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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

२१६ अकबल बीरबल विनोद

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२१६ अकबल बीरबल विनोद

भाषण किया। कर्मचारी आज्ञा पाते ही एक कोड़ा हाथ में
लेकर सामने आया। उसे देखकर वेश्या डर गई, और तुरत
अपना कसूर गरदान लिया।” वह बोलो-“पृथ्वीनाथ ! मैं
इस कन्या को आज से तीन चार वर्ष पहले एक आदमी से
खरीदा था। वह आदमी मुझे झाँसा पट्टी पढ़ा इसके बदले में
काफी धन हड़प ले गया है। आप मेरे अपराधों को क्षमा करें।”
लड़की का पिता बीरबल के इसारे से अपनी कन्या के
पास खड़ा हो गया; बीरबल ने उस लड़की से पूछा-“क्या तू
इस आदमी को पहचानती है ? क्या इसकी शक्ल तेरे पिता से
मिलती है ?” लड़की को डर उत्पन्न हो गया, उसने
सोचा कि अगर झूठ बोलती हूँ तो बीरबल बीच सभा में
कोड़े लगवावेगे। अतएव सच बोलना ही अच्छा है। उसने
कहा-“हाँ हाँ यही मेरे जन्मदाता पिता हैं।” इतना कहकर वह
अपने पिता के चरणों पर गिर पडी, पिता ने उसे उठाकर छाती
से लगा लिया। बीरबल ने कहा-“वेश्या अब तेरे पास और कोई
सफाई देने की बात नहीं रही, तू एक साथही तीन अपराधों में
गिरफ्तार हुई है। पहला अपराध अबोध कन्या के फुसलाने
का, दूसरा दास ब्योसाय को तरक्की देने का और तीसरा
धोखा देने का है। इसलिये तुमको सात वर्ष की सजा दी जाती
है।” वह सिपाहियों द्वारा तत्क्षण कैद करली गई और वे
उसे लेकर कारागृह का मार्ग लिये। तब बीरबल उस
वृद्ध पुरुष को समीप बुलाकर बोले-“मैं तुम्हारी कन्या को
तुम्हें देता हूँ, परन्तु साथही इस बात की हिदायत भी करता
हूँ कि अब यह लड़की तुम्हारे यहाँ न रह सकेगी, इसलिये

अकबर बीरबल विनोद २२०

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अकबर बीरबल विनोद २२०
तुम्हारो और इसकी इसी में भलाई है कि एक अच्छे बर की
तलाश कर इसकी यथाशीघ्र शादी कर दो।” बूढ़े मनुष्य ने
दीवानकी उचित सलाह को मानने का बचन दिया और उससे
बिदा हो अपनी कन्या के साथ खुशी २ घर लौट आया।
महाकाली के ठट्ठे
एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली ने
अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि
समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख
हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार
गया। इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने
मन में विचारा—“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को
देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह कुछ भी भयभीत न
हुआ। दूसरे मुझे देखकर हँसा, तीसरे तुरत ही गमगीन
भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद
लेना चाहिये। वह प्रगट में बोली-“भक्तवर बीरबल !
तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।”
बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर-
यामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी
आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने
का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित
हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।”
जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन

२२१ अकबर बीरबल विनोद

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२२१ अकबर बीरबल विनोद
दिया तो बीरबल बोला-“हे जगज्जननी जी! मैं अपने
मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ
एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर
हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने
पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते २
थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार
नाकों को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी। मुझे
इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त
बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती
हुईं अन्तर्धान हो गई।
हम दोनों एक साथ आवेंगे
एक दिन कोचीन नगर से चलकर दो व्यापारी दिल्ली
शहर में आये और घूमते फिरते एक नगर सेठ के पास जापहुँचे।
नगर सेठ के सात्विक और सरल स्वभाव को देख कर इनके
मन में बेईमानी समाई और उसे ठगने का विचार किया। ये
थोड़ेसे आभूषण भी अपने साथ लाये थे, उसे व्यापारीको दिख-
लाकर बोले-“आप मेरे इन आभूषणों को बिकवा दें तो हमपर
आपका बड़ा उपकार होगा।” व्यापारी आभूषणों को देखकर
उत्तर दिया-“आपका कहना बहुत ठीक है, पर यह कोई लड़कों
का खेल नहीं है जो इधर बनाया और उधर बिगाड़ दिया।
जब मैं इसे कुछ लोगों को दिखलाऊँगा और उन्हें पसन्द
आयेगा तब कहीं बिकेगा। आप लोग आभूषणों को मेरे
यहाँ छोड़ जाइये, फिर दूसरे दिन दोपहर में आना।”

