला; ककुदी—ककुदी अर्थात् बैल से जीविका चलाने वाला; चलत्तुन्दी=चलतः प्राणिनः यस्तुदति हिनस्ति, प्राणियों को जो कष्ट पहुँचाता है, मारता है, प्राणिघातक, रभसः--तीक्ष्ण, वाणी, शरीर, कर्म में उग्र या तीक्ष्ण; कामवादी-यथेष्ट बोलने वाला, बेमतलब अविचारित भाषण करने वाला ।

पीवरोऽतिपीनः परमांसेन स्वमांसं वर्धयन् । आह च मनुः—

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितॄन् देवान् ततोऽन्योऽस्त्यपुण्यकृत् ॥ इति ॥

प्यायतेर्वृद्धिकर्मण औणादिकः क्त्वरच्प्रत्ययः । असंयतात्मा असंयतबुद्धिः निषिद्धकर्माभिमुखं मनो निरोद्धुमक्षम इत्यर्थः । रोरूयमाणः रौतेश्शब्दकर्मणः क्रियासमभिन्याहारे यङ्प्रत्ययो द्रष्टव्यः । नरगानप्रियः गान्धर्वादिष्वासक्तमना इत्यर्थः । ककुदी ककुद्वान् स च बलीवर्दः, तदुपजीवीत्यर्थः । चलत्तुन्दी चलतः प्राणिनो यस्तुदति हिनस्ति तदुपजीवीत्यर्थः ।

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७६बौधायन-धर्मसूत्रम्[स्वेच्छाचारनिन्दा

प्राणिघातक इति यावत् । यद्वा चलत्तुन्दो चलदुदरः । उदरपूरणपरायणः । रभसस्तीक्ष्णो वाक्कायकर्मभिः दीर्घवैरी वा । कामवादी यथेष्टवादी निर्विशङ्कमसदृश्यं च यो भाषते । कृशासः कृशान् दुर्बलानशक्तानस्यति क्षिपति बाधते इति कृशासः । इतिशब्दः प्रकारवचनः । अणवः क्षुल्लकाः क्षुद्रा इत्यर्थः । एते देवान्न समश्नुवते । किं तर्हि कुर्वन्ति ? तत्र यान्ति यत्र जाताः, इहैव परिभ्रमन्तीत्यर्थः ॥ ३२ ॥

असंयतात्मेत्युक्तम्, तत्राऽपवादमाह—

यद्यौवने चरति विभ्रमेण सद्धाऽसद्वा यादृशं वा यदा वा ।
उत्तरे चेद्वयसि साधुवृत्तस्तदेवाऽस्य भवति नेतराणि ॥३३॥

अनु०— जो पुरुष युवावस्था में भूल करता हुआ जिस प्रकार का जहाँ भी अच्छा या बुरा कर्म करता है वह यदि उसके बाद की अवस्था में उत्तम आचरण करता है तो वह उत्तम आचरण ही पुण्य फल उत्पन्न करने वाला होता है, पूर्व अवस्था के दूसरे कर्मों का कोई फल नहीं होता ॥ ३३ ॥

टि०— यह सूत्र स्पष्टतः अधिक उदारवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है । युवावस्था में पथभ्रान्त होकर, विभ्रमवश मनुष्य जो कुछ भला-बुरा कर्म करता है उन कर्मों का उस समय कोई फल नहीं रह जाता जब वह युवावस्था के बाद उत्तम आचरण अपना लेता है । इस प्रकार युवावस्था में किये गये प्रतिषिद्ध कर्मों को पुनः न करना भी स्वतः प्रायश्चित्त है । यौवन में व्यामोह का प्राधान्य रहता है, अतः मनुष्य कर्म के उचित अनुचित स्वरूप का या समय का ठीक निर्णय नहीं कर पाता और स्वभावतः निषिद्ध कर्म करता है, किन्तु सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो भूला हुआ नहीं समझा जाता ।

