बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextनवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ६१
को बेचने वाले व्यक्ति को छूने पर ब्राह्मण वस्त्रों को धारण किये हुए ही जल में प्रवेश कर स्नान करे ॥ ५ ॥
ऋज्वेतत् ॥ ५ ॥
किञ्च—
आत्मशय्याऽऽसनं वस्त्रं जायाऽपत्यं कमण्डलुः ।
शुचीन्यत्मन एतानि परेषामशुचीनि तु ॥ ६ ॥
अनु०— अपनी ही शय्या, अपना आसन, अपने वस्त्र, अपनी पत्नी, अपने बच्चे और अपना कमण्डलु-ये सभी अपने लिए पवित्र होते हैं, किन्तु दूसरों के लिए ये सभी अपवित्र होते हैं ॥ ६ ॥
स्पष्टमेतत् ॥ ६ ॥
आसनं शयनं यानं¹ नावः पथि तृणानि च ।
²चण्डालपतितस्पृष्टं मारुतेनैव शुध्यति ॥ ७ ॥
अनु०— आसन शय्या, यान, नौका, मार्ग और घास चण्डाल या पतित व्यक्ति द्वारा स्पृष्ट होने पर वायु से ही शुद्ध हो जाते हैं ॥ ७ ॥
टी०— गोविन्दस्वामी के अनुसार यदि आसन और शय्या आदि की चण्डाल या पतित ने छू दिया हो तभी उसकी शुद्धि वायु द्वारा अपने आप मानी जाती हैं अन्यथा यदि वे उन पर बैठे या सोए हों तो शुद्धि करनी पड़ती है ।
पन्थानो भूमिविषयाः । नौः दारुमयी फलका । आन्दोलिकादीन्यपि द्रव्याणीति केचित् । एषामन्यतमानीत्यव्याहार्यम् । तत्राऽपि स्पर्शनमात्रेऽदोषः । एतद्व्यासनादिषु तु यथादोषं शौचं कर्तव्यम् ॥ ७ ॥
किञ्च—
खलक्षेत्रेषु यद्धान्यं कूपवापीषु यज्जलम् ।
अभोज्यादपि तद्भोज्यं यच्च गोष्ठगतं पयः ॥ ८ ॥
अनु०— जो अनाज खलिहान में हो जो जल कूप या तालाब में हो तथा जो दूध गायों के रहने के स्थान पर हो वह ऐसे व्यक्ति से भी, जिसका अन्न खाना निषिद्ध है, लेकर प्रयोग में लाया जा सकता है । ॥ ८ ॥
१, नौः पन्थाश्च, इति क. पु.
२. 'श्वचण्डाल' इति. ई. व्यतिरिक्तैषु मूलपुस्तकेषु.