अकबर बीरबल विनोद २२२

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अकबर बीरबल विनोद २२२
ठगों ने कहा-"बहुत अच्छा, हम कल दोपहर को आपके
पास आवेंगे, परन्तु आप भी एक बातका ध्यान रखना कि
जब हम दोनों ही एक साथ होकर आवें तो आभूषणों को देना
अन्यथा नहीं।" वे ठग इस प्रकार उसे बातों में बाँधकर
वहाँ से आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर वे फिर वापस
लौटे। उनमें से एक आदमी कुछ दूर मोड़ पर एक
आदमी से झूठी गप्प मारने लगा और दूसरा उस सेठ की
दूकान पर पहुँचकर बोला-"सेठजी ! हमारा विचार रास्ते
में जाकर पलट गया इसलिये हमको फिर लौटकर आपके पास
आना पड़ा। हम चाहते हैं कि इस समय आप हमारे आभूषणों
को लौटा दें, कल दोपहर को हम इनको लेकर आपके
पास आवेंगे, तबतक आप भी ग्राहक ठीक कर रक्खें।" सेठने
कहा-"तुम्हारी चीज तुमको लौटाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं
है परन्तु तुमारा दूसरा साथी कहाँ है; उसको भीअपने साथ
लेकर आओ।" ठगने अँगुली का संकेत कर उसे नुक्कड़ पर एक
दूसरे आदमी से बातचीत करते हुए दिखलाया। व्योपारी ने
देखा तो बात सही थी। वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर किसी से कुछ
वार्तालाप कर रहा था। व्योपारी को अब कोई शक न रहा,
वह आभूषणों को तत्काल उसे दे दिया और अपने काम में
दत्तचित्त हुआ। उसको इनकी तरफ से कोई शंका नहीं
थी क्योंकि उसका हृदय साफ था। इससे वह दूसरोंको भी
अपने ही समान समझता था।
दूसरे दिन दोपहर के समय दूसरा ठग आया और सेठ
से अपने गहनों की माँग। सेठने कहा-"गहने तो कल ही

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२२३ अकबर बीरबल विनोद
यहाँ से ले गये अब फिर क्या माँगने आये हो। ठग बोला-
“कौन ले गया ?” सेठने उत्तर दिया-“तुम्हारा साथी।”
वह कुछ क्रुद्ध होकर बोला-“आपने यह अनुचित किया है
हमने आपको उसी समय सचेत कर दिया था कि जब हम
दोनों एक साथ होकर आवें तो आप गहनों को वापस देना; फिर
आप अकेले एकको क्योंकर दिया। आपकी यह थोथी दलील
है, हमारा आभूषण हमें दीजिये।” सेठने जवाब दिया-“आप
भी तो उस नुकड़ पर खड़े थे, जब कि आपका भाई लेने
आया था।” ठग बोला-“इससे क्या ! मैं उसे गहने
वापस लेने को नहीं कहा था। आप मेरे आभूषणों को
वापस दें नहीं तो मैं आप पर नालिश करूँगा और नाहक
आपको भी जेरबार होना पड़ेगा।” सेठ भी कुछ कहता और
यह भी कुछ कहता, यहाँतक कि कहासुनी में घण्टों बीत
गया; परन्तु वह ठग किसी प्रकार राजी नहीं होता था।
तब क्रुद्ध होकर नगर व्योपारी ने कहा-“जा जो तेरे
जीमें हो सो कर, मैंने तेरा कुछ कर्ज नहीं खाया है जो मुझे
धमकी देता है।”
ठग का तो मन बढ़ा ही था वह तत्क्षण बीरबल के पास
जाकर फर्यादी हुआ। बीरबल उसकी फर्याद सुनकर तुरत
व्योपारी को बुलवाया, जब वह आया तो बोला-“यह क्या
कहता है, इसका व्योरा बतला।” वह व्योपारी शुरू से
आखीर तक जो जो बातें हुई थीं बयान किया और तीन
चार प्रतिष्ठित पुरुषों को साक्षी दिलवाई। बीरबल सारी
बातों को सुनकर निश्चित कर लिया कि नालिश झूठी है