उत्तरं वयः पञ्चाशद्वर्षादुपरि एतस्योर्ध्वम् । आचार्याभिमतं 'ऊनषष्टेश्च वर्षेभ्यो ह्यष्टाभ्यश्च मासेभ्यः' एतस्मादर्वाग्यौवनम् । सद्धाऽसद्वेति विहितप्रतिषिद्धोभयाभावः । यादृशं वेति प्रकारानियमः । यदा वेति कालानियमः । अयमत्राऽर्थः—यौवनोद्धतः पुरुषो व्यामोहात्पूर्वस्मिन् वयसि साध्वसाधु वाऽत्यन्तनिकृष्टमपि कर्म यदा आचरति, स चेदुत्तरस्मिन् वयसि साधुवृत्तः कल्याणाचारो भवति प्रतिषिद्धं परिहाप्य स्वविहितमनुतिष्ठति तदेवाऽस्य फलदं भवति नेतराणि दुष्कृतानि पूर्ववयोऽनुष्ठितानि । अनेन च प्रायश्चित्तारूपत्वं स्थापितं भवति । न पुनरकरणमेव प्रायश्चित्तस्य ॥ ३३ ॥

तदाह—

शोचेत मनसा नित्यं दुष्कृतान्यनुचिन्तयन् ।

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७७

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दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७७

तपस्वी चाऽप्रमादी च ततः पापात्प्रमुच्यते ॥ ३४ ॥

अनु०—मनुष्य अपने दुष्कर्मों को याद करता हुआ नित्य पश्चात्ताप करे, तपस्वी बने, धर्मकार्यों में प्रमाद का त्याग करे तब वह अपने पापों से मुक्त होता है ॥ ३४ ॥

इत्थं शोचेत मनसा-अहो कष्टं मया कृतम्, धिग्मां कामचारमदीर्घदर्शिनम्, का मे गतिः ? का मे त्राणभूमिरिति, अत ऊर्ध्वमीदृशं कर्म न करिष्यामीति दुष्कृतान्यनुचिन्तयन् अनुस्मरन्नित्यर्थः । तपस्वी कृच्छ्रादिकृत् । अप्रमादी पापस्य कर्मणः पुनरसेविता । तस्माद्यौवनकृतात्पापात् प्रमुच्यते नैवत्कुर्यात् पुनरिति निवृत्त्या पूयते तत इति । तथा च वसिष्ठः—
ख्यापनेनाऽनुतापेन तपसाऽध्ययनेन च ।
पापकृन्मुच्यते पापाद्दानाद्वाऽपि प्रमुच्यते इति ॥ ३४ ॥

स्थाविरे सुवृत्तस्य पुरुषस्य यौवने विभ्रमकृतानि पापानि दोषांशकल्पादन्ल्पतां न लभन्त इत्युक्तम्, तत्प्रसङ्गादिदमन्यदनाशङ्कनीयमुच्यते—

स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।
न तैरूच्छिष्टभावस्स्यात्तुल्यास्ते भूमिगैस्सहेति ॥ ३५ ॥

अनु०—जो व्यक्ति दूसरों को जल देकर आचमन कराता हो उसके पैरों को यदि जल की बूँदें (पृथ्वी पर गिरकर छिटक कर) स्पर्श करती हों तो उनसे किसी प्रकार की अशुद्धि नहीं होती, क्यों कि वे बूंदें पृथ्वी पर एकत्र जल के समान ही शुद्ध होती हैं ॥ ३५ ॥

इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने दशमः खण्डः ॥ १० ॥

भूमौ पतिताः पुनरुत्थाय बिन्दवः परानाचामयतः पादौ स्पृशन्ति चेत् ते पुरुषं नोच्छिष्टं कुर्वन्ति भूमिगैस्तुल्या इत्यभिधानादन्यत्राऽपि¹ भूमिगतजलमदोषमिति गम्यते । पादग्रहणादन्यत्रोच्छिष्टभावो भवत्येव ॥३५॥ १० ॥


पञ्चमाध्याये एकादशः खण्डः

सपिण्डेष्वादशाहम् ।

स्पर्शानिमित्ताशौचमभिधायाऽधुना तदभावेऽप्याशौचप्रतिपिपादयिषयाऽऽह—


१. अभूमिगतजलसंसर्गो दोष इति गम्यत इति ग० पु०

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७८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [सापिण्ड्यम्]

सपिण्डेष्वादशाहमाशौचमिति जननमरणयोरधिकृत्य वदन्त्यृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिवर्जम् ॥ १ ॥

अनु०— जन्म और मृत्यु के समय सपिण्डों के लिए दस दिन के आशौच का विधान (धर्मशास्त्रज्ञों ने) किया है, किन्तु ऋत्विक्, सोमयज्ञ की दीक्षणीया इष्टि कर लेने वाले यज्ञकर्ता तथा ब्रह्मचारी के लिए आशौच नहीं होता ॥ १ ॥

