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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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२२५ अकबर बीरबल विनोद
ने फिर पूछा-“तो क्या सुनार लोहार दर्जी पेशा के सभी
चोर ही होते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“मैं यह कैसे कह
सकता हूँ कि सभी कारीगढ़ चोर ही होते हैं, परन्तु फिर भी
कितनों की चोरी सब को विदित हो चुकी है। जैसे सुनार
ही को लीजिये । इनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि
कोई चाहे कितनी ही इनकी चौकसी करे, परन्तु ये
येनकेन प्रकारेण माल में से चोरी कर ही लेते हैं। इनकी इस
कला की चालाकी संसार में विख्यात है, लोग तो यहाँ तक
कहते हैं कि दुनियाँ की बातें तो दरकिनारे रहीं। ये अपने माता
पुत्री तथा बहनों के आभूषणों में से भी चोरी करते हैं। यदि
कहीं चुराना भूल गये तो समझ लीजिये कि उस रात में
उन्हें नींद हराम हो जाती है ये कपटमुद्रा कर जबतक उसमें
से कुछ माल निकाल न लेंगे, तबतक इनके पेट में चूहे
कूदा करेंगे ।
इस सम्बन्ध की एक घटना मेरी आँखों के सामने भी
घटी है, उसपर जरा विचार कीजिये। एक गाँव में एक वृद्ध
सुनार रहता था बुढ़ापे के कारण वह सुनारी का काम नहीं
कर सकता था। इसलिये विवश होकर दूकान में बैठा बैठा
अपने एकलौते लड़केको सोनारी का काम सिखाया करता था।
यदि लड़का कहीं चूक करता तो वह तुरत उसकी भूल सुधरवा
देता था। दैवयोग से उस वृद्ध सुनार की लड़की ससुराल
से पीहर आई। उसे भी कुछ सोने के गहने बनवाये थे।
अतएव अन्य जगह न देकर उसने अपने भाई से ही गहने
बनवाना उत्तम समझा। उसका ख्याल था कि भाई के हाथ
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