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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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२३१ अकबर बीरबल विनोद


इस वृद्धा की तलवार को देखना चाहिये। वह घोड़े की
राश को बुढ़िया की तरफ मोड़ दिया। जब घोड़ा उसके
समीप पहुँचा तो बादशाह ने उस वृद्धा से पूछा- "यह
तलवार लेकर तू शहर में क्यों खड़ी है?" बुढ़िया ने
दीनता भरी बाणी से कहा- "गरीबपरवर! मैं इसे बेचना
चाहती हूँ। यह तलवार बहुत दिनों से मेरे घर में पड़ी हुई है
आज बड़ी गिरीवस्था को प्राप्त होकर और कोई दूसरा
सामान न रहने पर इस बेचने की गरज से बाज़ार में लाई हूँ।"

बादशाह उससे तलवार माँग उसे म्यान से निकालकर
देखने लगे। वह एकदल खराब हो गई थी। उस पर जंग का
गहरा परदा पड़ गया था और उसकी धार भी कई जगह से
टूट गई थी। बादशाह ने बुढ़िया की तलवार को ज्यों का
त्यों लौटा दिया। वह उसको हाथ में लेकर बड़े गौर से
देखने लगी। ऐसा मालूम होता था मानो उसकी तलवार
बदल गई हो। इसको ऐसी भौचक सी हुई देखकर बादशाह ने
पूछा- "क्या बात है ! तेरी तलवार बदल तो नहीं गई है ?"
वह वृद्धा बोली- "पृथिवीनाथ ! मैंने सुना था कि पारस के
स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है, परन्तु यह हमारी लोहे की
तलवार आपके पारस हाथों के स्पर्श से सोने की क्यों नहीं
हुई। बस मैं यही देख रही हूँ।" बादशाह वृद्धा के इस उत्तर से
गदगद हो गये और उसको तलवार के बराबर सोना देने
की आज्ञा दी।

बीरबल अभी तक खड़े खड़े इनकी सब बातें सुन रहा
था। बुढ़िया की बुद्धिमत्ता भरी बातें सुन और बादशाह