अकबर बीरबल विनोद २२४

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अकबर बीरबल विनोद २२४
परन्तु फिर भी बिना किसी अपराध में गिरफ्तार किये सजा
भी नहीं दी जा सकती। अतएव वह नालिश करने वाले
व्योपारी से बोला-“तुमने यही कहा था न कि हम दोनों जब
एक साथ आवें तभी आभूषणों को वापस देना?” उसने
कहा-“हाँ, जो आप कह रहे हैं बिल्कुल कौड़ी पाई सत्य है,
यही बात पक्की हुई थी।” तब बीरबल बोला-“जब ऐसी
शर्तें तय हुई हैं तो फिर तुम अकेले क्योंकर आये। आप अपने
भाई को साथ लेकर आओ तो मिलेगा।”
ठग की दाल न गली बीरबल की ऐसी आज्ञा सुन वह
वहाँ से खिसक गया। बीरबल नगर सेठ से बोला-“सेठजी!
देखना, यदि यह इतने पर भी न माने और कदाचित आपसे
फिर आभूषण माँगने आवे तो दोनों को मेरे पास पकड़ कर
लाना। यदि दोनों ही साथ आवे तो अति उत्तम हो, नहीं तो
इसे तो कदापि न छोड़ना।” सब लोग बीरबल की अनुमति
से अपने २ घर गये; परन्तु ठगों का फिर कहीं पता न चला।

सुनार के हथकोड़े
एक रोज बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्या यह बात
सही है कि कारीगर लोग मालिक की आँखों में धूल झोंककर
अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं? इस विषय की लोगों में
बराबर चरचा सुनने में आती है।” बीरबल ने कहा-“पृथिवी-
नाथ! यह तो आँख देखी और कान सुनी बात है। जो जिस
काम को करता है, वह उसमें पंडित हो जाता है। बादशाह

२२५ अकबर बीरबल विनोद

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२२५ अकबर बीरबल विनोद
ने फिर पूछा-“तो क्या सुनार लोहार दर्जी पेशा के सभी
चोर ही होते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“मैं यह कैसे कह
सकता हूँ कि सभी कारीगढ़ चोर ही होते हैं, परन्तु फिर भी
कितनों की चोरी सब को विदित हो चुकी है। जैसे सुनार
ही को लीजिये । इनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि
कोई चाहे कितनी ही इनकी चौकसी करे, परन्तु ये
येनकेन प्रकारेण माल में से चोरी कर ही लेते हैं। इनकी इस
कला की चालाकी संसार में विख्यात है, लोग तो यहाँ तक
कहते हैं कि दुनियाँ की बातें तो दरकिनारे रहीं। ये अपने माता
पुत्री तथा बहनों के आभूषणों में से भी चोरी करते हैं। यदि
कहीं चुराना भूल गये तो समझ लीजिये कि उस रात में
उन्हें नींद हराम हो जाती है ये कपटमुद्रा कर जबतक उसमें
से कुछ माल निकाल न लेंगे, तबतक इनके पेट में चूहे
कूदा करेंगे ।
इस सम्बन्ध की एक घटना मेरी आँखों के सामने भी
घटी है, उसपर जरा विचार कीजिये। एक गाँव में एक वृद्ध
सुनार रहता था बुढ़ापे के कारण वह सुनारी का काम नहीं
कर सकता था। इसलिये विवश होकर दूकान में बैठा बैठा
अपने एकलौते लड़केको सोनारी का काम सिखाया करता था।
यदि लड़का कहीं चूक करता तो वह तुरत उसकी भूल सुधरवा
देता था। दैवयोग से उस वृद्ध सुनार की लड़की ससुराल
से पीहर आई। उसे भी कुछ सोने के गहने बनवाये थे।
अतएव अन्य जगह न देकर उसने अपने भाई से ही गहने
बनवाना उत्तम समझा। उसका ख्याल था कि भाई के हाथ
१५

अकबर बीरबल विनोद २२६

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अकबर बीरबल विनोद २२६
से बने हुए गहनों में फरक नहीं पड़ेगा। दूसरे सुनारों का
क्या विश्वास ।
वह अपना सब सोना भाई को देकर आप उसके पास
बैठकर गहने बनवाने लगी। उसका बूढ़ा बाप भी वहीं
दूकान में बैठा हुआ था। बूढ़े ने मन में अनुमान किया-
"जो मैं लड़के से प्रगट रूप में कहता हूँ तो लड़की सारी
बातें जान जायगी और यदि नहीं कहता हूँ तो लड़का
बहन के गहने सोच कर उसमें से चोरी नहीं करेगा। तब तो
मेरे इस पेशेका नाम कलंकित होगा।" वह अँगड़ाई लेता हुआ
बोला-"अरे राम अपने लिये तो सभी एक समान हैं।" ठग
जाने ठगही की भाषा, ताते उमा गुप्त करि राखा।" वाली
घटना घटी। लड़का बाप की शिक्षा से धीरे धीरे पंडित
हो चुका था। उसने अपने पिता के कहने का भावार्थ
समझ लिया; परन्तु प्रगट रूप से पिता को कुछ उत्तर नहीं
दिया । बूढ़े ने समझा कि शायद लड़के को मेरा
सांकेतिक शब्द समझ में नहीं आया अतएव रह रह कर
वही पहले वाला शब्द पुनःपुनः कहने लगा। लड़का दत्तचित्त
हो अपनी बहन से बातें करता हुआ गहने गढ़ रहा था।
पिता के बारबार के टोकारे से खीझ कर बोला-"पिता जी !
आज आप इतना राम राम क्यों कह रहे हैं। अरे राम ने तो
बहुत पहले ही लंका नगरी को लूट लिया था, अब उसमें
रक्खा ही क्या है।
अपने लाड़िले से ऐसा सन्तोषप्रद उत्तर पाकर वृद्ध गद-
गद हो गया और उसे अपने पुत्र पर बहुत भरोसा हुआ।

