अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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यहाँ से ले गये अब फिर क्या माँगने आये हो। ठग बोला-
“कौन ले गया ?” सेठने उत्तर दिया-“तुम्हारा साथी।”
वह कुछ क्रुद्ध होकर बोला-“आपने यह अनुचित किया है
हमने आपको उसी समय सचेत कर दिया था कि जब हम
दोनों एक साथ होकर आवें तो आप गहनों को वापस देना; फिर
आप अकेले एकको क्योंकर दिया। आपकी यह थोथी दलील
है, हमारा आभूषण हमें दीजिये।” सेठने जवाब दिया-“आप
भी तो उस नुकड़ पर खड़े थे, जब कि आपका भाई लेने
आया था।” ठग बोला-“इससे क्या ! मैं उसे गहने
वापस लेने को नहीं कहा था। आप मेरे आभूषणों को
वापस दें नहीं तो मैं आप पर नालिश करूँगा और नाहक
आपको भी जेरबार होना पड़ेगा।” सेठ भी कुछ कहता और
यह भी कुछ कहता, यहाँतक कि कहासुनी में घण्टों बीत
गया; परन्तु वह ठग किसी प्रकार राजी नहीं होता था।
तब क्रुद्ध होकर नगर व्योपारी ने कहा-“जा जो तेरे
जीमें हो सो कर, मैंने तेरा कुछ कर्ज नहीं खाया है जो मुझे
धमकी देता है।”
ठग का तो मन बढ़ा ही था वह तत्क्षण बीरबल के पास
जाकर फर्यादी हुआ। बीरबल उसकी फर्याद सुनकर तुरत
व्योपारी को बुलवाया, जब वह आया तो बोला-“यह क्या
कहता है, इसका व्योरा बतला।” वह व्योपारी शुरू से
आखीर तक जो जो बातें हुई थीं बयान किया और तीन
चार प्रतिष्ठित पुरुषों को साक्षी दिलवाई। बीरबल सारी
बातों को सुनकर निश्चित कर लिया कि नालिश झूठी है