बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextदशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७५
**अनु०—**स्थूल, अनियन्त्रित चित्त वाला, शब्द करने वाला या गानप्रिय, बैलों के सहारे जीविका चलाने वाला, प्राणियों को आघात पहुँचाने वाला, तीखे स्वभाव-वाला तथा स्वच्छन्द बोलने वाला, दुर्बलों को कष्ट देने वाला और अणुवत् क्षुद्र व्यक्ति निःसन्देह कदापि देवों के लोक को नहीं पहुँचते, किन्तु वहीं जाते हैं जहाँ उत्पन्न होते हैं अर्थात् इस लोक में ही चक्कर काटते रह जाते हैं ॥ ३२ ॥
**टिप्पणी—**उपर्युक्त अनुवाद गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार है । व्यूह्लेर ने अन्तिम पंक्ति 'कृशास इत्यणवः तत्र यान्ति' को भिन्न वाक्य के रूप में ग्रहण किया है और इस अर्थ में अनुवाद किया है : 'किन्तु जो (तपस्या एवं व्रत से दुर्बल बनकर) अणुओं के समान हल्के हैं वे वहाँ जाते हैं।' इस प्रकार व्यूह्लेर ने 'कृशासः इत्यणवः' बहुवचन को यान्ति के साथ जोड़ा है। गोविन्द स्वामी के अनुसार 'कृशासः' का अर्थ है दुर्बलों को पीड़ित करने वाला (कृशान् दुर्बलान् अशक्तान् अस्यति क्षिपति बाधते इति कृशासः । इसी प्रकार 'अणवः' का अर्थ है क्षुल्लकाः क्षुद्रा इत्यर्थः । किन्तु यहाँ एकवचन तथा बहुवचन का अन्तर विशेष रूप से द्रष्टव्य है । संभवतः 'अणवः तत्र यान्ति' को अलग वाक्य मानकर 'अणु के समान हल्के व्यक्ति ही वहाँ अर्थात् देवलोक को जाते हैं' ऐसा अर्थ करना अधिक संगत होगा। 'पीवरः' से 'अणवः' का विपर्यास भी उचित ही है। गोविन्द स्वामी के अनुसार इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार होगी। पीवरः-दूसरे के मांस से अपने मांस की वृद्धि करने वाला; असंयतात्मा—असंयत बुद्धि वाला, निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति रखने वाला, मन को संयत करने में असमर्थ; रोरूयमाणः-नरगानप्रिय, गन्धर्वविद्या आदि गाने बजाने में मन रमाने वाला; ककुदी—ककुदी अर्थात् बैल से जीविका चलाने वाला; चलत्तुन्दी=चलतः प्राणिनः यस्तुदति हिनस्ति, प्राणियों को जो कष्ट पहुँचाता है, मारता है, प्राणिघातक, रभसः--तीक्ष्ण, वाणी, शरीर, कर्म में उग्र या तीक्ष्ण; कामवादी-यथेष्ट बोलने वाला, बेमतलब अविचारित भाषण करने वाला ।
पीवरोऽतिपीनः परमांसेन स्वमांसं वर्धयन् । आह च मनुः—
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितॄन् देवान् ततोऽन्योऽस्त्यपुण्यकृत् ॥ इति ॥
प्यायतेर्वृद्धिकर्मण औणादिकः क्त्वरच्प्रत्ययः । असंयतात्मा असंयतबुद्धिः निषिद्धकर्माभिमुखं मनो निरोद्धुमक्षम इत्यर्थः । रोरूयमाणः रौतेश्शब्दकर्मणः क्रियासमभिन्याहारे यङ्प्रत्ययो द्रष्टव्यः । नरगानप्रियः गान्धर्वादिष्वासक्तमना इत्यर्थः । ककुदी ककुद्वान् स च बलीवर्दः, तदुपजीवीत्यर्थः । चलत्तुन्दी चलतः प्राणिनो यस्तुदति हिनस्ति तदुपजीवीत्यर्थः ।