२२७ अकबर बीरबल विनोद

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२२७ अकबर बीरबल विनोद
वह लड़का “कौवा से कबेला चतुर ।” वालो कहावत पहले
ही चरितार्थ कर सोने की एक गुल्ली माल में से कपट कर
राख में छिपा दिये था। इस घटना को सुनकर बीरबलने कहा-
“पृथ्वीनाथ! कारीगर बड़े बज्र बेहया होते हैं। वे अपने कला में
जब तक चोरी करना नहीं जानते तबतक उनको अपने कारीगर
होने में सन्देह ही बना रहता है। आप इसे पक्का समझें कि जो
जितना बड़ा कारीगर होता है वह उतनाही चोर भी होता है।
यही इनकी विशेषता है कि माल चुरा लेते हैं और दूसरों पर
इनका भेद प्रकट नहीं होने पाता। सुनार तो शास्त्रों द्वारा इस
फन में विख्यात हैं। इनका नाम शास्त्रकारों ने “पश्यतो
हर” बतलाया है। इसका भावार्थ यह है कि यह आँख के
सामने ही चोरी करते हैं, परन्तु देखने वालों की बुद्धि कुछ
काम नहीं करती।”
व्यसनी की लत
एक दिन बादशाह बीरबल के साथ नगर में होकर हवा
खोरी के लिये निकला था। एक जगह नुक्कड़ पर उसे एक
औरत दिखाई पड़ी। वह महा फूहड़ देख पड़ती थी। उसके
मोटे मोटे होठों के बीच से दो बड़े २ दाँत बाहर को झाँक रहे
थे। नाक से पोटा जारी था। मलीन वस्त्र, खुले बाल और शरीर
पर मिट्टी पानी मिश्रित दाग पड़े हुए थे। बात करते समय
मुँह से थूक बाहर निकला आता था। कहाँ तक कहें वह
सर्वांग फूहड़ थी। राजा की तो बात ही अलग है, उसके

अकबर बीरबल विनोद २२८

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अकबर बीरबल विनोद २२८
हाथ के स्पर्श किये फल तक भी किसी रंक का खाने को जी
नहीं चाहता था। वह स्त्री गर्भिणी थी। यह देखकर बादशाह
को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बीरबल से बोले- "बीरबल !
जरा कामदेव का प्रबल प्रभाव तो देखो ! जिसके देखने
मात्र से घृणा उत्पन्न होती है, उसके साथ रमण करनेवाला
भला कैसा होगा ?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! भूखे को जूठा
मीठा नहीं सूझता। निद्रा देवी के आवाहन के समय मुलायम
सेज वा जमीन का विचार नहीं उठता। उसी प्रकार कामकी
ज्वाला के सामने भी भले बुरे का परिज्ञान भूल जाता है।
उस समय काम से पीड़ित व्यक्ति को न जात सूझता है न
कुजात। आपको अन्वेषण करने पर ऐसे बहुतेरे पुरुष मिलेंगे
जो देखने में तो बड़े सुन्दर और फिटिक बाज होंगे, परन्तु
ऐसी २ गलीज जगहों में उन्हीं का नम्बर निकलता है।"
बादशाह ने कहा-"हाँ तुम्हारा कहना भी सत्य हो सकता है।
इसलिये मैं चाहता हूँ कि इससे रमण करने वाले की खोज की
जाय। मैं उसे देखना चाहता हूँ। बीरबल बोला- "शायद कुछ
देर अगल बगल के लोगों से पूछताछ करने पर कुछ भेद खुले।
ऐसा विचार कर वे वहाँ से कुछ दूर निकल गये, परन्तु
बीरबलको उस बात की ही धुन बँधी रही। वह बराबर उसी
स्त्री की तरफ लगा हुआ था। थोड़ी देर बाद एक ऐसी घटना
घटी कि एक कामी पुरुष उसके बगल से होकर निकला और
उस स्त्री से कुछ संकेत द्वारा कहकर आप आगे निकल गया।
वह देखने में किसी उच्च कुल का जान पड़ता था, परन्तु

