अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 243 of 292
Read in context२२६ अकबर बीरबल विनोद
स्वभाव से लम्पट प्रगट होता था । बीरबल ने उसे बादशाह
को दिखाकर कहा-"पृथिवीनाथ ! यही पुरुष उस स्त्री का
यार जान पड़ता है।" बादशाह को बीरबल की बातों से
आश्चर्य हुआ और वे बोले- "इसपर कैसे विश्वास किया जाय ?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"उसकी तरफ कुछ देर तक ध्यान-
पूर्वक देखने से आपको स्वयं सिद्ध हो जायगा।" बादशाह ने
बीरबल के कहने का अनुशरण किया। वे अनजानों की
तरह उसकी दृष्टि बचा कर बराबर उसी तरफ देखते रहे। कुछ
कालोपरान्त वह लम्पट फिर घूम कर आया और अँगुली के
संकेत से उसे कुछ कहकर आप अग्रसर हुआ। महामायां
भी उसके पीछे २ चलीं। कुछ देर के बाद वे दोनों एक गली में
मुड़कर इनकी आँखों से ओझल हो गये।
यह देख कर बादशाह का भ्रम मिट गया और उन्हें उस लम्पट
का जार उस होना निश्चित हो गया। परन्तु फिर भी उधर ही
दृष्टि अड़ाये रहे। अब ये दोनों आगे बढ़े। बादशाह को बीरबल
की परख पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। इसलिये बीरबल को
छेड़कर बोले-"बीरबल ! तुम्हारी परख तो बड़ी सच्ची
निकली। परन्तु यह तो बतलाओ कि पहले तुमने उसको
कैसे पहचाना था।" बीरबल बोला-"पृथिवीनाथ ! यह सब
आँखों की खूबियाँ हैं। हम लोग नगर में निकलते हैं तो बरा-
बर रास्ते में आने जाने वालों की चाल ढाल का निरीक्षण
किया करते हैं। जिससे आँखों को मनुष्यों से मिलकर वा दूर
से देखकर उनके आचरण समझलेने की शक्ति प्राप्त हो
गई है। मैं बहुत देर से बराबर उस लम्पट की हरकतों