Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 248 of 292

Read in context
Page 248

अकबरवीरबल विनोद २३४
को डाँटकर कहा-“क्यों बीरबल ! क्या ऐसा ही प्रबन्ध करते
हो। जब हमारी आँखों के सामने विचारे परदेशी लुटे जाते हैं
तो आँख पीछे क्या होता होगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-
“पृथ्वीनाथ ! क्या आप नहीं जानते कि दीपक तो दूसरों को
प्रकाश देता है, परन्तु उसके तले अँधेरा ही बना रहता है।”
बादशाह बीरबलकी बातें सच्ची मानकर खामोश रह गये।
—:*:—
बादशाह के चार प्रश्न
एक दिन जब कि कड़ाके की शर्दी पड़ रही थी। बादशाह
बीरबलके साथ अपने बागमें टहलते हुए धूप खा रहे थे। उनके
मन में अचानक एक तरंग उठी और उसके निराकरण के
लिये बीरबल को मध्यस्त बनाकर पूछेः-
“कौन बोलने को चहै, और कौन चहै है चूप।
कौन चहै है बरसनो, कौन चहै है धूप ॥”
इतना कहने के साथही बादशाह बीरबल को धमका कर
बोले-“यदि आजके चारों सवालों का समुचित उत्तर न दे सकोगे
तो जान से मारे जावोगे।” बीरबल को बादशाह का कथन
सुनकर बड़ी करुणा आई; क्योंकि बादशाह सचमुच उसकी
जान मारने को उतारू होगये थे। दूसरे करुणा इसलिये
आई कि इतने छोटे से प्रश्न के लिये बादशाह इतना उग्ररूप
क्यों धारण करते हैं। इसका उत्तर तो एक बुद्धिमान लड़का
भी समझ कर दे सकता है। खैर इस समय तो अपनी जान
बचानी चाहिये। ऐसा विचार कर वह बोला-