२२६ अकबर बीरबल विनोद

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२२६ अकबर बीरबल विनोद
स्वभाव से लम्पट प्रगट होता था । बीरबल ने उसे बादशाह
को दिखाकर कहा-"पृथिवीनाथ ! यही पुरुष उस स्त्री का
यार जान पड़ता है।" बादशाह को बीरबल की बातों से
आश्चर्य हुआ और वे बोले- "इसपर कैसे विश्वास किया जाय ?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"उसकी तरफ कुछ देर तक ध्यान-
पूर्वक देखने से आपको स्वयं सिद्ध हो जायगा।" बादशाह ने
बीरबल के कहने का अनुशरण किया। वे अनजानों की
तरह उसकी दृष्टि बचा कर बराबर उसी तरफ देखते रहे। कुछ
कालोपरान्त वह लम्पट फिर घूम कर आया और अँगुली के
संकेत से उसे कुछ कहकर आप अग्रसर हुआ। महामायां
भी उसके पीछे २ चलीं। कुछ देर के बाद वे दोनों एक गली में
मुड़कर इनकी आँखों से ओझल हो गये।
यह देख कर बादशाह का भ्रम मिट गया और उन्हें उस लम्पट
का जार उस होना निश्चित हो गया। परन्तु फिर भी उधर ही
दृष्टि अड़ाये रहे। अब ये दोनों आगे बढ़े। बादशाह को बीरबल
की परख पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। इसलिये बीरबल को
छेड़कर बोले-"बीरबल ! तुम्हारी परख तो बड़ी सच्ची
निकली। परन्तु यह तो बतलाओ कि पहले तुमने उसको
कैसे पहचाना था।" बीरबल बोला-"पृथिवीनाथ ! यह सब
आँखों की खूबियाँ हैं। हम लोग नगर में निकलते हैं तो बरा-
बर रास्ते में आने जाने वालों की चाल ढाल का निरीक्षण
किया करते हैं। जिससे आँखों को मनुष्यों से मिलकर वा दूर
से देखकर उनके आचरण समझलेने की शक्ति प्राप्त हो
गई है। मैं बहुत देर से बराबर उस लम्पट की हरकतों

अकबर बीरबल विनोद २३०

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को देख रहा था। पहले जब वह आया तो उसके हाथ
पर केवल खैनी थी। चूने की तलाश में अगल बगल की
दीवारों को देखता जा रहा था। दैवात् एक सण्डास पर
ताजा चूना छूया गया था। झट अँगुलियों से चूना पोछकर
खैनी बनाकर खा लिया। अब आपही बतलावें कि जो
सण्डास का चूना खैनी में मिलाकर खाने में नहीं हिचकता
उसके लिये यह काम करना कौनसा आश्चर्य है।” उसी
समय मुझे विदित हो गया कि यह व्यक्ति व्यसनों का सच्चा
गुलाम है। बादशाह को बीरबल की ऐसी गुप्त पहिचान
से बड़ी प्रसन्नता हुई और वह घर आकर उसको एक जोड़ी
दुशाला पारितोषिक दिया।
━०*०━
लोहा और पारश का स्पर्श
एक दिन सन्ध्या समय बादशाह बीरबल को साथ ले
घोड़सवारी द्वारा हवा खाने के लिये महल से बाहर निकले। ये
आपस में वार्तालाप करते हुए मध्य बाजार में जा पहुँचे। वहाँ
सब प्रकार की वस्तुएँ बिक रही थीं, परन्तु इन्हें क्या प्रयोजन
जो कहीं उतर कर कुछ सौदा खरीदते। इसी बीच बादशाह
की दृष्टि एक वृद्धा स्त्री पर पड़ी। उसके हाथ में पुरानी म्यान
से ढकी हुई एक तलवार लटक रही थी। उसकी तलवार
देखते ही बादशाह के जी में आया कि अक्सर पुराने
लोगों के पास अच्छी वस्तुए निकल आती हैं। इसलिये

२३१ अकबर बीरबल विनोद

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२३१ अकबर बीरबल विनोद


इस वृद्धा की तलवार को देखना चाहिये। वह घोड़े की
राश को बुढ़िया की तरफ मोड़ दिया। जब घोड़ा उसके
समीप पहुँचा तो बादशाह ने उस वृद्धा से पूछा- "यह
तलवार लेकर तू शहर में क्यों खड़ी है?" बुढ़िया ने
दीनता भरी बाणी से कहा- "गरीबपरवर! मैं इसे बेचना
चाहती हूँ। यह तलवार बहुत दिनों से मेरे घर में पड़ी हुई है
आज बड़ी गिरीवस्था को प्राप्त होकर और कोई दूसरा
सामान न रहने पर इस बेचने की गरज से बाज़ार में लाई हूँ।"

