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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 119 of 486

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Page 119

षष्ठमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ६७

अनु०—किन्तु शाक, पुष्प, फल, मूल, वनस्पतियों का जल से प्रक्षालन करना चाहिए ॥ ९ ॥

तुशब्दो विशेषप्रायत्यप्रदर्शनार्थः। तच्चाऽस्पृश्यप्रदर्शनार्थम्। तत्र चैतद्विधानम्। एतेषां पुनः मूत्राद्युपहतानामल्पानां त्यागः, बहूनां तन्मात्रत्यागः, शिष्टानां प्रक्षालनमभ्युक्षणं वा ॥ ९ ॥

मूत्रपुरीषोपहतस्य शरीरावयवस्य शौचं वक्तुं मूत्रपुरीषकरणं तावदाह—

'शुष्कं तृणमयाज्ञिकं काष्ठं लोष्ठं वा तिरस्कृत्याऽहोरात्रयोरुदग्दक्षिणामुखः प्रावृत्य शिर उच्चरेदवमेहेद्वा ॥ १० ॥

अनु०—यज्ञ में काम न आने वाली सूखी हुई घास, यज्ञ में काम न आने वाली लकड़ी का टुकड़ा, अथवा मिट्टी का ढेला भूमि पर रखकर, दिन में उत्तर की ओर मुख कर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख कर, तथा सिर को वस्त्र से ढंककर मल और मूत्र का त्याग करे ॥ १० ॥

अयाज्ञिकं शुष्कं तृणादि तिरस्कृत्याऽन्तर्धाय भूमिम, अहन्युदङ्मुखो रात्रौ दक्षिणामुखः प्रावृत्य शिर उच्चरेदवमेहेद्वा मूत्रपुरीषे च। तथा च वसिष्ठः—'भूमिमयज्ञियैस्तृणैरन्तर्धाय मूत्रपुरीषे कुर्यात्' इति ॥ १० ॥

मूत्रे मृदाऽद्भिः प्रक्षालनम् ॥ ११ ॥

अनु०—मूत्र त्याग करने पर ( मूत्रेन्द्रिय का ) मिट्टी तथा जल से (एक बार) प्रक्षालन करे ॥ ११ ॥

लिङ्गस्य कार्यमिति शेषः। सकृदिति च ॥ ११ ॥

त्रिः पाणेः ॥ १२ ॥

अनु०—हाथ को मिट्टी तथा जल से तीन बार धोए ॥ १२ ॥

मृदाऽद्भिः प्रक्षालनमित्यनुवर्त्तते। तत्राऽपि सव्यस्य सकृत्। 'उभयोर्द्विद्विरि''ति विनिर्देशः कल्प्यः ॥ १२ ॥

तद्वत्पुरीषे ॥ १३ ॥

अनु०—इसी प्रकार मल त्याग करने पर भी प्रक्षालन करे ॥ १३ ॥


१. शिरः प्रावृत्य कुर्वीत शकृन्मूत्रविसर्जनम् । अयज्ञियेरनाद्वैश्च तृणैस्संछाद्य मेदिनीम् ॥ इति कात्यायनः । See मनु also. ४. ४९ ।