टि०— तात्पर्य यह है कि यज्ञ कराने वाला ऋत्विक् के, सोमयज्ञ की दीक्षणीया इष्टि कर लेने वाला यज्ञकर्ता के या वेदाध्ययन करने वाले ब्रह्मचारी के सम्बन्धियों में किसी की मृत्यु हो भी जाय तो इन लोगों के लिए आशौच का नियम नहीं होता। उपर्युक्त दश दिन के आशौच का नियम ब्राह्मणवर्ण के लिए ही है। क्षत्रियों के लिए ग्यारह दिन का आशौच होता है। आशौच की अवस्था में दान आदि देने का निषेध है।

समानः पिण्डो येषां ते सपिण्डाः स्मृतिशास्त्रकाराः यद्दशाहाशौचं तदेव जननं मरणं चाऽधिकृत्य वदन्ति। न ^१सर्वं ऽप्यहाशौचवचनमपि। तथा च स्मृत्यन्तरे यदतिदेशवचनम् 'जननेऽप्येवमेव स्यात्' इति तद्दशाहस्यैवाऽतिदेशिकमिति मन्तव्यम्। आशौचे तु सम्प्राप्ते दानादिष्वनधिकारः।

तथा च वृद्धमनुः—

उभयत्र दशाऽहानि कुलस्याऽन्नं न भुज्यते।
दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥
कुमारजन्मदिवसमेकं कुर्यात्प्रतिग्रहम्।
आयान्ति देवपितरस्तत्र तं बोधयन्ति च ॥
तस्मात्तद्दिवसः पुण्यः पितृवंशविवर्धनः ॥ इति ।

ब्राह्मणविषयमेतद्दशाहाशौचवचनम्। क्षत्रियादीनां तु एकादशाहादि ॥१॥

अथ सापिण्ड्यस्वरूपमाह—

^२सपिण्डता त्वासप्तमात्सपिण्डेषु ॥ २ ॥

अनु०— सपिण्डता सपिण्डों में सातवीं पीढ़ी के पुरुष तक होती है ॥ २ ॥

टि०— अपने से पहले के छठे पुरुष तक सपिण्डता मानी जाती है, इस पर आगे पुनः विचार किया गया है।

न निवर्तेत इति शेषः। तत्त्वात्मानमधिकृत्य प्रागूर्ध्वं च षट्सु पुंसु


१. सर्वत्र दशाहाशौचवचनमपि इति ग. पु.
२. सपिण्डता त्वासप्तमात्, आदन्तजननाद्योदकोपस्पर्शनम्। इति सूत्रद्वयपाठः ई.पु.

एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७९

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एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७९

भवति । तत्सन्ततिषु चोभयतोऽपि सप्तमे निवर्त्तते । सापिण्ड्यस्य संक्षेपोक्ति-
रेषा, विस्तरस्तु वक्ष्यते 'अपि च प्रपितामहः' इत्यत्र । ननु त्रिपुरुषमेव सापि-
ण्ड्यं सम्भाव्यते, पितृपितामहप्रपितामहानां पिण्डदानवचनात् । उच्यते—
पित्रादिषु त्रिषु जीवत्सु येभ्यः पिता ददाति तेभ्यः पुत्रो ददातीति परेभ्यः
त्रिभ्यः पिण्डदानं सम्भाव्यते, अत उपपद्यते सप्तमे निवृत्तिरिति ॥ २ ॥

साम्प्रतं म्रियमाणवयोवस्थाविशेषापेक्षयाऽऽशौचमाह—
'आसप्तमासादादन्तजननाद्धोदकोपस्पर्शनम् ॥ ३ ॥

अनु०—सातवां मास पूरा होने से पहले या दांतों के निकलने से पहले बच्चों
की मृत्यु होने पर सपिण्डों को स्नान मात्र करना चाहिए ॥ ३ ॥

सप्तममासादर्वागादन्तजननाद्वा बालेषु मृतेषूदकोपस्पर्शनं स्नानमात्रमेव
सपिण्डानाम् । यत्तु तस्मिन्नप्येकाहाशौचं तेन सहाऽस्य विकल्पः ॥ ३ ॥

किञ्च—
पिण्डोदकक्रिया प्रेते नाऽत्रिवर्षे विधीयते ।
आदन्तजननाद्वाऽपि दहनं च न कारयेत् ॥ ४ ॥

अनु०—तीन वर्ष की अवस्था पूरी करने से पहले मृत अथवा दांत निकलने
से पहले मृत बच्चे के लिए पिण्ड और उदक दान की क्रिया का विधान नहीं है ।
इसी प्रकार ऐसे मृत बच्चे के शव की दाहक्रिया भी न कराये ॥ ४ ॥