बादशाह उससे तलवार माँग उसे म्यान से निकालकर
देखने लगे। वह एकदल खराब हो गई थी। उस पर जंग का
गहरा परदा पड़ गया था और उसकी धार भी कई जगह से
टूट गई थी। बादशाह ने बुढ़िया की तलवार को ज्यों का
त्यों लौटा दिया। वह उसको हाथ में लेकर बड़े गौर से
देखने लगी। ऐसा मालूम होता था मानो उसकी तलवार
बदल गई हो। इसको ऐसी भौचक सी हुई देखकर बादशाह ने
पूछा- "क्या बात है ! तेरी तलवार बदल तो नहीं गई है ?"
वह वृद्धा बोली- "पृथिवीनाथ ! मैंने सुना था कि पारस के
स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है, परन्तु यह हमारी लोहे की
तलवार आपके पारस हाथों के स्पर्श से सोने की क्यों नहीं
हुई। बस मैं यही देख रही हूँ।" बादशाह वृद्धा के इस उत्तर से
गदगद हो गये और उसको तलवार के बराबर सोना देने
की आज्ञा दी।

बीरबल अभी तक खड़े खड़े इनकी सब बातें सुन रहा
था। बुढ़िया की बुद्धिमत्ता भरी बातें सुन और बादशाह

अकबर बीरबल विनोद २३२

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अकबर बीरबल विनोद २३२
की उदारता देखकर उसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। दोनों
सानन्द घोड़ा बढ़ाते हुये नगर से बाहर निकले।
तुम बड़े गदहे हो
एक दिन बीरबल और बादशाह दोनों एक साथ बैठे हुये
आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी बीच बीरबल को
वायु सरी। बादशाह ने कहा-"बीरबल तुम बड़े गदहे हो।"
बीरबलने उत्तर दिया-पृथिवीनाथ ! पहले तो मैं ऐसा नहीं था
परन्तु गधों की संगत में पड़कर गधा हो गया हूँ। बीरबल
के ऐसे उत्तर से बादशाह की बोलती बन्द हो गई।
कौन कौन क्या क्या नहीं कर सकता
एक दिन का यह समाचार है कि अकबर बादशाह
दरबार में बैठे हुए सरकारी कामों को दत्तचित्त होकर
देख रहे थे। जब वे उन कामों से निवृत्त हुए तो उन्हें
गपाष्टक करनेकी सूझी और कुछ मुसाहिबों को साथ में लेकर
आकाश पाताल की बातें करने लगे। कोई किसी विषय को
लेकर विवेचन, करता, तो कोई किसी विषय को। इसी
बीच बादशाह को पुराने कवियों का कहा हुआ एक दोहा
याद आया-
दोहा-"क्या नहिं अबला करि सकै, क्या नहिं सिन्धु समाय।
क्या नहिं पावक जर सकै, क्यो काल न.हिं खाय ॥"

२३३ अकबर बीरबल विनोद

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२३३ अकबर बीरबल विनोद
वे दरबारियों से उपरोक्त दोहे का उत्तर पूछ बैठे, पर अफ-
सोस कि एक दरबारी भी उत्तर देने को समर्थ न हुआ। तब
बादशाह ने दीवानखाने से बीरबल को बुलवाया। जब वह
आया तो उससे उसी दोहे का उत्तर पूछा-बीरबल अपनी
बुद्धि से ऐसे ऐसे चुटकुलों को अँगुली पर नचाया करता
था, वह तुरत बोला:-
“पुत्र न अबला कर सके, यश नहिं सिन्धु समाय।
धर्म अग्नि में नहिं जलै, नाम काल नहिं खाय ॥”
बीरबल के ऐसे सटीक उत्तर को सुनकर बादशाह बहुत
सन्तुष्ट हुए और बीरबल को कई बहुमूल्य आभूषण पारि-
तोषिक में दिया। सभासद् बीरबल का मुख निहारते रह
गये। उन लोगों ने बीरबल के बुद्धि की भूरि २ प्रसंशा की।
दीपक तले अँधेरा
एक दिन बादशाह अपनी सबसे ऊँची छतपर बीरबल के
साथ बैठे हुए हवाखोरी कर रहे थे इसी बीच उनके सामने
ही कुछ दूरी पर एक यात्री को कई चोर मिलकर लूटते हुये
दिखाई पड़े। विचारे यात्री का कुछ वश नहीं चलता था।
सारा धन लुट जाने पर उस यात्री ने बादशाह के महल के
समीप पहुँच कर बम लगाया-“बड़े दुख की बात है, कि मैं
सरकार के देखते देखते सरे बाजार लुटगया। बादशाह को
इस यात्री की करुण कथा पर बड़ी दया आई और वे बीरबल

