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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 117 of 486

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Page 117

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६५

न केवलमवद्योतनाद्येव शौचाकारम्। किं तर्हि ? दातुश्श्रद्धापि। तां च पुराकल्परूपेण प्रशंसति—
बीभत्सवः शुचिकामा हि देवा नाऽश्रद्दधानाय हविर्जुषन्त इति ॥ ४ ॥
**अनु०—**देवता स्वभावतः अशुद्धि से घृणा करने वाले, और पवित्रता के पक्ष-पाती होते हैं। वे श्रद्धाहीन व्यक्ति द्वारा अर्पित हवि को नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ४ ॥
**टि०—**इस सूत्र द्वारा मन की श्रद्धा को पवित्रता का हेतु माना गया है।
बीभत्सषोऽपि सन्तः अश्रद्दधानात् पुरुषाद्धविर्न जुषन्ते न सेवन्ते। तस्मान्नूनं श्रद्धाऽपि शुद्धिकारणमित्यवगम्यते ॥ ४ ॥
किञ्च—
शुचेरश्रद्दधानस्य श्रद्दधानस्य चाऽशुचेः।
मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥
प्रजापतिस्तु तानाह न समं विषमं हि तत्।
हतमश्रद्दधानस्य श्रद्धापूतं विशिष्यत इति ॥ ५ ॥
**अनु०—**श्रद्धाहीन पवित्र व्यक्ति के तथा श्रद्धासमन्वित अपवित्र व्यक्ति के अन्न के विषय में विचार करके देवों ने दोनों को समान बताया। प्रजापति ने उन देवों से कहा—ये दोनों प्रकार के अन्न समान नहीं हैं, विषम हैं। श्रद्धाहीन व्यक्ति का अन्न व्यर्थ है, श्रद्धा से पवित्र अन्न श्रेयस्कर है ॥ ५ ॥
**टि०—**इस सूत्र के भाव पर विचार करते ही रामकथा के अन्तर्गत राम का शबरी के जूठे बेर खाने के विषय में प्रसिद्ध उपाख्यान दृष्टान्तस्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कृष्ण के संबन्ध में भी अनेक ऐसे उपाख्यान हैं जिनमें उन्हें श्रद्धालु के अन्न का पक्षपाती दर्शाया गया है।
दीर्घकालं मीमांसित्वा विचार्य देवैः शुचेरश्रद्दधानस्य अशुचेश्श्रद्दधानस्य च तयोस्समीकरणे कृते देवान् प्रजापतिरब्रवीत्—विषमसमीकरणमेतद्युष्माभिः कृतं तथा मा कार्ष्टेति। किं तत्र कारणमित्याह—हतमश्रद्दधानस्य। तस्मात् श्रद्धापूतमेव विशिष्यते इति ॥ ५ ॥
किञ्च—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
अश्रद्धा परमः पाप्मा श्रद्धा हि परमं तपः।
तस्मादश्रद्धया दत्तं हविर्नाऽश्नन्ति देवताः ॥ ६ ॥
८ बौ०ध०