तृतीयवर्षमप्रविष्टस्याऽजातदन्तस्य वा पिण्डोदकक्रिया न कर्त्तव्या । दहनं
च, अवध्योर्द्वयोः स्नेहापेक्षया विकल्पः ।

नाऽत्रिवर्षस्य कर्त्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया ।
जातदन्तस्य वा कुर्यान्नाम्नि वाऽपि कृते सति ॥

तथा—
नाऽस्य कार्योंऽग्निसंस्कारो नाऽपि कार्योदकक्रिया इति ॥ ४ ॥

स्त्रीषु मृतासु कथमित्याह—
अप्रत्तासु च कन्यासु प्रत्तास्वेके ह कुर्वते ।
लोकसंग्रहणार्थं हि यदमन्त्रास्त्रियो मताः ॥ ५ ॥

अनु०—अविवाहिता कन्याओं के लिए भी पिण्डोदक दान की क्रिया न करे।


१. सपिण्डेष्वासप्तमासादादन्त इत्यादि सूत्रं पठितं ग, पुस्तके,

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८० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ द्रव्यशुद्धिः

कुछ लोग विवाहिता पुत्रियों की मृत्यु पर पिण्डोदक दान की क्रिया करते हैं, किन्तु ऐसा लोगों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए करते हैं, क्योंकि स्त्रियों को मन्त्रों से कोई सम्बन्ध नहीं होता ऐसा माना जाता है ॥ ५ ॥

टि०—विवाहिता पुत्रियों के लिए पिण्डोदक दान की क्रिया उसके पति के सपिण्ड ही करते हैं । विवाहिता या अविवाहिता मृत स्त्रियों के पिण्डोदक दान कर्म में मन्त्रों का व्यवहार नहीं किया जाता ।

अप्रत्तास्वेत्यत्र न पिण्डोदकक्रियेत्यनुवर्तते । प्रत्तास्वेके ह कुर्वत इति । पितृ-सपिण्डाभिप्रायमेतत् । तथाऽयं हेतुः—लोकसङ्ग्रहणार्थं हीति । लोकसङ्ग्रहणं महाजनवशोकारः । तस्मात्प्रत्तासु विकल्पः । आह च याज्ञवल्क्यः—

कामोदकं सखिप्रत्ताश्वश्रीयश्वशुरर्त्विजाम् ॥ इति ॥

भर्तृसपिण्डाः पुनरूढानां कुर्वीरन्नेव । तथा च वसिष्ठः—'प्रत्तानामितरे कुर्वीरन् ताश्च तेषाम्' इति । ऊढानां च अमन्त्रिकैवोदकक्रिया । आह च मनुः—

'अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः ।
संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ इति ॥ ५ ॥

²स्त्रीणां कृतविवाहानां त्र्यहाच्छुद्ध्यन्ति बान्धवाः ।
यथोक्तेनैव कल्पेन शुध्यन्ति च सनाभयः ॥ इति ॥ ६ ॥

अनु०—मृत विवाहिता स्त्रियों के बान्धव तीन दिन के बाद ही शुद्ध हो जाते हैं किन्तु उनके सहोदर भाई पूर्वोक्त नियम के अनुसार ही शुद्ध होते हैं ॥ ६ ॥

टि०—इस सूत्र पर गोविन्द की टीका नहीं है, उनकी मूल पुस्तक में इसका अभाव है ।

द्रव्यसाध्यत्वात् पिण्डदानादेर्मृतस्य रिक्थं लब्ध्वा पिण्डदानादिकं कुर्या-दिति विवेक्तुं सपिण्डसकुल्यविवेकक्रमं तावदाह—

अपि च प्रपितामहः पितामहः पिता स्वयं सोदर्या भ्रातरः सव-र्णायाः पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रस्तत्पुत्रवर्जं तेषां च पुत्रपौत्रमविभक्तदायं सपिण्डानाचक्षते ॥ ७ ॥


१. श्लोकोऽयं ख, घ, पुस्तकयोरेवमनूदितः—
अमन्त्रिकाः क्रियाः कार्याः स्त्रीषु प्रत्तास्वशेषतः ।
.........................................यथार्हसि ॥ इति ।

२. सूत्रमिदं ई० पुस्तकव्यतिरिक्तेषु सर्वेषु मूलपुस्तकेषूपलभ्यते, परन्तु न कुत्रापि व्याख्यानपुस्तकेषु ।