अकबरवीरबल विनोद २३४

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अकबरवीरबल विनोद २३४
को डाँटकर कहा-“क्यों बीरबल ! क्या ऐसा ही प्रबन्ध करते
हो। जब हमारी आँखों के सामने विचारे परदेशी लुटे जाते हैं
तो आँख पीछे क्या होता होगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-
“पृथ्वीनाथ ! क्या आप नहीं जानते कि दीपक तो दूसरों को
प्रकाश देता है, परन्तु उसके तले अँधेरा ही बना रहता है।”
बादशाह बीरबलकी बातें सच्ची मानकर खामोश रह गये।
—:*:—
बादशाह के चार प्रश्न
एक दिन जब कि कड़ाके की शर्दी पड़ रही थी। बादशाह
बीरबलके साथ अपने बागमें टहलते हुए धूप खा रहे थे। उनके
मन में अचानक एक तरंग उठी और उसके निराकरण के
लिये बीरबल को मध्यस्त बनाकर पूछेः-
“कौन बोलने को चहै, और कौन चहै है चूप।
कौन चहै है बरसनो, कौन चहै है धूप ॥”
इतना कहने के साथही बादशाह बीरबल को धमका कर
बोले-“यदि आजके चारों सवालों का समुचित उत्तर न दे सकोगे
तो जान से मारे जावोगे।” बीरबल को बादशाह का कथन
सुनकर बड़ी करुणा आई; क्योंकि बादशाह सचमुच उसकी
जान मारने को उतारू होगये थे। दूसरे करुणा इसलिये
आई कि इतने छोटे से प्रश्न के लिये बादशाह इतना उग्ररूप
क्यों धारण करते हैं। इसका उत्तर तो एक बुद्धिमान लड़का
भी समझ कर दे सकता है। खैर इस समय तो अपनी जान
बचानी चाहिये। ऐसा विचार कर वह बोला-

२३५ अकबर बीरबलविनोद

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२३५ अकबर बीरबलविनोद


“माली बरसन को चहै, धोबी के मन धूप ।
साई चाहै बोलना, चोर चहै जू चूप ॥”
बादशाहको बीरबल का यह युक्तिसंगत दोहा बहुत भला
मालूम हुआ, परन्तु वह उससे और भी सरलार्थ चाहते थे
इसलिये फिर बोले-“बीरबल ! आपका यह दोहा काटने लायक
नहीं है; फिरभी मुझे इससे पूरा सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये
कोई दूसरी विधि से और स्पष्ट कर मुझे समझावो ।
बीरबल ने कहा-“बहुत अच्छा, और यह दूसरा दोहा रचकर
पढ़ सुनाया—
“अति का भला न बोलना, अति की भली न धूप ।
अतिका भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥”
फिर भी बादशाह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बीरबल से
दूसरा उत्तर माँगा। तब बीरबल बोला-“हे पृथ्वीनाथ !
सबका मूलमंत्र यह है कि अपनी अपनी सभी चाहते हैं, मैं इस
संबंध का एक दास्तान आपको सुनाता हूँ, शायद उससे आप
सन्तुष्ट हो जायें। एक गरीब बापके दो लड़कियाँ थीं।
उसने उनमें से एक को तो बागवान के घर ब्याहा और
दूसरी को कोंहार से । जब कुछ दिनों के बाद उनसे मिलने
गया तो पहले बागवान के घर गया। वहाँ पहुँचकर कुशल
प्रश्न के पश्चात् अपनी कन्या का चेहरा उतरा हुआ देखकर
उसके सोच का कारण पूछा? वह बोली-“हे पिताजी ! मैं
अपने दुःखकी बात आपसे क्या सुनाऊँ । उसका छूटना ईश्वर
के हाथ है। इधर कितनेही दिनों से अवर्षण होरहा है। जिस

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कारण सारा बाग का बाग सूखा जा रहा है। उसमें न तो
अच्छे फूल आते हैं और न फल ही। तब वह वहाँ से बिदा
हो अपनी दूसरी लड़की से मिलने कोहार के घर गया। वह
लड़की मन मारकर द्वार पर बैठी हुई थी। पिता से मिलकर
बड़ी प्रसन्न हुई और अपना सारा दुखड़ा सुनाकर फिर मौन
हो गई। पिता ने उसकी ऐसी उदासी का कारण पूछा तो
वह बोली- "हे पिताजी! मैं आपसे अपने दुख की बात
क्या कहूँ। इधर कई दिनों से मेह बराबर बरस रहा है। न
बरतन सूखने पाते हैं और न सूखी गोहरी ही आँवाँ लगाने
को मिलती है। सब हाल रोजगार बन्द है। न मालूम इस
बारिस का क्रम कब तक जारी रहेगा।" पिता अपनी दोनों
लड़कियों की पृथक पृथक चाहना सुनकर चुप रहगया और
सोचने लगा-"यह सब कुछ नहीं, हम जीव धारी अपनी-
अपनी चाहते हैं। परन्तु ईश्वर किसकी करे और किसकी न
करे। वह जो कुछ करता है सब भला ही करता है।" इस
दृष्टान्त को सुनाकर बीरबल ने कहा- "पृथ्वीनाथ ! यों तो
पेशे के अनुसार सब की चाहना अलग-अलग होती है, परन्तु
आपके प्रश्नों का वही ठीक उत्तर है जो मैंने पहले दोनों दोहों
में आपको सुनाया है। बादशाह बीरबल के उत्तर से बहुत
सन्तुष्ट हुए।

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२३७ अकबर बीरबल बिनोद
शाही रामायण
एक दिन बीरबल और बादशाह की एकान्त में बातें हो
रही थीं। इसी बीच बादशाह ने बीरबल से शाही रामायण
बनाने की चर्चा की। बीरबल बोला-“पृथवीनाथ ! यह कौन
बड़ी बात है। शाही रामायण मैं बनाकर आपको दिखलाऊँगा;
परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है जो थोड़े समय में कर
दिखाया जाय। इसमें तीन माँस की देर लगेगी और रुपये भी
काफी खर्च पड़ेंगे। इस समय मैं खर्च के रुपयों का ठीक-
ठीक आँकड़ा तो नहीं बता सकता, परन्तु इतना है कि
पहले पहल कार्यारम्भ के लिये मुझे १५ हजार रुपये
मिलने चाहिये।
बादशाह ने खजाने से पन्द्रह हजार रुपये दिलाकर बीरबल
को तीन मास की मुहलत दे शाही रामायण तय्यार करने के
लिये विदा किया। वह रुपयों को लेकर सीधे अपने घर पहुँचा
और उनसे स्थान २ पर मौका देखकर कुँआँ बावली खुदवाने
का कार्यारंभ किया। इस प्रकार जब दो मास समाप्त होकर
तीसरा भी समाप्त होने पर आया तो बीरबल को शाही
रामायण की सूझी। वह बाजार से कोरा कागज मँगाकर
उसकी एक मोटी पुस्तक तय्यार कराई और फिर उसे एक
आदमी के सिर पर रख कर बादशाह के पास पहुँचा।
बादशाह को पुस्तक दिखाकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अबतक
रामायण तय्यार हो गई होती; परन्तु अभी इसमें कुछ काम
बाकी हैं; जिसकी पूर्ति के लिये आपके पास आना पड़ा। कृपा

अकबर बीरबल विनोद २३८

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अकबर बीरबल विनोद २३८

कर मेरे सन्देह को मिटाकर इसकी पूर्ति करा दीजिये ।
रामायण में एक नायक और नायिका का प्रधान होना आव-
श्यक है । नायक तो आप अकेले हैं । परन्तु आपके पास कई
नायिकाएँ हैं । इसलिये इसमें किस बेगम को प्रधान मानकर
नायिका बनाया जाय ।”
बादशाह बोले-“प्रधान बेगम को ही इसकी नायका
बनाओ ।” बीरबल पुस्तक को लिये दिये बड़ी बेगम के
पास पहुँचा और उनसे कुशल प्रश्न के पश्चात् पूछा-“
रामायण की नायिका महारानी सीताजी को राक्षस राज
रावण के घर रहना पड़ा था । इसलिये आप किसके घर
रही हो ।” आपसे इसका उत्तर मिलने पर मैं शाही रामा-
यण तय्यार कर डालूँगा ।” बीरबल की ऐसी बातें सुनकर
बेगम सिर से पैर तक जल गईं और वे अपनी दासी को
आज्ञा देकर उस रामायण को बीरबल के सामने ही जलवा
दिया । बीरबल बेगम से बिदा होकर बादशाह के पास आया
और बेगम के द्वारा चिढ़कर रामायण जलाये जाने का सारा
किस्सा कह सुनाया। फिर हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ !
शाही रामायण फिर भी तय्यार हो सकती है । यदि आप
चाहते हों तो दूसरी आज्ञा दीजिये ।”
बादशाह हँसते हुए बोले-“बीरबल जो कुछ होना था सो
हो गया, अब दूसरी रामायण बनाने का कष्ट आपको नहीं
दिया जायगा । महाराज रामचन्द्र समर्थ थे, मैं उनकी तुलना
नहीं कर सकता । तो मैं यह पहले ही समझ चुका था मुझे
तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेनी थी । सो ले लिया । मैं भली